वाशिंगटन के गलियारों से लेकर ब्रुसेल्स में नाटो के मुख्यालय तक, इस समय गहरी बेचैनी देखी जा रही है। यूक्रेन संघर्ष की आड़ में जिस रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को अमेरिका और उसके साथी दुनिया में अलग-थलग करना चाह रहे थे, वही पुतिन अब पूरी गरिमा के साथ भारत आने की तैयारी कर रहे हैं। 2026 का ब्रिक्स शिखर सम्मेलन नई दिल्ली में आयोजित होगा, जो केवल एक कूटनीतिक बैठक नहीं, बल्कि एक वैश्विक शक्ति प्रदर्शन होगा। क्या भारत और रूस ने अमेरिकी डॉलर के एकाधिकार को चुनौती देने के लिए कोई गुप्त रणनीति तैयार की है? क्या नई दिल्ली अब दुनिया का वह केंद्र बन चुका है जहाँ से वैश्विक भविष्य तय होगा?
अंतरराष्ट्रीय मीडिया में पुतिन की इस यात्रा को लेकर चर्चाएं तेज हैं। विशेषज्ञ इसे एक नए युग की शुरुआत मान रहे हैं। पुतिन का दिल्ली आना इस बात का प्रमाण है कि भारत और रूस के संबंध किसी बाहरी दबाव के मोहताज नहीं हैं। यह केवल पुरानी मित्रता का मामला नहीं है, बल्कि मॉस्को और दिल्ली अब मिलकर एक ऐसा ‘वर्ल्ड ऑर्डर’ तैयार कर रहे हैं जो पश्चिमी प्रभुत्व को सीधी चुनौती देगा।
पश्चिमी देशों के दोहरे मापदंड आज सबके सामने हैं। जब रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए और उसे स्विफ्ट सिस्टम से बाहर किया गया, तो दुनिया को लगा कि रूस ढह जाएगा। लेकिन भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का परिचय देते हुए रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदना जारी रखा। भारत ने स्पष्ट कर दिया कि उसके राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं और वह किसी भी महाशक्ति के आदेशों के आगे झुकने वाला नहीं है।
इसी अडिग स्टैंड के कारण रूस आज भारत को अपना सबसे विश्वसनीय साझेदार मानता है। 2026 का ब्रिक्स सम्मेलन एक ऐसे समय पर हो रहा है जब यह संगठन जी-7 जैसे समूहों के लिए एक वास्तविक विकल्प बन चुका है। ब्रिक्स अब केवल कुछ देशों का समूह नहीं, बल्कि दुनिया की बहुसंख्यक आबादी की आवाज बन चुका है।
अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को खत्म करने के लिए रूस और चीन सक्रिय हैं, लेकिन भारत इसमें ‘ग्लोबल साउथ’ की सबसे मजबूत कड़ी बनकर उभरा है। विकासशील देश अब पश्चिम के बजाय भारत की ओर देख रहे हैं। पुतिन का भारत आगमन यह संदेश देता है कि आर्थिक दबाव के बावजूद भारत और रूस अपने स्वतंत्र रास्ते से पीछे नहीं हटेंगे।
पश्चिमी खुफिया एजेंसियां पुतिन की हर गतिविधि पर नजर रखती हैं, लेकिन भारत ने बिना किसी हिचकिचाहट के रूस के साथ अपने संबंधों को प्रगाढ़ किया है। यही वह कारण है जिससे वाशिंगटन के थिंक टैंक हैरान हैं। भारत के इस बढ़ते आत्मविश्वास और आक्रामक कूटनीति का मुकाबला करना अब पश्चिमी देशों के लिए कठिन हो गया है।
भारत की विदेश नीति आज एक मिसाल बन गई है। एक तरफ भारत ‘क्वाड’ के जरिए अमेरिका और जापान के साथ है, तो दूसरी तरफ रूस के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी अटूट है। भारत सरकार ने जिस तरह का कूटनीतिक संतुलन साधा है, उसे समझना पश्चिमी विशेषज्ञों के लिए एक पहेली बन गया है।
ब्रिक्स समिट का असली उद्देश्य केवल बैठकों तक सीमित नहीं है। इसमें रक्षा सौदे, ऊर्जा सुरक्षा और एक वैकल्पिक भुगतान प्रणाली पर काम हो रहा है। भारत ने एस-400 मिसाइल सिस्टम लेकर अपनी सुरक्षा को मजबूत किया है और रूसी तेल के माध्यम से अपनी अर्थव्यवस्था को महंगाई से बचाया है।
अब चर्चा केवल तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि रुपये और रूबल में व्यापार करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं। खुफिया सूत्रों की मानें तो पुतिन की यात्रा के दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्पेस टेक्नोलॉजी और डिफेंस के संयुक्त उत्पादन जैसे गोपनीय विषयों पर बड़े समझौते हो सकते हैं।
पश्चिमी मीडिया ने भारत को रूस से दूर करने के लिए काफी प्रोपेगैंडा चलाया, लेकिन भारत ने साबित कर दिया कि वह अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा। पीएम मोदी और पुतिन के बीच की व्यक्तिगत केमिस्ट्री ने पश्चिमी नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।
भारत शांति का पक्षधर है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में समझौता उसे मंजूर नहीं। 2026 की ब्रिक्स समिट पर पूरी दुनिया की नजरें इसलिए हैं क्योंकि यदि ब्रिक्स ने अपनी साझा मुद्रा या भुगतान प्रणाली लॉन्च कर दी, तो वैश्विक बाजार से डॉलर का दबदबा खत्म हो सकता है।
आज हकीकत यह है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। कोई भी बड़ी शक्ति भारत पर प्रतिबंध लगाने का जोखिम नहीं ले सकती क्योंकि ऐसा करना खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा। भारत इसी ताकत का इस्तेमाल अपनी शर्तों पर वैश्विक राजनीति करने में कर रहा है।
रूस के सुदूर पूर्व (Far East) क्षेत्र में भारत का बढ़ता निवेश दोनों देशों के संबंधों को नई ऊंचाई दे रहा है। ‘चेन्नई-व्लादिवोस्तोक मैरीटाइम कॉरिडोर’ इस रणनीतिक साझेदारी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो भविष्य के व्यापारिक मार्ग को बदल देगा।
यह नया समुद्री मार्ग न केवल समय की बचत करेगा बल्कि चीन के प्रभाव वाले रास्तों पर निर्भरता भी कम करेगा। पश्चिम और चीन के लिए सबसे बड़ी चिंता यही है कि हिंद और प्रशांत महासागर में भारत और रूस का यह नया गठजोड़ उनके वर्चस्व को खत्म कर देगा। 2026 का ब्रिक्स सम्मेलन नए भारत की महाशक्ति बनने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।

