हिंद महासागर में इस समय एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अभूतपूर्व भू-राजनीतिक खेल चल रहा है, जिसने बीजिंग के रणनीतिकारों और चीनी नेतृत्व की चिंताएं बढ़ा दी हैं। भारत और श्रीलंका के बीच एक ऐसा मजबूत सामरिक गठबंधन बन चुका है, जिसने हिंद महासागर क्षेत्र के पूरे समीकरण को ही बदल दिया है। एक समय था जब चीन अपने भारी कर्ज के जाल के जरिए श्रीलंका को आर्थिक रूप से अपना गुलाम बनाने की तैयारी में था। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को भी लगने लगा था कि श्रीलंका अब कभी चीन के नियंत्रण से मुक्त नहीं हो पाएगा, लेकिन आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। भारत ने अपनी शानदार कूटनीति और जमीनी मदद के जरिए वह कर दिखाया है, जिसे लोग असंभव मान रहे थे।
श्रीलंका की कानून व्यवस्था में अब एक बड़ा बदलाव दिखने वाला है, जो बीजिंग के विस्तारवादी मंसूबों को भारत का सीधा जवाब है। भारत ने श्रीलंका को 134 आधुनिक पुलिस कैब सौंपकर वहां की सुरक्षा व्यवस्था को एक नई ताकत प्रदान की है। इसके अलावा, वैश्विक तेल संकट और ईरान संकट के दौरान भी भारत ने श्रीलंका को कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित कर एक बड़े आर्थिक विनाश से बचाया है। आज के इस दौर में इन घटनाक्रमों के पीछे की गहराई को समझना बेहद जरूरी है।
कोलंबो में हाल ही में आयोजित एक भव्य समारोह में भारत के उच्चायुक्त ने श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके की उपस्थिति में श्रीलंकाई पुलिस को 134 नई पुलिस कैब की चाबियां सौंपीं। यह महज गाड़ियों का एक जत्था नहीं है, बल्कि भारत सरकार द्वारा श्रीलंका को दी जा रही 300 मिलियन डॉलर की विशाल अनुदान सहायता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इन आधुनिक वाहनों की चमक उस अटूट विश्वास का प्रतीक है, जो अब श्रीलंका भारत पर जता रहा है। ये गाड़ियां श्रीलंका के उन दुर्गम और ग्रामीण इलाकों में पहुंचेंगी, जहां अब तक पुलिस और प्रशासन की पहुंच सीमित थी। भारत ने श्रीलंका के आंतरिक सुरक्षा ढांचे को मजबूत करके यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने पड़ोसियों की संप्रभुता के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
इस कूटनीतिक जीत की जड़ें दिसंबर 2024 में हुए सत्ता परिवर्तन में छिपी हैं। नवनिर्वाचित राष्ट्रपति दिसानायके ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को चुनकर पूरी दुनिया के विश्लेषकों को चौंका दिया था। उस समय चीनी मीडिया को उम्मीद थी कि नया नेतृत्व बीजिंग की ओर झुकेगा, लेकिन वास्तविकता इसके ठीक उलट रही।
प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति दिसानायके के बीच हुई उच्च स्तरीय बैठकों ने दोनों देशों के बीच भविष्य के सहयोग का एक नया ब्लूप्रिंट तैयार किया। यह साझेदारी न केवल आर्थिक है बल्कि रणनीतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जनवरी 2025 में हुए एमओयू के बाद भारत ने बिना किसी देरी के इन वाहनों की आपूर्ति सुनिश्चित की। भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ यानी ‘पड़ोसी प्रथम’ की नीति ने एक बार फिर साबित किया है कि भारत केवल वादे नहीं करता, बल्कि उन्हें समय पर पूरा भी करता है।
इन 134 पुलिस वाहनों का मुख्य उद्देश्य श्रीलंका के सुरक्षा ढांचे को आधुनिक बनाना और पुलिस के रिस्पांस टाइम में सुधार करना है। किसी भी देश के विकास के लिए कानून व्यवस्था का सुदृढ़ होना आवश्यक है, क्योंकि इसके बिना विदेशी निवेश और आर्थिक स्थिरता संभव नहीं है। श्रीलंका अभी एक कठिन आर्थिक दौर से गुजर रहा है, और ऐसे में नागरिकों का प्रशासन पर भरोसा बढ़ाना पहली प्राथमिकता है।
