रूस का Su-57 ऑफर: क्या भारत का स्वदेशी AMCA प्रोजेक्ट खतरे में है? पुतिन के इस ‘मास्टरस्ट्रोक’ का पूरा सच

ठीक उस समय जब भारत 114 राफेल विमानों की खरीद की तैयारी कर रहा था और फ्रांस की सफ्रान के साथ मिलकर छठी पीढ़ी (6th Gen) का इंजन बनाने की डील फाइनल होने वाली थी, व्लादिमीर पुतिन ने एक चौंकाने वाला दांव चला है। रूस का यह ऑफर दिल्ली से लेकर पेरिस और वॉशिंगटन तक चर्चा का विषय बन गया है। क्या सुखोई Su-57 की ‘क्विक डिलीवरी’ भारत के लिए एक तोहफा है या फिर पश्चिमी देशों से भारत को दूर करने और उसे रूसी हथियारों पर निर्भर बनाए रखने का एक जाल? क्या रूस भारत को वह 6th Gen तकनीक देने को तैयार है जो रडार को चकमा दे सकती है? क्या Su-57D का ड्रोन कमांड सेंटर चीन के J-20 का मुकाबला कर पाएगा, या फिर यह पूर्व वायुसेना प्रमुख आर के एस भदौरिया की उस चेतावनी को सच करेगा कि यह भारत के स्वदेशी AMCA प्रोजेक्ट के लिए ‘डेथ वारंट’ साबित हो सकता है? आज हम इसी सामरिक उलझन का विश्लेषण करेंगे।

इस रूसी चाल को समझने के लिए इसकी ‘टाइमिंग’ पर गौर करना जरूरी है। भारत फिलहाल अपने MRFA टेंडर के तहत राफेल को प्राथमिकता दे रहा है और स्वदेशी 5th जनरेशन जेट AMCA के इंजन के लिए अमेरिका की GE और फ्रांस की Safran से बातचीत कर रहा है। रूस को यह डर सता रहा है कि यदि इस बार भारत उसके हाथ से निकला, तो अगले कई दशकों तक वह भारतीय विमानन बाजार में वापसी नहीं कर पाएगा। इसी बाजार को बचाने के लिए रूस ने न केवल एक विमान, बल्कि एक पूरा आधुनिक इकोसिस्टम और हथियारों का पैकेज पेश किया है, जो भारतीय वायुसेना (IAF) की तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने का दावा करता है।

डिफेंस रिपोर्ट्स के अनुसार, रूस ने भारत को 8 से 10 Su-57 विमानों के तत्काल ट्रांसफर का प्रस्ताव दिया है। इसे एक ‘स्टॉपगैप’ समाधान के रूप में पेश किया जा रहा है ताकि जब तक भारत का अपना AMCA तैयार न हो जाए, तब तक भारतीय पायलट स्टील्थ तकनीक और आधुनिक एविओनिक्स का अनुभव ले सकें। यह ऑफर चीन द्वारा LAC पर तैनात J-20 फाइटर्स का मुकाबला करने के लिए काफी आकर्षक लग रहा है, क्योंकि Su-57 की रडार को चकमा देने वाली क्षमता और घातक सेंसर्स इसे एक बेहतरीन फाइटर बनाते हैं।

इस डील का सबसे बड़ा आकर्षण R-77M मिसाइल (Izdeliye 180) है। रूस ने इस घातक हथियार की तकनीक भारत को देने की पेशकश की है, जो चीन की PL-15 मिसाइल को कड़ी टक्कर दे सकती है। यह एक BVR (बियॉन्ड विजुअल रेंज) मिसाइल है जिसकी मारक क्षमता 200 किमी तक है। इसकी खासियत इसका ‘डुअल पल्स रॉकेट मोटर’ है, जो टर्मिनल फेज (अंतिम क्षणों) में मिसाइल की गति को अचानक बढ़ा देता है, जिससे दुश्मन के पायलट को बचने का कोई मौका नहीं मिलता। यह तकनीक भारत की ‘अस्त्र’ मिसाइल के मैच्योर होने तक वायुसेना को एक बड़ी बढ़त दिला सकती है।

रूस का अगला दांव 6th जनरेशन की तकनीक से जुड़ा है। सुखोई ने Su-57D के दो सीटों वाले वर्जन का प्रस्ताव दिया है, जो एक ‘एयरबोर्न कमांड पोस्ट’ की तरह काम करेगा। इसमें पीछे बैठा ऑपरेटर ‘S-70 Okhotnik’ जैसे भारी स्टील्थ ड्रोन्स के झुंड को नियंत्रित करेगा। यह ‘मैन्ड अनमैन्ड टीमिंग’ (MUM-T) तकनीक युद्ध के मैदान में पासा पलट सकती है, जहाँ ड्रोन आगे बढ़कर रडार जाम करेंगे और दुश्मन पर हमला करेंगे। रूस का दावा है कि भारत को यह आधुनिक एआई आधारित तकनीक समय से काफी पहले मिल सकती है।

