देश के सबसे बड़े न्याय के मंदिर, यानी सुप्रीम कोर्ट से एक ऐसी चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जिसने पूरे न्यायिक तंत्र और देशवासियों को स्तब्ध कर दिया है। जिस अदालत की दहलीज पर कदम रखते ही बड़े-बड़े अपराधियों और रसूखदारों के पसीने छूट जाते हैं और जहाँ देश के भविष्य के बड़े फैसले लिखे जाते हैं, वहाँ एक व्यक्ति ने ऐसा हाई-वोल्टेज ड्रामा किया जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। यह केवल बदतमीजी नहीं थी, बल्कि सीधे तौर पर देश की सर्वोच्च न्यायपालिका और संविधान की मर्यादा को चुनौती देने वाली एक शर्मनाक हरकत थी। इस तमाशे ने कुछ देर के लिए सुप्रीम कोर्ट के भीतर सन्नाटा पसरा दिया।
आज हम आपको कोर्टरूम के भीतर हुए उस एक-एक पल का पूरा घटनाक्रम बताएंगे, जब एक याचिकाकर्ता ने जजों की तरफ कागज उछाले, अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया और खुद को कानून से भी ऊपर समझने का दुस्साहस किया।
सुप्रीम कोर्ट का कोर्टरूम नंबर हमेशा की तरह अपनी पूरी गरिमा के साथ संचालित हो रहा था। जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच सुनवाई कर रही थी। देश भर के महत्वपूर्ण मामलों की फाइलें जजों के सामने थीं और अदालत का माहौल बेहद गंभीर था। इसी दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका की बारी आई। इस मामले के याचिकाकर्ता का नाम प्रबल प्रताप सिंह था। यह व्यक्ति अपनी पैरवी के लिए किसी वकील को साथ नहीं लाया था, बल्कि ‘पार्टी इन पर्सन’ के तौर पर खुद अपना पक्ष रखने के लिए जजों के सामने खड़ा हुआ।
भारतीय कानून हर नागरिक को यह अधिकार देता है कि वह अपनी बात स्वयं अदालत के समक्ष रख सके और सुप्रीम कोर्ट भी ऐसे लोगों को पूरी प्राथमिकता देता है। लेकिन प्रबल प्रताप सिंह की करतूतों ने इस अधिकार का सरेआम मजाक बना दिया। सुनवाई शुरू होते ही इस व्यक्ति ने अदालत की मर्यादा को ताक पर रख दिया। जो शख्स न्याय की उम्मीद में आया था, वह अचानक जजों को ही निर्देश देने लगा।
प्रबल प्रताप सिंह ने अपनी हदें पार करते हुए जजों से सीधे तौर पर कहा, “न्यायिक अधिकारी महोदय, मैं आपको आदेश देता हूं कि लखनऊ के एसीपी विकास नगर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश जारी करें।”
जरा सोचिए, देश की सबसे बड़ी अदालत के जज, जिनके आदेशों से व्यवस्थाएं बदल जाती हैं, उन्हें एक याचिकाकर्ता कह रहा था कि ‘मैं आपको आदेश देता हूं’। इस दुस्साहस को देखकर जस्टिस के.वी. विश्वनाथन भी हैरान रह गए। उन्होंने बेहद शालीनता से पूछा, “क्या आप हमें आदेश दे रहे हैं?”
