भारतीय रक्षा के इतिहास में 8 जुलाई की तारीख एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में जुड़ गई है। ओडिशा के चांदीपुर से जैसे ही लंबी दूरी के निर्देशित रॉकेट (LRGR) पिनाका ने उड़ान भरी, इसकी धमक ने वैश्विक महाशक्तियों को हैरान कर दिया। यह महज एक साधारण सैन्य परीक्षण नहीं था, बल्कि आधुनिक भारत की उस सामरिक शक्ति का प्रमाण था जो अब दुनिया को बता रहा है कि हम हथियारों के केवल खरीदार नहीं, बल्कि उन्नत तकनीक के जनक भी हैं। पिनाका का यह नया वर्जन वैश्विक रक्षा बाजार में एक गेम-चेंजर के रूप में उभर रहा है, जिसने बड़े-बड़े दिग्गजों को भी दंग कर दिया है।
- सिर्फ 44 सेकंड में तबाही का मंजर
- मारक क्षमता का रहस्य: 100 किमी के पार की मार
- पुराने लॉन्चर से ही होगा नए रॉकेट का प्रहार
- NavIC तकनीक और हर मौसम में मारक क्षमता
- चीन और पाकिस्तान के खिलाफ अजेय बढ़त
- ग्लोबल मार्केट में पिनाका की गूंज: फ्रांस और आर्मेनिया की पसंद
- भविष्य की तैयारी: पिनाका Mk-III और रैमजेट इंजन
सिर्फ 44 सेकंड में तबाही का मंजर
पिनाका को तकनीकी रूप से मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर (MBRL) कहा जाता है, लेकिन इसकी कार्यप्रणाली इसे बेहद घातक बनाती है। यह सिस्टम ‘सैचुरेशन स्ट्राइक’ के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका अर्थ है दुश्मन के इलाके पर इतने कम समय में इतने अधिक रॉकेट दागना कि वहां बचाव की कोई संभावना न रहे। यह तकनीक दुश्मन की सेना के मनोबल को पूरी तरह से तोड़ने की क्षमता रखती है।
इसकी एक बैटरी में कुल 6 लॉन्चर होते हैं और प्रत्येक लॉन्चर में 12 रॉकेट फिट किए जा सकते हैं। एक सिंगल कमांड के जरिए यह पूरी बैटरी मात्र 44 सेकंड में 72 रॉकेट दाग सकती है। ये रॉकेट जब एक साथ जमीन पर गिरते हैं, तो लगभग एक वर्ग किलोमीटर का इलाका, जिसमें दुश्मन के बंकर, रडार स्टेशन और कम्युनिकेशन सेंटर शामिल हों, पलक झपकते ही मलबे के ढेर में बदल जाता है।
मारक क्षमता का रहस्य: 100 किमी के पार की मार
हालिया परीक्षणों ने रक्षा विशेषज्ञों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी जानकारी में इस सिस्टम की न्यूनतम मारक क्षमता 60 किलोमीटर बताई गई है। रक्षा गलियारों में यह चर्चा तेज है कि यदि इसकी न्यूनतम सीमा 60 किमी है, तो अधिकतम सीमा निश्चित रूप से 100 से 120 किलोमीटर के बीच होगी।
इस असली रेंज को गोपनीय रखने का मुख्य उद्देश्य युद्ध के समय दुश्मन को रणनीतिक रूप से चौंकाना है। 60 किलोमीटर तो केवल एक शुरुआत है; असली ताकत तो 100 किलोमीटर से अधिक की दूरी पर बैठे दुश्मन के ठिकानों को नेस्तनाबूद करने की है, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी।
पुराने लॉन्चर से ही होगा नए रॉकेट का प्रहार
डीआरडीओ के वैज्ञानिकों का सबसे बड़ा करिश्मा यह है कि उन्होंने इस नए उन्नत रॉकेट को इस तरह डिजाइन किया है कि इसे पुराने पिनाका लॉन्चरों से भी दागा जा सकता है। आम तौर पर नई मिसाइल या रॉकेट के लिए सेनाओं को नए और महंगे लॉन्चिंग सिस्टम खरीदने पड़ते हैं, जो एक बड़ा आर्थिक बोझ होता है।
लेकिन स्वदेशी तकनीक की मदद से भारतीय सेना बिना किसी अतिरिक्त खर्च के अब 100 किलोमीटर की रेंज तक सटीक निशाना लगा सकती है। यह भारत का एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक है जिसने विदेशी हथियार निर्माताओं के मुनाफे के गणित को बिगाड़ दिया है।
