भारत के एक इशारे पर क्यों कांपी तारिक रहमान की सरकार? जानिए पर्दे के पीछे का पूरा सच!

एक तरफ बांग्लादेश के कट्टरपंथी नेता भारत को धमकियां दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ उनकी सरकार बंद कमरों में भारत से दो लाख टन डीजल की गुहार लगा रही है। क्या यह बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान का असली चेहरा है? क्या भारत के प्रति उनका विरोध मात्र एक दिखावा है, जबकि ढाका की अर्थव्यवस्था नई दिल्ली के सहयोग पर टिकी है? राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन के इस्तीफे से पहले शेख हसीना के साथ हुई उस गुप्त कॉल ने आखिर क्यों तारिक रहमान सरकार की नींद उड़ा दी? इसके साथ ही, आर्मी चीफ जनरल वाकर-उज़-जमां को पद से हटाने की सुगबुगाहट क्यों तेज हो गई है? क्या सेना के भीतर अभी भी शेख हसीना का प्रभाव बाकी है? दिसंबर 2026 की समय सीमा करीब है, जहां एक ओर हसीना की वापसी की चर्चा है, वहीं दूसरी ओर यदि भारत ने गंगा जल संधि पर हाथ खींच लिए, तो बांग्लादेश में तख्तापलट की स्थिति पैदा हो सकती है।

यह केवल एक कूटनीतिक हलचल नहीं, बल्कि एक गहरा पावर गेम है। एक ओर खोखली बयानबाजी है और दूसरी ओर भारत का ‘साइलेंट वेपन’, जिसने बिना कुछ कहे ढाका को संकट में डाल दिया है। विवाद की शुरुआत बांग्लादेश के गृह मंत्री सलाउद्दीन अहमद के भड़काऊ बयान से हुई, जिन्होंने भारत को चेतावनी दी कि यदि शेख हसीना को भारतीय जमीन से राजनीतिक गतिविधियों की अनुमति मिली, तो द्विपक्षीय संबंधों पर बुरा असर पड़ेगा। यह तनाव 5 अगस्त को दिल्ली में हुई हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद बढ़ा, जिसमें उन्होंने लोकतंत्र की बहाली के लिए बांग्लादेश लौटने का संकल्प लिया था। इस घोषणा ने तारिक रहमान सरकार की जड़ें हिला दी हैं।

बौखलाहट में गृह मंत्री ने ढाका यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में कहा कि भारत ‘हसीना कार्ड’ और ‘दोस्ती’ एक साथ नहीं निभा सकता। उन्होंने उम्मीद जताई कि भारतीय अधिकारी इस संवेदनशीलता को समझेंगे। हालांकि, इसी मंच से उन्होंने एक ऐसी बात कह दी जिसने उस प्रोपेगेंडा की पोल खोल दी, जिसे दुनिया ‘छात्र आंदोलन’ मान रही थी।

सलाउद्दीन अहमद ने स्वीकार किया कि यह आंदोलन अचानक नहीं हुआ, बल्कि 17 वर्षों के निरंतर संघर्ष का परिणाम था। उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीति में अनुभव का कोई विकल्प नहीं है और यह सोचना गलत है कि सब कुछ केवल 36 दिनों में हासिल हो गया। इस बयान ने पुख्ता कर दिया कि छात्र तो केवल एक मुखौटा थे, जबकि पटकथा बहुत पहले से लिखी जा रही थी। यह एक सुनियोजित वैश्विक इनसाइडर नेक्सस का हिस्सा था।

ढाका की कूटनीतिक अस्थिरता अब स्पष्ट दिख रही है। विदेश राज्य मंत्री शामा ओबैद इस्लाम ने कड़े स्वर में कहा कि हसीना को बयानबाजी की छूट देकर भारत ने गलत संदेश दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब कोई ‘दोषी’ व्यक्ति भारत से बांग्लादेश में उग्रवाद फैलने का दावा करता है और दिल्ली उसे मंच देती है, तो यह चिंताजनक है। अब भारत को यह तय करना होगा कि वह भविष्य में ढाका के साथ कैसे संबंध चाहता है।

प्रथम आलो की रिपोर्ट के अनुसार, शामा ओबैद ने भारत से बार-बार अपना रुख स्पष्ट करने की मांग की। उन्होंने दावा किया कि ‘उग्रवाद’ की थ्योरी अवामी लीग की पुरानी चाल है। ओबैद ने यह भी कहा कि यदि भारत ने हसीना को नहीं रोका, तो यह बांग्लादेश की जनता के लिए अपमानजनक होगा, क्योंकि हसीना वहां कई मामलों में सजायाफ्ता हैं।

हालांकि, कूटनीति के पन्नों में विरोधाभास साफ है। एक तरफ धमकियां हैं, तो दूसरी तरफ ओबैद ने ऊर्जा सहयोग और जल बंटवारे पर बातचीत जारी रखने की इच्छा भी जताई। जब ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में तारिक रहमान की भागीदारी पर सवाल उठा, तो उन्होंने इसे कूटनीतिक अवसर बताया। यानी भारत को कोसना उनकी मजबूरी है, लेकिन भारत का साथ उनकी जरूरत।

