यह समाचार देश के प्रत्येक नागरिक की सुरक्षा और आपके परिवार की कुशलता से जुड़ा है। क्या हम अपने ही देश की गलियों में डर के साये में रहने को विवश हैं? क्या किसी बेजुबान जानवर का जीवन, एक मनुष्य के जीवन से अधिक मूल्यवान हो सकता है? इन गंभीर प्रश्नों का उत्तर आज देश की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट ने दे दिया है। एक ऐसा निर्णय जिसने देशभर में विमर्श की नई लहर पैदा कर दी है, और साथ ही करोड़ों लोगों को मानसिक शांति भी दी है।
सुप्रीम कोर्ट का युगांतरकारी फैसला
भारतीय न्यायिक इतिहास में इसे एक बेहद कड़ा और महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि मानव जीवन और उसकी सुरक्षा सर्वोपरि है। न्यायालय ने देशभर में रेबीज से संक्रमित, असाध्य रोग से पीड़ित या अत्यंत हिंसक और खतरनाक आवारा कुत्तों को जान से मारने (यूथेनेशिया) की अनुमति प्रदान कर दी है। यह कोई साधारण आदेश नहीं है, बल्कि उस कड़वी वास्तविकता को स्वीकार करना है जिसका सामना हमारा समाज प्रतिदिन कर रहा है। बेंच ने सख्त शब्दों में कहा कि स्थानीय निकायों को जारी निर्देशों में हिंसक कुत्तों को समाप्त करने का आदेश सबसे अहम है। यह फैसला जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की खंडपीठ ने सुनाया है।
भय के साये में जीवन अस्वीकार्य
आखिर सुप्रीम कोर्ट को इतना सख्त निर्णय क्यों लेना पड़ा? देशभर से निरंतर ऐसी हृदयविदारक घटनाएं आती हैं जहाँ आवारा कुत्तों ने मासूम बच्चों, वृद्धों और राहगीरों को अपना शिकार बनाया। अदालत ने पशु अधिकार कार्यकर्ताओं के तर्कों पर तीखी प्रतिक्रिया दी। पीठ ने स्पष्ट किया कि कोर्ट उन धरातलीय सच्चाइयों को अनदेखा नहीं कर सकता, जहाँ बच्चे और विदेशी पर्यटक कुत्तों के हमलों का शिकार हो रहे हैं।
अदालत ने सम्मानपूर्वक जीवन जीने के अधिकार की एक नई और अनिवार्य व्याख्या प्रस्तुत की है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, गरिमापूर्ण जीवन में कुत्तों के हमलों के भय से मुक्त होकर जीने का अधिकार भी समाहित है। क्या एक प्रगतिशील राष्ट्र के रूप में हम अपने नागरिकों को यह बुनियादी सुरक्षा भी प्रदान नहीं कर सकते? सुप्रीम कोर्ट ने इन आशंकाओं को न्यायसंगत माना है और नागरिकों के भयमुक्त जीवन के अधिकार को पुख्ता किया है। यह निर्णय हमारी उस राष्ट्रवादी सोच के अनुकूल है, जहाँ प्रत्येक भारतीय की जान अनमोल है और उसकी रक्षा करना राज्य का प्राथमिक कर्तव्य है।
अंधाधुंध हत्या नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित प्रक्रिया
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या इस आदेश के बाद गली-मोहल्लों में कुत्तों को मारना शुरू कर दिया जाएगा? उत्तर है—बिल्कुल नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए अत्यंत कड़े प्रोटोकॉल निर्धारित किए हैं। यह किसी अंधाधुंध कार्रवाई की अनुमति नहीं है। न्यायालय ने कहा है कि यह कदम केवल पशु चिकित्सा विशेषज्ञों की जांच और पुष्टि के बाद ही उठाया जा सकता है। एक विशेषज्ञ डॉक्टर पहले यह प्रमाणित करेगा कि कुत्ता वास्तव में रेबीज संक्रमित है या सार्वजनिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है।
इसके अतिरिक्त, स्थानीय अधिकारियों को पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 और पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023 का पूरी तरह पालन करना होगा। कोर्ट ने उन क्षेत्रों को चिह्नित करने का निर्देश दिया है जहाँ कुत्तों की संख्या अनियंत्रित हो गई है। केवल विशेष मामलों में और कानूनी प्रक्रिया के तहत ही स्थानीय प्रशासन कुत्तों को जान से मारने का निर्णय ले सकेगा। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी पशु के साथ अनावश्यक क्रूरता न हो, किंतु मानवीय सुरक्षा पर कोई समझौता स्वीकार्य नहीं है।
वैश्विक मानक: अन्य देशों के कानून
इस फैसले से भारत अब उन देशों की श्रेणी में आ गया है जहाँ आवारा कुत्तों को लेकर सख्त कानून प्रभावी हैं।
अमेरिका: यहाँ पशु नियंत्रण कानूनों के तहत सख्त नियम हैं। यदि कोई कुत्ता सार्वजनिक सुरक्षा या रेबीज के प्रसार का खतरा बनता है, तो उसे ‘यूथेनेशिया’ देने का प्रावधान है।
रूस: रूस में भी हिंसक या आवारा कुत्तों को हटाने की अनुमति कानून देता है, विशेषकर तब जब वे झुंड बनाकर लोगों पर हमला करते हों।
जापान: यहाँ का कानून बहुत कड़ा है। आवारा कुत्तों को सरकारी शेल्टर होम में रखा जाता है और यदि एक निश्चित अवधि तक उन्हें कोई नहीं अपनाता, तो उन्हें मार दिया जाता है।
भारत की नई दिशा
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश दिल्ली में आवारा कुत्तों द्वारा बच्चों को काटने की घटनाओं पर स्वतः संज्ञान लेने के बाद आया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नसबंदी और टीकाकरण का अभियान पूर्व की भांति जारी रहेगा, लेकिन अब खतरनाक कुत्तों की समस्या का एक ठोस समाधान भी मिल गया है।
अदालत ने राज्यों और निकायों को बुनियादी ढांचे को मजबूत करने का निर्देश दिया है। यह एक संतुलित दृष्टिकोण है जहाँ सुरक्षा को प्राथमिकता और जानवरों के प्रति मानवीय प्रक्रिया, दोनों का ध्यान रखा गया है।
एक उत्तरदायी नागरिक के रूप में हमें इस निर्णय को सही ढंग से समझना चाहिए। यह किसी जीव के प्रति घृणा का नहीं, बल्कि मानव सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक अनिवार्य कदम है। सुरक्षित भारत के लिए नागरिकों का भयमुक्त होना आवश्यक है।