भारत की ओर से मिली यह मदद श्रीलंका के पहाड़ी और जंगली इलाकों में गश्त बढ़ाने में सहायक होगी। यह केवल गाड़ियां नहीं हैं, बल्कि श्रीलंका की सड़कों पर दौड़ती भारत-श्रीलंका मित्रता की एक नई पहचान हैं।
श्रीलंका के उस दौर को याद करना जरूरी है जब वह आर्थिक दिवालियापन की कगार पर था। भोजन, ईंधन और दवाओं की भारी कमी के बीच जब चीन जैसे तथाकथित ‘मित्रों’ ने अपने हाथ खींच लिए थे, तब केवल भारत ही श्रीलंका के साथ खड़ा था।
भारत ने बिना किसी गुप्त शर्त के अरबों डॉलर की सहायता, अनाज और दवाइयां भेजीं। अगर भारत समय पर आगे नहीं आता, तो श्रीलंका में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती थी। इसी निस्वार्थ मदद ने आज के मजबूत रिश्तों की नींव रखी है।
वर्तमान वैश्विक संकट के दौरान भी भारत का सहयोग जारी रहा। जब मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ा और कच्चे तेल की सप्लाई बाधित होने लगी, तब भारत ने अपनी रिफाइनरी क्षमता का उपयोग कर श्रीलंका को ऊर्जा संकट से बचाया।
भारत ने यह सुनिश्चित किया कि श्रीलंका का परिवहन और ऊर्जा क्षेत्र ठप न हो। इस कदम ने कोलंबो के राजनीतिक गलियारों और जनता के बीच भारत की छवि को और अधिक विश्वसनीय बना दिया है।
चीन के ‘हंबनटोटा मॉडल’ के विपरीत, भारत की 300 मिलियन डॉलर की सहायता कर्ज नहीं बल्कि अनुदान (ग्रांट) है। भारत श्रीलंका को कर्जदार नहीं, बल्कि एक आत्मनिर्भर और सशक्त राष्ट्र के रूप में देखना चाहता है।
राष्ट्रपति दिसानायके की यात्रा के बाद डिजिटल गवर्नेंस, कृषि, बुनियादी ढांचे और ऊर्जा क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स पर काम तेजी से चल रहा है। भारत अब श्रीलंका के विकास का सबसे विश्वसनीय भागीदार बन गया है।
भारत और श्रीलंका के बीच ऊर्जा ग्रिड को समुद्री रास्ते से जोड़ने पर भी काम चल रहा है, जिससे भविष्य में वहां बिजली की किल्लत पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। यह कनेक्टिविटी बाहरी ताकतों को भविष्य में फूट डालने का मौका नहीं देगी।
यूपीआई (UPI) जैसे डिजिटल पेमेंट सिस्टम और ग्रामीण आवास योजनाओं के माध्यम से भारतीय निवेश श्रीलंका के आम नागरिकों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रहा है।
हिंद महासागर में भारत का यह मजबूत नेटवर्क चीन के ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ के सपने को चकनाचूर कर रहा है। भारत की रणनीति विस्तारवाद की नहीं, बल्कि सामूहिक समृद्धि और सुरक्षा की है।
श्रीलंका अब चीन की चालबाजियों की तुलना में भारत की ईमानदारी पर भरोसा कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर श्रीलंका का भारत समर्थक रुख नई दिल्ली की एक बड़ी कूटनीतिक जीत है।
भारत ने साबित कर दिया है कि वह क्षेत्र में संकट के समय सबसे पहले पहुंचने वाला देश (First Responder) है। यह 134 पुलिस कैब भारत और श्रीलंका के बीच अटूट मित्रता और सुरक्षा सहयोग का जीता-जागता उदाहरण हैं।
इसे अंतरराष्ट्रीय भाषा में ‘गिफ्ट डिप्लोमेसी’ कहा जाता है, जो सैन्य हथियारों से कहीं अधिक प्रभाव डालती है। भारत श्रीलंका के आंतरिक ढांचे को मजबूत कर रहा है, जो भविष्य में दोनों देशों के लिए लाभकारी होगा।
श्रीलंका का भारत पर बढ़ता भरोसा यह सिद्ध करता है कि कथनी और करनी का अंतर ही भारत को एक सच्चा ग्लोबल लीडर बनाता है। आने वाले समय में यह साझेदारी हिंद महासागर की सुरक्षा और शांति के लिए एक नई मिसाल पेश करेगी।