लेकिन उस व्यक्ति पर जैसे कोई जुनून सवार था। उसने जजों के सवाल का और भी भड़काऊ जवाब देते हुए कहा, “मेरी तरफ से बस इतना ही। सब कुछ रिकॉर्ड पर मौजूद है।”
इतना कहते ही कोर्टरूम का माहौल तनावपूर्ण हो गया। इससे पहले कि वहाँ मौजूद सुरक्षाकर्मी या वकील कुछ समझ पाते, प्रबल प्रताप सिंह ने अपने हाथ में मौजूद केस की फाइलें और कागज जजों की बेंच की ओर हवा में उछाल दिए। पन्ने बिखरने लगे और न्याय के मंदिर में वह तमाशा शुरू हो गया जो किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है।
बात यहीं खत्म नहीं हुई। उस व्यक्ति ने अपना आपा खोते हुए गाली-गलौज शुरू कर दी। उसने गुस्से में देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) तक को निशाना बनाया और उनके खिलाफ अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करते हुए चिल्लाया, “इसे सीजेआई को दे देना।”
इस पूरे हंगामे से कोर्टरूम में मौजूद वकील और अधिकारी सन्न रह गए। माहौल इतना हिंसक और डरावना हो गया था कि पीछे बैठी एक महिला वकील बुरी तरह घबरा गईं। कोर्टरूम का अनुशासन पूरी तरह भंग हो चुका था।
हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट की सुरक्षा व्यवस्था ने तुरंत मोर्चा संभाला। बेंच के निर्देश पर सुरक्षाकर्मियों और कोर्ट मार्शल्स ने प्रबल प्रताप सिंह को दबोच लिया। उसे तत्काल माइक से दूर किया गया और जबरन घसीटते हुए कोर्टरूम से बाहर ले जाया गया। न्याय की गरिमा के साथ खिलवाड़ करने वाले को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
घटना के बाद चर्चा इस बात की है कि आखिर जजों ने क्या एक्शन लिया? आमतौर पर ऐसी हरकत के लिए ‘कोर्ट की अवमानना’ (Contempt of Court) का मामला बनता है और व्यक्ति को जेल हो सकती है। लेकिन जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने यहाँ महानता और उदारता का परिचय दिया।
जजों ने महसूस किया कि यह व्यक्ति मानसिक रूप से परेशान और हताश है। जस्टिस विश्वनाथन ने शांत लहजे में टिप्पणी की, “हमें उसके प्रति केवल सहानुभूति है। हम उसके खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं करना चाहते।”
यह भारतीय न्यायपालिका का वह संवेदनशील चेहरा है, जो न्याय भी करता है और एक हताश व्यक्ति की मनःस्थिति को समझकर क्षमा भी कर देता है। जजों ने स्पष्ट किया कि अदालत अपनी गरिमा की रक्षा करना जानती है, लेकिन वह किसी बीमार मानसिकता वाले व्यक्ति पर अपनी शक्ति का अनावश्यक प्रदर्शन नहीं करेगी।
किंतु इसका अर्थ यह नहीं था कि उस व्यक्ति को कोई राहत मिली। बेंच ने उसकी याचिका की समीक्षा के बाद यह साफ कर दिया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने का कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है। अदालत ने याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। लखनऊ के एसीपी के खिलाफ जिस एफआईआर की वह मांग कर रहा था, उसका कोई लीगल बेस न होने के कारण उसे न्याय नहीं मिल सका।
भले ही यह मामला शांत हो गया हो, लेकिन इसने एक गंभीर प्रश्न खड़ा किया है। लोकतंत्र में न्यायपालिका अंतिम भरोसा होती है। वहाँ जाकर इस तरह की अभद्रता करना केवल अदालत का नहीं, बल्कि पूरे संविधान का अपमान है।
सुप्रीम कोर्ट ने सहानुभूति दिखाई है, लेकिन यह एक संदेश भी है कि अदालत के भीतर ऐसा व्यवहार कभी स्वीकार नहीं किया जाएगा। जो लोग सोचते हैं कि चिल्लाकर या कागज फेंककर वे सिस्टम को झुका सकते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि कानून की सर्वोच्चता कायम थी और हमेशा कायम रहेगी।
देश की न्यायपालिका स्वतंत्र और निष्पक्ष है। प्रबल प्रताप सिंह जैसे मामले साबित करते हैं कि कोर्टरूम कोई सार्वजनिक सड़क नहीं है, यहाँ केवल कानून का राज चलता है और आगे भी यही रहेगा।