लेकिन सवाल यह है कि यदि ऑफर इतना अच्छा है, तो भारत हिचकिचा क्यों रहा है? पूर्व वायुसेना प्रमुख आर के एस भदौरिया ने चेतावनी दी है कि रूस का यह प्रस्ताव स्वदेशी AMCA प्रोजेक्ट के विकास को रोक सकता है। भारत ने मार्च 2024 में AMCA के लिए 15,000 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं, और विदेशी विमानों की खरीद इस निवेश को व्यर्थ कर सकती है।

भदौरिया की चिंता यह है कि सैन्य खरीद में ‘सिर्फ कुछ विमान’ जैसा कुछ नहीं होता। एक बार जब वायुसेना में 10 रूसी विमान शामिल होंगे, तो उनके लिए अलग ट्रेनिंग, सिमुलेटर और मेंटेनेंस इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना होगा। बाद में इसी इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर और अधिक विमान खरीदने का दबाव बढ़ेगा, जिससे स्वदेशी प्रोजेक्ट के फंड और मैनपावर पर बुरा असर पड़ेगा।

सीमित रक्षा बजट के कारण, यदि पैसा Su-57 की फ्लीट को बनाए रखने में खर्च हो गया, तो AMCA प्रोजेक्ट अधर में लटक सकता है। यह विदेशी निर्भरता भारत के आत्मनिर्भर बनने के सपने को बड़ा झटका दे सकती है।

रूस ने HAL की नासिक फैसिलिटी का उपयोग करने का सुझाव दिया है, जहाँ पहले से ही Su-30MKI का काम हो रहा है। यह ‘प्लगे एंड प्ले’ मॉडल सुनने में तो अच्छा है, लेकिन यह भारत को अगले 50 सालों के लिए रूसी सप्लाई चेन का बंधक बना सकता है।

AMCA का विकास तकनीकी रूप से बहुत जटिल है। इसमें स्टील्थ डिजाइन और जेट इंजन जैसी चुनौतियां हैं। भदौरिया को डर है कि विदेशी विमान मिलने के बाद DRDO और ADA पर से दबाव कम हो जाएगा, जिससे प्रोजेक्ट में देरी होगी और वायुसेना फिर से विदेशी जहाजों की मांग करेगी।

एक और बड़ा जोखिम अमेरिकी प्रतिबंधों (CAATSA) का है। यूक्रेन युद्ध के कारण रूस पर कड़े प्रतिबंध लगे हैं। ऐसे में Su-57 की डील भारत-अमेरिका के बीच चल रही जेट इंजन और क्रिटिकल टेक्नोलॉजी की बातचीत को बिगाड़ सकती है। अमेरिका GE F414 इंजन देने से मना कर सकता है, जो AMCA के शुरुआती चरणों के लिए बेहद जरूरी है।

साथ ही, युद्ध के कारण रूस खुद स्पेयर पार्ट्स और इलेक्ट्रॉनिक्स की कमी से जूझ रहा है। ऐसे में भारत अपनी सुरक्षा को एक अनिश्चित सप्लाई चेन के भरोसे नहीं छोड़ सकता।

मोदी सरकार का लक्ष्य भारत को ‘ग्लोबल डिफेंस हब’ बनाना है। ब्रह्मोस और तेजस के निर्यात के साथ भारत अपनी धाक जमा रहा है। ऐसे में वापस विदेशी जेट पर निर्भर होना ‘आत्मनिर्भर भारत’ के विजन के खिलाफ है।

निष्कर्ष यह है कि Su-57 एक शक्तिशाली विमान है, लेकिन यह एक अल्पकालिक समाधान है। दीर्घकालिक संप्रभुता के लिए भारत को अपनी स्टील्थ तकनीक और इंजन खुद विकसित करने होंगे। भदौरिया की पुकार एक दूरदर्शी सोच है जो मानती है कि बिना संघर्ष के आत्मनिर्भरता संभव नहीं है।

यदि भारत आज AMCA पर अडिग रहता है, तो 2030 के दशक में हमारे पास अपना खुद का अजेय फाइटर होगा। सवाल सिर्फ एक विमान का नहीं, बल्कि भारत के अगले 50 साल के गौरव और सामरिक स्वतंत्रता का है।

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