NavIC तकनीक और हर मौसम में मारक क्षमता
पश्चिमी देशों के हथियार अक्सर खराब मौसम या विषम परिस्थितियों में फेल हो जाते हैं। हाल के युद्धों में देखा गया है कि यूरोपीय और अमेरिकी सिस्टम अत्यधिक ठंड या धूल भरे इलाकों में काम करना बंद कर देते हैं। इसके विपरीत, पिनाका को भारत की कठोर भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार ढाला गया है। यह सिस्टम माइनस 40 डिग्री से लेकर प्लस 55 डिग्री सेल्सियस तक पूरी कुशलता के साथ प्रहार कर सकता है।
सियाचिन की हड्डियों को गला देने वाली ठंड हो या राजस्थान की तपती गर्मी, पिनाका के सेंसर्स और सॉलिड प्रोपेलेंट इसे कभी धोखा नहीं देने देते। इसमें भारत का अपना स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम (NavIC) लगा है, जो इसे उपग्रहों की मदद से पिनपॉइंट एक्यूरेसी (सटीक निशाना) प्रदान करता है।
चीन और पाकिस्तान के खिलाफ अजेय बढ़त
पिनाका सिस्टम भारत को दोहरे मोर्चे (Two-Front War) पर बड़ी बढ़त दिलाता है। नियंत्रण रेखा (LoC) पर छिपे आतंकी अड्डों को तबाह करने के लिए अब वायुसेना भेजने की जरूरत नहीं होगी; पिनाका महज 44 सेकंड में सीमा पार बैठे आतंकियों का सफाया कर सकता है। पाकिस्तान के पास वर्तमान में पिनाका की रफ्तार को रोकने का कोई प्रभावी उपाय नहीं है।
वहीं चीन के मोर्चे पर, लद्दाख जैसी अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पिनाका की मारक क्षमता और भी बढ़ जाती है। पतली हवा के कारण रॉकेट और अधिक दूरी तय कर सकता है, जिससे भारतीय सेना वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास स्थित चीनी सेना के कमांड सेंटर्स को आसानी से निशाना बना सकती है।
ग्लोबल मार्केट में पिनाका की गूंज: फ्रांस और आर्मेनिया की पसंद
आज वैश्विक स्तर पर पिनाका की मांग तेजी से बढ़ी है। अमेरिका का HIMARS सिस्टम सटीक तो है, लेकिन वह बहुत महंगा है और अमेरिका उसे कई शर्तों के साथ बेचता है। पिनाका न केवल सस्ता है, बल्कि कारगिल युद्ध जैसे संघर्षों में ‘बैटल-प्रूवन’ (युद्ध में सफल) भी साबित हो चुका है।
यही वजह है कि आर्मेनिया के बाद अब फ्रांस जैसे नाटो सदस्य देश भी पिनाका को अपनी सेना में शामिल करने पर विचार कर रहे हैं। फ्रांस का इसमें दिलचस्पी दिखाना भारतीय रक्षा प्रौद्योगिकी की बढ़ती प्रतिष्ठा का प्रमाण है। ब्राजील और कई अन्य देश भी इस स्वदेशी तकनीक को अपनाने के लिए कतार में हैं।
भविष्य की तैयारी: पिनाका Mk-III और रैमजेट इंजन
डीआरडीओ अब पिनाका के अगले संस्करण Mk-III पर काम कर रहा है, जिसकी रेंज 200 किलोमीटर तक होने की उम्मीद है। इसके अलावा, रैमजेट इंजन तकनीक के उपयोग से इसकी गति को हाइपरसोनिक बनाया जाएगा, जिससे दुनिया का कोई भी रडार इसे ट्रैक नहीं कर पाएगा। भविष्य में यह सिस्टम स्वार्म ड्रोन्स को भी लॉन्च करने में सक्षम होगा।
पिनाका अब केवल एक हथियार नहीं, बल्कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ का गौरव बन चुका है। जो देश कल तक भारत को तकनीक देने से मना करते थे, आज वही हमारे वैज्ञानिकों की उपलब्धियों को देख रहे हैं। भारत अब रक्षा क्षेत्र में एक महाशक्ति के रूप में तेजी से उभर रहा है।

