इंटरनेशनल डिप्लोमेसी और जिओपॉलिटिक्स में कभी-कभी ऐसे बयान सामने आते हैं जो किसी मिसाइल से भी अधिक मारक साबित होते हैं। आज हम दक्षिण एशिया की राजनीति में आए उस कूटनीतिक भूचाल की बात कर रहे हैं, जिसने पड़ोसी देश पाकिस्तान की पूरी सियासत को हिला कर रख दिया है। वर्षों तक आतंक और मजहब के नाम पर अपनी विदेश नीति चलाने वाले पाकिस्तान को आज उसी के पाले हुए लोग आईना दिखा रहे हैं। इस्लामाबाद को गुमान था कि वह मजहबी कार्ड खेलकर हमेशा अफगानिस्तान को अपनी मुट्ठी में रखेगा और भारत के विरुद्ध इस्तेमाल करेगा। लेकिन आज अफगानिस्तान से एक ऐसी आवाज उठी है, जिसने पाकिस्तानी जनरलों और हुक्मरानों की रातों की नींद छीन ली है। यह केवल एक बयान नहीं, बल्कि भारत की उस सशक्त विदेश नीति की विजय है, जिसके सामने वैश्विक प्रोपेगेंडा ने घुटने टेक दिए हैं।
अफगान मंत्री का मास्टरस्ट्रोक और ‘भारतीय डीएनए’
इस सियासी हलचल का आरंभ तब हुआ जब अफगानिस्तान के कृषि मंत्री मौलवी अताउल्लाह ओमरी भारत के आधिकारिक दौरे पर नई दिल्ली आए। यह दौरा कोई सामान्य कूटनीतिक गतिविधि नहीं थी, बल्कि काबुल और नई दिल्ली के बीच प्रगाढ़ होते संबंधों का स्पष्ट संकेत था। जब उनसे दोनों देशों के रिश्तों पर सवाल किया गया, तो उनका जवाब सीधे पाकिस्तान के दिल पर चोट कर गया। उन्होंने दो टूक कहा कि भारत और अफगानिस्तान का डीएनए एक ही है। उन्होंने यहाँ तक महसूस किया कि हिंदुस्तान आकर उन्हें बिल्कुल भी परायापन नहीं लगा, बल्कि ऐसा लगा जैसे वह अपने ही लोगों के बीच हों।
यह बयान पाकिस्तान के उस दशकों पुराने नैरेटिव को ध्वस्त करने वाला था, जिसमें वह भारत और अफगानिस्तान के बीच दूरियां दिखाने की कोशिश करता था। अफगान मंत्री का ‘साझा डीएनए’ की बात करना इस बात का सबूत है कि अफगान समाज अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ों को नहीं भूला है। वे जानते हैं कि सदियों से भारत और अफगानिस्तान के बीच व्यापार, संस्कृति और आपसी जुड़ाव की जड़ें कितनी गहरी हैं।
पाकिस्तान की तिलमिलाहट और विशेषज्ञों का विलाप
जैसे ही यह बयान वैश्विक मीडिया की सुर्खियां बना, पाकिस्तान में खलबली मच गई। वहां के न्यूज़ चैनल्स और जिओपॉलिटिकल एक्सपर्ट्स इस कदर बौखला गए कि वे तालिबान को ही कोसने लगे। पाकिस्तान को यह हजम नहीं हो रहा कि जिस तालिबान को उसने अपनी कूटनीतिक जीत का मोहरा समझा था, आज वही भारत के प्रति प्रेम प्रदर्शित कर रहा है। पाकिस्तानी विशेषज्ञ साजिद तरार ने तो मीडिया में आकर यहाँ तक कह दिया कि तालिबान के इस सुर के पीछे ‘भारत का पैसा’ बोल रहा है। उन्होंने अपनी हताशा में यह भी याद दिलाया कि पाकिस्तान ने ही तालिबान को पाला-पोसा है।
