चिकन नेक की अभेद्य किलेबंदी: मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के एक बड़े फैसले से बीजिंग और ढाका में हड़कंप

पश्चिम बंगाल की सत्ता संभालते ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने एक ऐसी फाइल पर मुहर लगा दी है, जिसने बीजिंग से लेकर ढाका तक खलबली मचा दी है। यह कोई साधारण प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि भारत के सबसे संवेदनशील और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र ‘चिकन नेक’ यानी सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा को पूरी तरह बदलने वाला महा-ऐक्शन है। पिछले कई वर्षों से जो फाइल जानबूझकर ठंडे बस्ते में डाली गई थी, उसे अब हरी झंडी मिल गई है। बंगाल सरकार ने भारत-बांग्लादेश सीमा पर सीमा सुरक्षा बल (BSF) को जमीन आवंटित करने की प्रक्रिया में वह गति ला दी है, जिसकी कल्पना पिछली सरकार में असंभव थी। उत्तरी बंगाल के इस नाजुक इलाके में करीब 120 एकड़ जमीन राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बीएसएफ को सौंपने की मंजूरी दी गई है। इस फैसले ने चीन के रणनीतिकारों को अपने नक्शे फिर से देखने पर मजबूर कर दिया है, क्योंकि दशकों से भारत को घेरने का जो सपना वो देख रहे थे, अब उस पर पानी फिर चुका है। वहीं, बांग्लादेश के कुछ खास राजनीतिक हलकों में भी इस कड़े फैसले के बाद सन्नाटा पसरा है।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर: चीन की गिद्ध दृष्टि और भारत का पलटवार

आखिर इस चिकन नेक का पूरा सच क्या है और चीन इसे लेकर इतना बेचैन क्यों रहता है? यदि आप भारत के इस भूगोल को देखें, तो एक तरफ नेपाल, दूसरी तरफ बांग्लादेश और ऊपर भूटान है, जबकि पास ही विस्तारवादी चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का बेस है। इन सबके बीच से गुजरता है सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जो भारत की मुख्य भूमि को उत्तर-पूर्व के आठ राज्यों से जोड़ने वाला एकमात्र और बेहद संकरा रास्ता है। कई जगहों पर इसकी चौड़ाई मात्र 20 से 22 किलोमीटर ही है। कल्पना कीजिए, एक ऐसा रास्ता जिस पर पूरे पूर्वोत्तर भारत की रसद, सेना की आवाजाही और करोड़ों लोगों का जीवन टिका है। इसी कमजोरी को चीन अपनी सबसे बड़ी ताकत मानता था। चीन का पुराना सपना रहा है कि किसी भी बड़े टकराव की स्थिति में चुंबी वैली से नीचे आकर इस 22 किलोमीटर के रास्ते को ब्लॉक कर दिया जाए ताकि उत्तर-पूर्व भारत से कट जाए। लेकिन अब पासा पलट चुका है। भारत ने यहाँ बड़े स्तर पर सुरक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने का निर्णय लेकर दुश्मनों के होश उड़ा दिए हैं।

नेशनल हाईवेज का मिलिट्री नेटवर्क: एक्सप्रेसवे की तर्ज पर तैयारी

शुभेंदु सरकार का यह कदम केवल जमीन देने तक सीमित नहीं है। यह खेल बहुत बड़ा और गहरा है। राज्य सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्गों के सात महत्वपूर्ण हिस्सों को सीधे NHAI और NHIDCL को सौंपने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। अब सवाल यह है कि हाईवे बनाने वाली कंपनियों को सड़कें सौंपने से चीन और बांग्लादेश क्यों डर रहे हैं? इसका जवाब भारत की नई सैन्य रणनीति में है। आधुनिक युद्ध केवल सेना से नहीं, बल्कि हथियारों और टैंकों को तेज गति से मोर्चे तक पहुँचाने की क्षमता से जीते जाते हैं। इन सड़कों के हस्तांतरण का अर्थ है कि अब बॉर्डर तक हाई-स्पीड कनेक्टिविटी होगी। मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया और उत्तर 24 परगना जैसे घुसपैठ के प्रति संवेदनशील जिलों में सड़क नेटवर्क एक्सप्रेसवे जैसा होगा। सिक्किम और भूटान को जोड़ने वाले मार्ग इतने मजबूत किए जाएंगे कि वे आपात स्थिति में लड़ाकू विमानों के लिए एयरस्ट्रिप का काम कर सकें। यानी भारतीय सेना के टैंक और मिसाइल डिफेंस सिस्टम अब बिजली की रफ्तार से बॉर्डर पर तैनात हो सकेंगे।

