UNSC में भारत की ‘SHANTI’ पहल: विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दुनिया को दिखाई नए भारत की कूटनीतिक शक्ति

आज विश्व एक अत्यंत संवेदनशील और नाजुक दौर से गुजर रहा है। कहीं महाशक्तियों के बीच वर्चस्व की होड़ मची है, तो कहीं पूरा मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) अशांति की आग में झुलस रहा है। इस भीषण वैश्विक संकट के समय में, जब दुनिया के बड़े-बड़े शक्तिशाली देश शांति स्थापित करने में विफल साबित हुए हैं, तब संयुक्त राष्ट्र के सबसे बड़े मंच से एक ऐसी हुंकार सुनाई दी है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। यह स्वर किसी और का नहीं, बल्कि आज के सशक्त, आक्रामक और आत्मनिर्भर भारत का है। भारत ने वैश्विक राजनीति के अखाड़े में अपना सबसे बड़ा दांव चल दिया है और दुनिया को स्पष्ट संदेश दिया है कि अब हिंदुस्तान नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह तैयार है।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में वर्ष 2028-29 की अस्थायी सदस्यता के लिए अपना मेगा इलेक्शन कैंपेन आधिकारिक तौर पर शुरू कर दिया है। न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय से जब विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस महा-अभियान का शुभारंभ किया, तो वहां मौजूद दुनिया भर के राजनयिकों को यह समझ आ गया कि भारत अब वैश्विक फैसलों में मूकदर्शक बनकर नहीं रहेगा। भारत अब ग्लोबल टेबल पर अपने अधिकारों की दावेदारी पूरी मुखरता और आत्मविश्वास के साथ कर रहा है।

इस महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक अभियान को एक सार्थक नाम दिया गया है— ‘शांति’ (SHANTI)। इंटरनेशनल डिप्लोमेसी में यह शब्द भारत के सबसे बड़े विजन को दर्शाता है। यहाँ ‘शांति’ का अर्थ है— सिक्योरिंग होलिस्टिक एडवांसमेंट थ्रू नॉर्म्स, ट्रस्ट एंड इंटीग्रिटी (नियमों, विश्वास और अखंडता के माध्यम से समग्र विकास सुनिश्चित करना)। यह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति में भारत का वह दृष्टिकोण है, जिसके समक्ष आज विकसित राष्ट्र भी नतमस्तक हैं।

न्यूयॉर्क के उस विशेष कार्यक्रम में विदेश मंत्री का संबोधन बेहद प्रभावशाली और ओजस्वी था। उन्होंने बिना किसी संकोच के दुनिया को वास्तविकता का आईना दिखाया। जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत उन देशों में शामिल नहीं है जो केवल मंचों से बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। भारत ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के मंत्र को केवल रटता नहीं है, बल्कि संकट के समय इसे धरातल पर उतारकर भी दिखाता है।

यदि भारत के पिछले कुछ वर्षों के ट्रैक रिकॉर्ड को देखें, तो स्पष्ट होता है कि भारत आज वैश्विक सुरक्षा का एक विश्वसनीय स्तंभ बन चुका है। भारतीय नौसेना केवल अपनी सीमाओं की रक्षा नहीं कर रही, बल्कि वैश्विक व्यापारिक मार्गों को सुरक्षित करने की जिम्मेदारी भी निभा रही है। अरब सागर से लेकर अदन की खाड़ी और मलक्का जलडमरूमध्य तक, भारतीय युद्धपोत निरंतर गश्त कर रहे हैं। समुद्री डकैती के विरुद्ध भारत के कड़े एक्शन की प्रशंसा आज अमेरिका और यूरोप भी कर रहे हैं। नशीले पदार्थों और मानव तस्करी के खिलाफ भारत का अभियान अंतरराष्ट्रीय अपराधियों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।

इतना ही नहीं, शांति स्थापना (Peacekeeping) के क्षेत्र में भी भारत का योगदान अद्वितीय है। दिल्ली में स्थापित संयुक्त राष्ट्र शांतिरक्षा केंद्र आज दुनिया के लिए एक मिसाल है। भारत वर्तमान में विश्व के 98 देशों के सैनिकों को प्रशिक्षण दे रहा है, ताकि वे वैश्विक स्तर पर शांति स्थापित करने में सक्षम बन सकें।

दुनिया में कहीं भी प्राकृतिक आपदा आने पर भारत सदैव ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ की भूमिका में रहा है। श्रीलंका में दितवा चक्रवात हो या जमैका में मेलिसा तूफान, भारत ने बिना किसी कूटनीतिक स्वार्थ के तुरंत राहत सामग्री पहुंचाई। यह भारत की वह ‘सॉफ्ट पावर’ है जिसका लोहा आज पूरी दुनिया मान रही है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में भारत आज ‘विश्व की फार्मेसी’ के रूप में उभरा है। अफगानिस्तान से लेकर मालदीव, फिजी और पापुआ न्यू गिनी तक, भारत ने संकट के समय जीवन रक्षक दवाएं और वैक्सीन उपलब्ध कराई हैं। अफ्रीका में इबोला संकट हो या अन्य देशों में खाद्य संकट, भारत ने सदैव मानवता को सर्वोपरि रखा है। यह प्रमाणित करता है कि भारत मुश्किल समय में अपने मित्रों का साथ कभी नहीं छोड़ता।

आज वैश्विक मंच पर ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) की आवाज बनकर अगर कोई खड़ा है, तो वह भारत है। भारत की सशक्त कूटनीति का ही परिणाम था कि अफ्रीकी संघ को जी-20 की स्थायी सदस्यता मिली। इस कदम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के कद को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है। आज एशिया और अफ्रीका के अधिकांश देश पश्चिमी देशों की तुलना में भारत पर अधिक भरोसा करते हैं।

2028-29 की अवधि के लिए सुरक्षा परिषद की अस्थायी सीट हेतु चुनाव अगले साल जून में होंगे। एशिया-प्रशांत समूह की इस सीट के लिए भारत का मुकाबला ताजिकिस्तान से है। हालांकि, भारत की वैश्विक साख और मजबूत कूटनीतिक नेटवर्क को देखते हुए यह मुकाबला भारत के पक्ष में ही दिखाई देता है। भारत ने साफ कर दिया है कि उसकी दावेदारी वैश्विक विश्वास को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए है।

अपने इसी विजन को आगे बढ़ाते हुए विदेश मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस से मुलाकात कर भारत का पक्ष रखा। उनकी यह सक्रिय डिप्लोमेसी दर्शाती है कि भारत अब वैश्विक व्यवस्था में अपनी उचित जगह पाने के लिए निरंतर प्रयासरत है।

यह अभियान ऐसे समय में शुरू हुआ है जब यूक्रेन युद्ध और गाजा संघर्ष जैसी घटनाओं ने पुरानी वैश्विक व्यवस्थाओं की विफलताओं को उजागर कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बार-बार यह दोहराया है कि 1945 में बनी सुरक्षा परिषद अब 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम नहीं है। भारत अब केवल नियमों का पालन करने वाला देश नहीं, बल्कि दुनिया के लिए नए नियम तय करने की क्षमता रखने वाला राष्ट्र है।

 

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