वैश्विक समुद्री रास्तों पर इस समय एक बड़ा कूटनीतिक युद्ध छिड़ा हुआ है, जिसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। इस अंतरराष्ट्रीय बिसात पर एक ऐसा खेल खेला गया, जहां महाशक्ति अमेरिका ने अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर भारत जैसे उभरते देशों की घेराबंदी करने की कोशिश की। अमेरिका ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग, ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पर सख्त और अघोषित पाबंदियां लगा दीं। यह वही मार्ग है जहां से दुनिया के कच्चे तेल और गैस की सबसे बड़ी खेप गुजरती है। स्थिति ऐसी पैदा कर दी गई कि एशियाई देशों के सामने औद्योगिक ठप होने और ऊर्जा संकट का काला साया मंडराने लगा। अमेरिका की रणनीति स्पष्ट थी—दुनिया पर दबाव बनाकर उन्हें महंगा अमेरिकी तेल खरीदने के लिए मजबूर करना और इस संकट से अपना खजाना भरना। लेकिन वॉशिंगटन के रणनीतिकार यह भूल गए कि ‘न्यू इंडिया’ दबाव में बिखरता नहीं, बल्कि उसे अवसर में बदलना जानता है। भारत ने इस साजिश को नाकाम करने के लिए अपने पुराने सहयोगी रूस के साथ मिलकर एक ऐसा दांव चला जिसने अमेरिका के मंसूबों को ध्वस्त कर दिया। आज हम विश्लेषण करेंगे कि कैसे रूस ने अपने ऊर्जा के खजाने भारत के लिए खोले और अमेरिकी धमकियां धरी की धरी रह गईं।
इस बड़े संकट की जड़ अमेरिका के उन नीतिगत फैसलों में है, जिनका अंतरराष्ट्रीय बाजार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। अमेरिकी नेतृत्व ने दुनिया भर में युद्ध रोकने के दावे तो किए, लेकिन हकीकत में तनाव और बढ़ गया, जिससे कच्चे तेल की कीमतें बेलगाम हो गईं। ग्लोबल मार्केट में क्रूड ऑयल के दाम इतनी अस्थिरता के साथ ऊपर-नीचे हुए कि बड़े-बड़े अर्थशास्त्री भी चकित रह गए। कभी कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल पर आतीं, तो कभी अचानक 110 डॉलर के पार पहुँच जातीं। इस अनिश्चितता ने उन देशों की आर्थिक नींव हिला दी जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर हैं।
इसी गहमागहमी के बीच, अमेरिका ने कूटनीतिक दबंगई दिखाते हुए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नाकेबंदी बढ़ा दी। यह संकरा समुद्री रास्ता वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवन रेखा है। खाड़ी देशों से आने वाला तेल और गैस इसी रास्ते से आता है। इस नस को दबाकर अमेरिका ने भारत पर सीधा दबाव बनाया कि वह मध्य-पूर्व से ऊर्जा लेना बंद करे और सीधे अमेरिका से तेल खरीदे।
भारत के लिए अमेरिकी तेल खरीदना न तो किफायती था और न ही व्यावहारिक। इसके दो मुख्य कारण थे: पहला, अमेरिकी कच्चे तेल की ऊँची आधार कीमत; और दूसरा, दोनों देशों के बीच की विशाल भौगोलिक दूरी। अमेरिका से भारत तक तेल लाने का परिवहन शुल्क अरब देशों की तुलना में तीन से चार गुना अधिक है। यदि भारत इस दबाव में आता, तो देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छूने लगतीं और महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ देती। अमेरिका ने भारत को एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसाने की कोशिश की थी जिससे निकलना लगभग असंभव लग रहा था।
ठीक इसी चुनौतीपूर्ण समय में रूस ने एक सच्चे मित्र की भूमिका निभाई। कूटनीति की दुनिया में कहा जाता है कि जब भी भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव होगा, मॉस्को मजबूती से दिल्ली के साथ खड़ा रहेगा। आज के ऊर्जा संकट में यह बात पूरी तरह सच साबित हुई। जब पश्चिमी देश रास्ते बंद कर रहे थे, तब रूस ने भारत के लिए अपने हाइड्रोकार्बन के विशाल भंडार खोल दिए।