45 दिनों की डेडलाइन और डेमोग्राफी बदलने वालों पर कड़ी नकेल

120 एकड़ जमीन पर बीएसएफ की उपस्थिति का अर्थ केवल बैरक बनाना नहीं है। यह इशारा है एडवांस ड्रोन सर्विलांस, हाई-टेक रडार और सेना की स्ट्राइक यूनिट्स की तैनाती की तरफ। ये सब मिलकर इस क्षेत्र को एक ऐसा अभेद्य किला बना देंगे कि चीन को कुछ भी करने से पहले हजार बार सोचना होगा। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने 45 दिनों की सख्त डेडलाइन दी है ताकि बॉर्डर फेंसिंग के लिए जमीन बीएसएफ को मिल सके। यह कोई साधारण बयान नहीं, बल्कि सिस्टम को दौड़ाने वाली चेतावनी है। इसके साथ ही उन्होंने सीमावर्ती जिलों की बदलती जनसांख्यिकी (Demography) पर भी चिंता जताते हुए सख्त कार्रवाई की बात कही है, जो लंबे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर मुद्दा रहा है।

‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’: घुसपैठ रोकने का मास्टर प्लान

भारत और बांग्लादेश की सीमा करीब 2216 किलोमीटर लंबी है, जिसका सबसे जटिल हिस्सा पश्चिम बंगाल में है। यह सीमा नदियों और घने गांवों से होकर गुजरती है, जहाँ घुसपैठ एक पुरानी समस्या रही है। रिपोर्ट के अनुसार, 435 किलोमीटर सीमा अब तक प्रशासनिक देरी के कारण फेंस नहीं हो पाई थी। पिछली सरकारों में जमीन अधिग्रहण की फाइलें रुकी रहती थीं, जिसका लाभ भारत विरोधी ताकतों को मिलता था। इसी रास्ते से अवैध घुसपैठ, जाली नोट और तस्करी का नेक्सस चलता था। यह एक ‘साइलेंट वॉरफेयर’ था जो भारत के खिलाफ लड़ा जा रहा था। जब सीमावर्ती जिलों की डेमोग्राफी बदली, तो मूल निवासियों के लिए संकट खड़ा हो गया। यह सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास टिक-टिक करता एक टाइम-बम था। लेकिन अब ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ मॉडल की चर्चा हो रही है। इसका अर्थ है- अवैध लोगों की पहचान करना, उनके फर्जी कागजात और सरकारी सुविधाएं हटाना और अंत में उन्हें देश से बाहर निकालना।

स्मार्ट फेंसिंग से लेकर ब्रह्मोस की तैनाती तक

अब सीमा पर निगरानी आधुनिक और हाई-टेक है। जहाँ दलदली इलाके हैं, वहाँ ‘स्मार्ट फेंसिंग’ यानी लेजर दीवारें, थर्मल इमेजर और अंडरग्राउंड सेंसर लगाए जा रहे हैं। अब परिंदा भी पर मारेगा तो दिल्ली और कोलकाता के कंट्रोल रूम को पता चल जाएगा। पहली बार बंगाल में बॉर्डर सुरक्षा को राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा गया है। चीन को पता है कि यदि चिकन नेक पूरी तरह सुरक्षित कॉरिडोर बन गया, तो उसका ‘कट-ऑफ’ प्लान हमेशा के लिए विफल हो जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बुनियादी ढांचे के मजबूत होने से भारत यहाँ अपनी घातक ब्रह्मोस मिसाइलें और एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम को आसानी से डिप्लॉय कर सकेगा। यदि चीन ने दोबारा डोकलाम जैसी हिमाकत की, तो उसे उसी की भाषा में जवाब मिलेगा। यह नया भारत है, जो अपनी एक इंच जमीन और एक भी नागरिक की सुरक्षा पर समझौता नहीं करेगा। जो लोग अवैध घुसपैठ को अपना हक समझते थे, उनके लिए अब रास्ते हमेशा के लिए बंद किए जा रहे हैं।

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