आज हम एक ऐसे देश की दास्तां बयां कर रहे हैं, जिसने दूसरों के आंगन में आग लगाने के लिए सालों तक बारूद इकट्ठा किया, लेकिन आज उसी आग की लपटों में उसका अपना घर राख हो रहा है। हम बात कर रहे हैं आतंकवाद की नर्सरी कहे जाने वाले पाकिस्तान की। भू-राजनीति (Geopolitics) का एक कड़वा सच है कि जो सांप दूसरों को डसने के लिए पाले जाते हैं, वो एक दिन अपने ही मालिक का शिकार करते हैं। पाकिस्तान के साथ आज यही हो रहा है। पांच साल पहले जब काबुल में सत्ता का तख्तापलट हुआ, तब रावलपिंडी के जनरलों ने जश्न मनाया था। उन्हें गुमान था कि अफगानिस्तान अब भारत के खिलाफ उनका नया अड्डा बनेगा। लेकिन आज, ठीक पांच साल बाद, मंजर बदल चुका है। तालिबान और पाकिस्तान आज एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन बन चुके हैं, और भारत ने अपनी सधी हुई कूटनीति से पाकिस्तान की ‘स्ट्रैटेजिक डेप्थ’ को पूरी तरह खत्म कर दिया है।
पाकिस्तानी भ्रम का अंत और जमीनी हकीकत
अगस्त 2021 की वो तस्वीरें याद कीजिए, जब अशरफ गनी की सरकार के पतन के बाद ISI चीफ काबुल में चाय की चुस्कियां ले रहे थे। पाकिस्तान को लगा था कि उसकी पश्चिमी सीमा अब पूरी तरह महफूज है। पाकिस्तानी फौज की योजना बहुत स्पष्ट थी—अफगानिस्तान में अपनी पसंद की सरकार चलाना, वहां से भारतीय प्रभाव को मिटाना और उस जमीन का इस्तेमाल कश्मीर में अस्थिरता फैलाने के लिए करना।
लेकिन, जुलाई 2026 तक आते-आते पाकिस्तान का यह सपना एक दुस्वप्न में तब्दील हो गया है। जिस तालिबान को पाकिस्तान अपना ‘प्रॉक्सी’ समझता था, आज उसी ने पाकिस्तान की नाक में दम कर रखा है। तहरीक-ए-तालिबान-पाकिस्तान (TTP) आज पाकिस्तान के भीतर तबाही मचा रहा है। डूरंड लाइन पर आए दिन होने वाली गोलीबारी ने पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र की पोल खोल दी है। तालिबान अब इस्लामाबाद के इशारों पर नाचने के बजाय एक स्वतंत्र राष्ट्र की तरह अपने हितों को प्राथमिकता दे रहा है।
असीम मुनीर की विफल नीतियां और बढ़ता संकट
पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर को लगा था कि वो आतंकवादियों को अपने नियंत्रण में रख पाएंगे, लेकिन आज अफगानिस्तान और पाकिस्तान के संबंध ऐतिहासिक गिरावट पर हैं। अपनी हताशा मिटाने के लिए पाकिस्तान अब दशकों से वहां रह रहे अफगान शरणार्थियों पर जुल्म कर रहा है और उन्हें जबरन देश से बाहर निकाल रहा है। ऐसे मुश्किल वक्त में भी इन अफगानों की मदद के लिए ‘इस्लामिक भाईचारे’ का दम भरने वाले पाकिस्तान के बजाय भारत आगे आया। पाकिस्तान की अपनी ही नीतियां आज उसके लिए काल बन गई हैं, और वो उन आतंकियों से लड़ने में पस्त है जिन्हें उसने खुद तैयार किया था।
भारत की प्रभावी और मौन कूटनीति
दूसरी तरफ भारत का नजरिया देखिए। काबुल में सत्ता परिवर्तन के समय भारत के सामने बड़ी चुनौतियां थीं—चाबहार पोर्ट की सुरक्षा और आतंकी संगठनों का खतरा। लेकिन भारत की विदेश नीति ने जल्दबाजी में प्रतिक्रिया देने के बजाय धैर्य से काम लिया।
भारत ने तालिबान को आधिकारिक मान्यता दिए बिना ही अपनी ‘टेक्निकल टीम’ काबुल भेजी और वहां के नेतृत्व के साथ व्यावहारिक संबंध बनाए। आज तालिबान भी यह समझ चुका है कि देश चलाने और जनता का पेट भरने के लिए उसे पाकिस्तान जैसे आर्थिक रूप से कंगाल देश की नहीं, बल्कि भारत जैसे वैश्विक आर्थिक शक्ति की जरूरत है।
विकास कार्य और अफगान जनता का भरोसा
भारत हमेशा से अफगानिस्तान का सबसे विश्वसनीय साथी रहा है। भारत ने वहां करीब 3 बिलियन डॉलर (25 हजार करोड़ रुपये) का निवेश किया है। हमने वहां की संसद बनाई, सलमा डैम (अफगान-भारत मैत्री बांध) का निर्माण किया और कनेक्टिविटी के लिए झारंज-डेलाराम हाइवे जैसी महत्वपूर्ण सड़कें बनाईं। हमने वहां स्कूल, अस्पताल और बिजली की लाइनें बिछाईं। हजारों अफगान छात्रों को भारत में शिक्षा मिली, जिसने वहां के लोगों के दिलों में भारत के प्रति सम्मान और प्रेम पैदा किया है।
मानवीय सहायता में भारत की मिसाल
सत्ता बदलने के बाद भी भारत ने अफगान जनता का साथ नहीं छोड़ा। जब वहां अनाज का संकट हुआ, तो भारत ने हजारों मीट्रिक टन गेहूं भेजा। पाकिस्तान की तमाम बाधाओं के बावजूद भारत ने वहां रसद पहुंचाई।
कोरोना काल और उसके बाद भारत ने दवाएं, टीके और चिकित्सा उपकरण भेजे। जब टिड्डियों के हमले से वहां की फसलें बर्बाद होने वाली थीं, तब भारत ने कीटनाशक भेजकर किसानों की मदद की। हाल ही में आए विनाशकारी भूकंप के समय भी भारतीय वायुसेना के विमान सबसे पहले राहत सामग्री लेकर वहां पहुंचे।
नया वैश्विक समीकरण और भारत का बढ़ता दबदबा
आज पूरी दुनिया देख रही है कि पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में विनाश के बीज बोए, जबकि भारत ने वहां निर्माण और मानवता का हाथ बढ़ाया। पाकिस्तान आज अपने ही पाले हुए आतंकियों से त्रस्त है और अफगानिस्तान में अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। भारत ने बिना युद्ध किए अपनी ‘सॉफ्ट पावर’ के जरिए इस क्षेत्र में अपनी धाक जमा ली है।
जो पाकिस्तान कभी भारत को अफगानिस्तान से बेदखल करने की साजिश रचता था, आज वह खुद वहां से बाहर हो चुका है। कश्मीर में आतंक का सपना देखने वाली पाकिस्तानी फौज आज पेशावर और क्वेटा को बचाने में नाकाम है। यही नए भारत की ताकत है, जो शांति और कूटनीति से दुश्मनों की हर चाल को नाकाम करना जानता है।