पर्दे के पीछे की कहानी अलग है। शोर मचाने वाले मंत्री अब भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी से मुलाकात का समय मांग रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, 10 अगस्त को प्रधानमंत्री तारिक रहमान और भारतीय उच्चायुक्त के बीच एक महत्वपूर्ण बैठक तय हुई। गौर करने वाली बात यह है कि यह अनुरोध जुलाई से लंबित था, लेकिन ऊर्जा संकट गहराते ही ढाका को भारत की याद आने लगी।

दिनेश त्रिवेदी ने बांग्लादेश के ऊर्जा मंत्री इकबाल हसन महमूद से भी लंबी मुलाकात की। जिस भारत को ये आंखें दिखा रहे हैं, उसी से ढाका ने सालाना दो लाख टन डीजल की आपूर्ति मांगी है। इसके अलावा, बिजली क्षेत्र के 25 अलग-अलग क्षेत्रों में तकनीकी सहायता और ग्रिड ट्रांसफर के लिए भी भारत के आगे हाथ फैलाए गए हैं। भारत ने सैद्धांतिक सहमति तो दी है, लेकिन नियंत्रण पूरी तरह से नई दिल्ली के हाथ में है।

वैश्विक ऊर्जा संकट और चरमराती अर्थव्यवस्था के बीच, भारतीय डीजल और बिजली के बिना बांग्लादेश का अंधेरे में डूबना तय है। भारत बांग्लादेश का सबसे बड़ा क्षेत्रीय व्यापारिक भागीदार और ऊर्जा प्रदाता है। तारिक रहमान जानते हैं कि नारों से देश नहीं चलता, और यदि भारत ने सप्लाई लाइन रोक दी, तो उनकी सरकार का टिकना मुश्किल हो जाएगा।

संकट केवल बाहरी नहीं, आंतरिक भी है। राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन के जाने के बाद अब आर्मी चीफ जनरल वाकर-उज़-जमां की स्थिति भी डांवाडोल है। कहा जा रहा है कि शहाबुद्दीन ने इस्तीफे से पहले हसीना से गुप्त वार्ता की थी, जिसके कारण उन्हें पद छोड़ना पड़ा। वह हसीना के करीबी माने जाते थे और बीएनपी सरकार उन्हें लेकर हमेशा आशंकित रही।

अब यही डर आर्मी चीफ को लेकर भी है। जनरल वाकर-उज़-जमां की नियुक्ति हसीना के समय हुई थी और उनके साथ उनके पारिवारिक संबंध भी हैं। भले ही आंदोलन के समय उन्होंने सेना का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन वर्तमान सरकार को लगता है कि वह भविष्य में हसीना के लिए ‘एसेट’ साबित हो सकते हैं।

तारिक रहमान सरकार को भय है कि यदि हसीना वापस लौटती हैं, तो सेना प्रमुख उनकी मदद कर सकते हैं। सेना के भीतर किसी भी प्रकार की बगावत वर्तमान सरकार को ताश के पत्तों की तरह ढहा सकती है। इसी अविश्वास के कारण सेना प्रमुख को हटाने की रणनीति बनाई जा रही है।

वर्तमान में बांग्लादेश के भीतर अवामी लीग के समर्थकों को निशाना बनाया जा रहा है। हिंसा और राजनीतिक मुकदमों का दौर जारी है। यह क्रूरता तारिक रहमान की शक्ति नहीं, बल्कि उनका खौफ दर्शाती है। उन्हें पता है कि हसीना का प्रभाव अभी भी जड़ों में है और भारत का मौन समर्थन उस प्रभाव को कभी भी पुनः सक्रिय कर सकता है।

भारत का सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक ‘गंगा जल संधि’ है। 1996 में हुई यह संधि इस साल दिसंबर में समाप्त हो रही है। भारत ने इसके नवीनीकरण पर रणनीतिक चुप्पी साध ली है, जिससे ढाका में घबराहट है।

बांग्लादेश ने जून में बातचीत का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन नई दिल्ली से कोई जवाब नहीं आया। जवाब न मिलने पर तारिक रहमान सरकार ने तकनीकी समितियों और ज्वॉइंट रिवर्स कमीशन का पुनर्गठन किया है ताकि किसी भी तरह संवाद शुरू हो सके। वे भारत के उत्तर का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

गंगा जल संधि का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि सूखे के मौसम में पानी का बंटवारा इसी पर निर्भर करता है। यदि फरक्का बैराज से पानी का प्रवाह कम होता है, तो बांग्लादेश के लिए पानी की मात्रा भी कम हो जाती है।

बांग्लादेशी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नया समझौता नहीं हुआ या न्यूनतम पानी की गारंटी नहीं मिली, तो देश का एक बड़ा हिस्सा सूखे की चपेट में आ जाएगा। यह उनकी कृषि और जीवन के लिए सीधा खतरा है।

भारत की रणनीति स्पष्ट है: ‘रणनीतिक स्वायत्तता’। जब तक ढाका में भारत विरोधी तत्व सक्रिय रहेंगे, भारत किसी भी नई संधि के लिए जल्दबाजी नहीं दिखाएगा। पानी और ऊर्जा वे दो चाबियां हैं, जिनसे भारत बांग्लादेश की राजनीति को नियंत्रित करने की क्षमता रखता है। दिसंबर 2026 तक यदि संधि नहीं होती, तो भारत पानी के बहाव को अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार मोडऩे के लिए स्वतंत्र होगा, जो ढाका के लिए सबसे बड़ा दुःस्वप्न है।

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