खलनायक चीन की विस्तारवादी नीतियां और भारत के सामरिक हितों पर सीधा प्रहार, आज हिंद महासागर के शांत पानी के नीचे एक बहुत बड़ा भू-राजनीतिक तूफान खड़ा कर चुका है। सवाल यह है कि आखिर क्यों मालदीव का एक पूरा का पूरा द्वीप सिर्फ 33 करोड़ की चिल्लर कीमत में रातों-रात चीन को सौंप दिया गया? क्या भारत से महज 600 किलोमीटर दूर, समुद्र के नीचे चीन ने कोई ऐसा खौफनाक मिलिट्री बेस तैयार कर लिया है जिसकी भनक दुनिया को तब लगेगी जब बहुत देर हो चुकी होगी? भारत के 500 million USD से बन रहे Greater Male Connectivity Project के आखिरी छोर पर ऐसा क्या खजाना छिपा है कि राष्ट्रपति मुइज्जू ने रातों-रात उस Thilafushi पोर्ट का कंट्रोल एक चीनी सरकारी कंपनी के हाथों में सौंप दिया? मालदीव की गद्दारी और चीन की चालाकी के बाद गुस्से में 17 सितंबर की उस रात दिल्ली के साउथ ब्लॉक में मोदी सरकार ने ऐसा क्या फैसला लिया कि एक ही झटके में बर्बाद हो गया मालदीव? और लक्षद्वीप के Minicoy में भारत का ऐसा क्या गुप्त मिलिट्री ऑपरेशन चल रहा है जिसने शी जिनपिंग की नींद उड़ा दी है?
मालदीव की आर्थिक तबाही और दिवालियापन का सच
आज मालदीव की अर्थव्यवस्था अपने इतिहास के सबसे काले दौर से गुजर रही है। देश पूरी तरह से दिवालिया होने की कगार पर खड़ा है। मालदीव एक ऐसा देश है जहां पीने के पानी से लेकर जीवनरक्षक दवाएं, निर्माण सामग्री और ईंधन तक सब कुछ बाहर से आयात होता है। इन सब का भुगतान American Dollar में करना होता है। लेकिन आज मालदीव का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग सूख चुका है। आंकड़ों पर नजर डालें तो मालदीव के पास अब विदेशी मुद्रा का इतना ही भंडार बचा है जिससे बमुश्किल डेढ़ महीने का आयात किया जा सके। International Monetary Fund यानी IMF के कड़े दिशा-निर्देश कहते हैं कि किसी भी देश के पास कम से कम 3 महीने का सुरक्षित बफर भंडार होना ही चाहिए। लेकिन मालदीव इस खतरे के निशान को बहुत पहले पार कर चुका है। आज मालदीव की स्थिति ऐसी हो चुकी है कि वह दुनिया के सामने कटोरा लेकर खड़ा है, लेकिन उसे कोई ठोस मदद नहीं मिल रही है।
Financial cycle 2024-2025 में मोहम्मद मुइज्जू की सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती 1.7 billion USD के विदेशी कर्ज को चुकाने की है। यह कोई रातों-रात पैदा हुआ संकट नहीं है। यह पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के कार्यकाल में बने Sinamale Bridge, इब्राहिम मोहम्मद सोलिह के दौर के Greater Male Connectivity Project और Covid-19 के दौरान ली गई आर्थिक सहायता का मिला-जुला नतीजा है। आग में घी डालने का काम खुद मुइज्जू सरकार ने किया है। सत्ता में आते ही उन्होंने Ras Male Reclamation Scheme जैसे अति-महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट शुरू कर दिए। इन बिना सिर-पैर के प्रोजेक्ट्स ने कर्ज के बोझ को इतना भारी कर दिया है कि अब मालदीव की अर्थव्यवस्था की कमर टूट चुकी है। देश की कुल जीडीपी का एक बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ विदेशी कर्ज का ब्याज चुकाने में जा रहा है, जिससे आम जनता के लिए बुनियादी सुविधाएं जुटाना भी सरकार के लिए नामुमकिन होता जा रहा है।