लेकिन पाकिस्तानी विशेषज्ञ यह समझने में विफल हैं कि आतंकवाद और नफरत के आधार पर कोई भी रिश्ता लंबे समय तक नहीं टिकता। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान को हमेशा अपने ‘स्ट्रैटेजिक डेप्थ’ के रूप में देखा, लेकिन आज का अफगानिस्तान एक स्वतंत्र राष्ट्र की तरह अपने हित और मित्र स्वयं चुन रहा है।
अफगान एक्टिविस्ट का जवाब: मजहबी कार्ड हुआ फेल
पाकिस्तान की इस बयानबाजी का जवाब भारत को देने की जरूरत भी नहीं पड़ी, क्योंकि अफगान एक्टिविस्ट फजल अफगान ने खुद ही पाकिस्तान को आईना दिखा दिया। उन्होंने सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के उस पाखंड की धज्जियां उड़ा दीं, जिसे वह इस्लामिक भाईचारे के नाम पर बेचता रहा है।
फजल ने स्पष्ट लहजे में कहा कि वे एक गर्वित अफगान मुस्लिम हैं और ‘हिंदू उनके दुश्मन नहीं रहे’। यह पाकिस्तान के उस प्रोपेगेंडा पर करारा तमाचा है जो हर रिश्ते को हिंदू बनाम मुस्लिम के चश्मे से देखता है। फजल ने पाकिस्तान की पोल खोलते हुए कहा कि असलियत में पाकिस्तान की सेना और सरकार ने ही दशकों से बेगुनाह अफगानियों का खून बहाया है। अफगानिस्तान ने जो तबाही देखी है, उसके पीछे पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का ही हाथ रहा है।
भारत की उदारता और सच्ची मित्रता
इसके विपरीत, अफगान जनता के मन में भारत के लिए केवल सम्मान है। फजल ने जोर देकर कहा कि भारत ने कभी अफगानिस्तान का अहित नहीं चाहा। संकट के हर मोड़ पर हिंदुस्तान एक सच्चे मित्र की तरह अफगानिस्तान के साथ खड़ा रहा है।
पिछले दो दशकों में भारत ने अफगानिस्तान में हथियार नहीं, बल्कि विकास के साधन भेजे हैं। भारत ने वहां स्कूलों, अस्पतालों और संसद भवन का निर्माण किया। सलमा डैम जैसी परियोजनाओं से अफगानिस्तान को बिजली और पानी मिला। भारत का 3 बिलियन डॉलर से अधिक का निवेश वहां के लोगों की भलाई के लिए है। जब वहां सत्ता बदली और मानवीय संकट पैदा हुआ, तब भी भारत ने गेहूं, दवाइयां और कोरोना वैक्सीन भेजकर अपनी दरियादिली साबित की।
बदलता वैश्विक समीकरण और भारत का कद
आज दक्षिण एशिया की भू-राजनीति बदल चुकी है। एक ओर आर्थिक तंगहाली और आतंकवाद से जूझता पाकिस्तान है, जिसके पास दुनिया को देने के लिए केवल नफरत है। दूसरी ओर उभरता हुआ भारत है, जो विकास के पथ पर सबको साथ लेकर चल रहा है। अफगानिस्तान ने पहचान लिया है कि उसका भविष्य किसके साथ सुरक्षित है।
पाकिस्तान की स्थिति आज अत्यंत दयनीय हो गई है। उसने जिस आतंकवाद को हथियार बनाया था, आज वही उसे भीतर से खोखला कर रहा है। वहीं भारत की डिप्लोमेसी आज अपने स्वर्णिम युग में है। अफगान मंत्री का यह बयान कि ‘भारत-अफगानिस्तान का डीएनए एक है’, इस बात पर मुहर लगाता है कि भारत के सांस्कृतिक संबंध सीमाओं के मोहताज नहीं हैं। सच्चाई यही है कि अफगानिस्तान अपना असली दोस्त पहचान चुका है और वह दोस्त केवल हिंदुस्तान है।

