सत्ता का संघर्ष या तानाशाही? नेपाल में बालेन शाह के खिलाफ फूटा युवाओं का गुस्सा, इस्तीफे की मांग तेज

पड़ोसी मुल्क नेपाल इस समय एक ऐसे ज्वालामुखी के मुहाने पर है, जिसमें विस्फोट हो चुका है। काठमांडू की सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब इस बात का गवाह है कि वर्तमान व्यवस्था की जड़ें हिल चुकी हैं। यह कोई राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि नेपाल के उस नौजवान का आक्रोश है, जो सत्ता की वादाखिलाफी से आहत है। एक ऐसी बगावत की शुरुआत हो चुकी है, जिसने नेपाल के सियासी गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।

इस पूरे घटनाक्रम की सबसे विडंबनापूर्ण बात यह है कि यह विरोध प्रदर्शन उसी व्यक्ति के विरुद्ध हो रहा है, जिसे इसी युवा पीढ़ी और ‘Gen Z’ ने अपना नायक मानकर सत्ता के शिखर तक पहुँचाया था। हम बात कर रहे हैं नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बालेन शाह की। आज बालेन शाह खुद अपने ही समर्थकों के निशाने पर हैं। उनकी सत्ता दांव पर है, काठमांडू की सड़कें जाम हैं और हर तरफ यही सवाल है कि आखिर बालेन शाह ने ऐसा क्या किया कि उनका सबसे बड़ा आधार ही उनका विरोधी बन गया?

2025 का जन-आंदोलन और बालेन शाह का उभार

आज की इस स्थिति को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे मुड़कर देखना होगा। साल 2025 में तत्कालीन प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली के खिलाफ एक ऐतिहासिक आंदोलन हुआ था। तब नेपाल का युवा भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सरकार के मनमाने फैसलों से तंग आकर सड़कों पर उतरा था। उस ‘Gen Z’ आंदोलन ने ओली सरकार की नींव हिला दी थी और अंततः सत्ता परिवर्तन हुआ।

इसी उथल-पुथल के दौर में एक नया चेहरा सामने आया—बालेन शाह। पेशे से स्ट्रक्चरल इंजीनियर और रैपर बालेन अपनी बेबाकी के लिए युवाओं में काफी लोकप्रिय थे। 2022 में काठमांडू के मेयर बनने के बाद, उन्होंने 2025 के जन-आक्रोश को एक नई दिशा दी। इसका परिणाम यह हुआ कि 2026 के चुनावों में उनकी पार्टी, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) को प्रचंड बहुमत मिला। मार्च 2026 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। देश को लगा कि अब ‘नया नेपाल’ बनेगा, लेकिन सत्ता में आने के बाद समीकरण बदलने लगे।

15 हजार बेघर और व्यवस्था की क्रूरता

प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन शाह ने कुछ ऐसे कड़े फैसले लिए जिसने गरीब तबके को झकझोर दिया। अप्रैल 2026 से राजधानी काठमांडू में झुग्गी-झोपड़ियों के खिलाफ एक आक्रामक बेदखली अभियान शुरू किया गया। विकास के नाम पर गरीबों के घर उजाड़े जाने लगे, वो भी बिना किसी ठोस पुनर्वास योजना के।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब तक 15,000 से अधिक लोग बेघर हो चुके हैं। इन परिवारों को अस्थाई कैंपों में बेहद खराब स्थितियों में रखा गया। अव्यवस्था का आलम यह था कि किर्तिपुर होल्डिंग सेंटर में बाढ़ आने के कारण 150 विस्थापितों को फिर से भागना पड़ा। इस मानवीय संकट ने जनता के गुस्से को दोबारा भड़का दिया है।

वो एक घटना जिसने आंदोलन में आग लगा दी

किसी भी बड़े विद्रोह को भड़कने के लिए एक तात्कालिक कारण चाहिए होता है, और नेपाल में वह कारण बना 25 वर्षीय गणेश नेपाली की दुखद मृत्यु। गणेश एक राइड-शेयरिंग ऐप के जरिए बाइक चलाकर अपना गुजारा करता था। आरोप है कि म्यूनिसिपल पुलिस ने उसकी बाइक को बेवजह जब्त कर लिया। सिस्टम की इस प्रताड़ना से टूटकर गणेश ने आत्मदाह कर लिया।

इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। जो युवा कभी बालेन शाह के लिए नारे लगाते थे, आज वे उनकी सरकार के खिलाफ सड़कों पर हैं।

पुलिसिया कार्रवाई या दमन का रास्ता?

विरोध प्रदर्शनों को शांत करने के बजाय, सरकार ने म्यूनिसिपल पुलिस के जरिए बल प्रयोग का रास्ता चुना। पुलिस, जिसका कार्य सुरक्षा देना है, वह प्रदर्शनकारियों पर लाठियां भांजती नजर आ रही है। छात्रों और युवाओं को गिरफ्तार कर जेलों में डाला जा रहा है।

कोशी प्रांत से लेकर काठमांडू तक, पुलिस की बर्बरता की खबरें आ रही हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि म्यूनिसिपल पुलिस अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर रही है। विपक्ष के नेता गगन कुमार थापा ने भी अब खुलकर प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया है और पुलिस की कार्रवाई को असंवैधानिक करार दिया है।

वादाखिलाफी के जाल में फंसी सरकार

नेपाल का युवा आज ठगा हुआ महसूस कर रहा है। बालेन शाह ने जो रोजगार और पारदर्शिता के वादे किए थे, वे धरातल पर नजर नहीं आ रहे। बेरोजगारी अब भी एक बड़ी समस्या है और भ्रष्टाचार की जड़ें वैसी ही बनी हुई हैं। अब प्रदर्शनकारियों की मांग स्पष्ट है: प्रधानमंत्री का इस्तीफा।

काठमांडू की सड़कों पर जारी यह संग्राम इस बात की सीख है कि सोशल मीडिया की लोकप्रियता के दम पर चुनाव जीतना अलग बात है और देश चलाना अलग। बालेन शाह की सरकार के लिए यह अग्निपरीक्षा का समय है—या तो वे जनता की मांगों को मानेंगे, या फिर उसी जनशक्ति का शिकार होंगे जिसने उन्हें प्रधानमंत्री बनाया था।

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