हालिया आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत अब चीन के बाद रूस का दूसरा सबसे बड़ा ऊर्जा भागीदार बन गया है। भारत की यह रणनीति केवल कच्चे तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें एक बड़ा ‘स्मार्ट शिफ्ट’ हुआ है जिसने पश्चिम को हैरान कर दिया है। भारत अब रूस से बड़े पैमाने पर हाइड्रोकार्बंस खरीद रहा है, जिसमें तेल के साथ-साथ कोयला और अन्य ऊर्जा स्रोत शामिल हैं। केवल मई महीने में भारत ने रूस से लगभग 5 बिलियन डॉलर का तेल खरीदा, और साथ ही 1 बिलियन डॉलर का कोयला भी आयात किया। कुल मिलाकर, रूस से हाइड्रोकार्बन आयात में 38% का भारी उछाल आया है, जो यह दर्शाता है कि भारत ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति को कितनी कुशलता से विविधता प्रदान की है।
यहाँ एक प्रश्न उठता है कि कोयले का बड़ा उत्पादक होने के बावजूद भारत रूस से कोयला क्यों मंगा रहा है? इस मास्टरस्ट्रोक के पीछे छिपी है ‘गैस क्राइसिस’ की समस्या। भारत अपनी 90% गैस जरूरत कतर और ईरान जैसे देशों से पूरी करता है। अमेरिका द्वारा होर्मुज मार्ग बाधित किए जाने से गैस टैंकरों की आपूर्ति मुश्किल हो गई थी।
गैस की कमी का सीधा असर देश के भारी उद्योगों, विशेषकर स्टील सेक्टर पर पड़ता है। भारतीय स्टील उद्योग सस्ती गैस पर निर्भर है। वैश्विक बाजार में चीन अपना सस्ता स्टील डंप कर भारतीय बाजार को चोट पहुँचाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में अगर भारतीय फैक्टरियों को महंगी गैस का उपयोग करना पड़ता, तो हमारा स्टील उत्पादन इतना महंगा हो जाता कि हम चीन का मुकाबला नहीं कर पाते और फैक्टरियों पर ताले लग जाते।
इस खतरे को भांपते हुए भारत सरकार और उद्योगपतियों ने रणनीतिक बदलाव किया। उन्होंने स्टील फैक्टरियों को प्राकृतिक गैस से हटाकर रूसी हाई-क्वालिटी कोयले पर शिफ्ट कर दिया। रूस से मिलने वाले इस सस्ते और उच्च गुणवत्ता वाले कोयले ने भारतीय स्टील इंडस्ट्री को नई जान दी है। इससे उत्पादन लागत कम रही और चीन की डंपिंग रणनीति पूरी तरह विफल हो गई।
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा लाभ देश के आम नागरिकों को मिला। जब बड़े उद्योगों ने गैस के बजाय रूसी कोयले का उपयोग शुरू किया, तो वह बची हुई गैस घरेलू उपयोग (रसोई गैस) के लिए उपलब्ध कराई गई। इससे वैश्विक उथल-पुथल के बावजूद भारत में गैस की किल्लत नहीं हुई और न ही कीमतें अनियंत्रित हुईं। रूस से मिलने वाले इस ‘हाइड्रोकार्बन पैकेज’ ने भारत को औद्योगिक और घरेलू, दोनों मोर्चों पर सुरक्षित कर दिया है।
पश्चिमी विश्लेषक भले ही इसे रूस का व्यापारिक लाभ कहें, लेकिन वास्तविकता यह है कि संकट के समय बिना किसी राजनीतिक शर्त और ब्लैकमेलिंग के ऊर्जा की निरंतर आपूर्ति करना ही सच्ची कूटनीति है। रूस ने कड़े पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद भारत के लिए अपनी सप्लाई चेन को सुचारू रखा।
इस घटनाक्रम ने दुनिया को संदेश दिया है कि अब कोई भी देश भारत की विदेश नीति को रिमोट कंट्रोल से नहीं चला सकता। अमेरिका चाहता था कि हम अपनी ऊर्जा सुरक्षा दांव पर लगाकर उसका महंगा तेल खरीदें, लेकिन भारत ने रूस के साथ व्यापार को नए शिखर पर ले जाकर यह साफ कर दिया कि राष्ट्रहित सर्वोपरि है।
आज की दुनिया बहुध्रुवीय (Multipolar) है। अमेरिका ने होर्मुज में जो दबाव का खेल शुरू किया था, वह उसी पर भारी पड़ गया और इससे भारत-रूस की दोस्ती और अधिक प्रगाढ़ हो गई। जब दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं चरमरा रही थीं, तब भारत 110 डॉलर प्रति बैरल की चुनौतियों के बीच भी सबसे तेज गति से बढ़ने वाली इकोनॉमी बना रहा।
भारत अब अपनी शर्तों पर व्यापार करता है। हम किसी महाशक्ति के डिक्टेशन पर नहीं, बल्कि अपनी जनता के हितों के आधार पर निर्णय लेते हैं। अपनी इंडस्ट्री को बचाना और नागरिकों को सस्ती ऊर्जा देना ही आज के भारत की प्राथमिकता है। इस रणनीतिक जीत पर आपकी क्या राय है? कमेंट में जरूर बताएं।