साल 2024 में अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी Fitch ने मालदीव की रेटिंग को घटाकर CC कर दिया था। यह किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए एक सीधा रेड अलर्ट होता है। इसका मतलब है कि देश अपना विदेशी कर्ज चुकाने में डिफॉल्ट कर सकता है, यानी पूरी तरह दिवालिया घोषित हो सकता है। हालांकि जून 2024 में 500 million USD के Islamic Bond या कहें Sukuk Bond की किस्त चुकाने के बाद इसे मामूली सुधार के साथ CCC कर दिया गया। लेकिन इस एक भुगतान ने मालदीव के खजाने को पूरी तरह खाली कर दिया। अप्रैल में भारत के साथ हुए 400 million USD के Currency Swap ने मालदीव को फौरी राहत जरूर दी, लेकिन वह सिर्फ एक पेनकिलर साबित हुई, कोई पक्का इलाज नहीं। आज जमीनी हकीकत यह है कि मालदीव में एक पैरेलल मार्केट यानी डॉलर की कालाबाजारी का जन्म हो चुका है। आधिकारिक तौर पर 1 USD की कीमत 15.42 MVR तय है, लेकिन काले बाजार में यह 23 MVR के खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है। यह 50 प्रतिशत से ज्यादा का उछाल है। विदेशी सप्लायर्स को पेमेंट करने के लिए मालदीव के कारोबारियों को तीन-तीन हफ्तों तक का इंतजार करना पड़ रहा है। सप्लाई चेन पूरी तरह ध्वस्त होने की कगार पर है। ईरान और मध्य-पूर्व के भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। मालदीव की कमाई का मुख्य जरिया पर्यटन है, लेकिन मार्च-अप्रैल के महीनों में वहां आने वाले पर्यटकों की संख्या में 20 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई। डॉलर आ नहीं रहा है और कर्ज चुकाने के लिए डॉलर पानी की तरह बह रहा है।
चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स और Feydhoofinolhu का सौदा
मालदीव की यह बर्बादी सिर्फ एक आर्थिक कुप्रबंधन का नतीजा नहीं है। यह चीन की एक सोची-समझी String of Pearls और Belt and Road Initiative यानी BRI रणनीति का बहुत ही खौफनाक हिस्सा है। दुनिया जब अपनी आंतरिक राजनीति और अन्य विवादों में उलझी थी, तब चीन खामोशी से भारत से मात्र 684 किलोमीटर दूर एक कृत्रिम द्वीप का निर्माण कर रहा था। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के कार्यकाल में साल 2016 में मालदीव सरकार ने Feydhoofinolhu सहित कुल 16 द्वीपों को चीनी कंपनियों को 50 साल की लीज पर दे दिया था। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि सामरिक रूप से बेहद अहम Feydhoofinolhu द्वीप को मात्र 4 million USD यानी करीब 33 करोड़ रुपये की मामूली रकम में चीन को सौंप दिया गया। जरा सोचिए, आज के समय में भारत के किसी मेट्रो शहर में एक अच्छा प्रीमियम फ्लैट भी 33 करोड़ से ज्यादा का आता है, और मुइज्जू के देश ने एक पूरा का पूरा द्वीप ड्रैगन के हवाले कर दिया। यह कोई मामूली रियल एस्टेट डील नहीं थी, यह मालदीव की संप्रभुता का सौदा था।
Open Source Intelligence यानी OSINT और सैटेलाइट इमेजरी के ताजा खुलासों ने भारत के रक्षा प्रतिष्ठानों में खतरे की घंटी बजा दी है। सैटेलाइट तस्वीरों से साफ पता चलता है कि चीन इस द्वीप पर व्यापक स्तर पर Land Reclamation कर रहा है। यानी भारी मशीनों से समुद्र को पाटकर कृत्रिम जमीन बनाई जा रही है। यह ठीक वही खूंखार रणनीति है जो चीन ने South China Sea के Spratly और Paracel द्वीपों में अपनाई थी। पहले आर्थिक विकास के नाम पर कृत्रिम द्वीप बनाना और फिर रातों-रात वहां सैन्य रनवे, रडार स्टेशन और मिसाइल डिफेंस सिस्टम तैनात कर देना। SIPRI के न्यूक्लियर इंफॉर्मेशन प्रोजेक्ट के निदेशक हेंस क्रिस्टेंसन की रिपोर्ट्स साफ इशारा करती हैं कि चीन का यह कदम शुद्ध रूप से भारत को घेरने की सैन्य रणनीति है। Feydhoofinolhu की भौगोलिक स्थिति इतनी खतरनाक है कि यहां से कोई भी आधुनिक चीनी लड़ाकू विमान जैसे J-20 या J-16 भारतीय तटों, खासकर केरल और लक्षद्वीप तक मात्र 20 से 25 मिनट में पहुंच सकता है। हिंद महासागर से हर साल खरबों डॉलर का समुद्री व्यापार गुजरता है। यहां अपनी सैन्य उपस्थिति दर्ज कराकर चीन भारत की Choke Point रणनीति को बेअसर करना चाहता है। 90 हजार वर्ग किलोमीटर के Exclusive Economic Zone यानी EEZ में फैला मालदीव अब ड्रैगन का सबसे मुफीद रणनीतिक शिकार बन चुका है।
Thilafushi पोर्ट और भारत की पीठ में छुरा
मोहम्मद मुइज्जू भले ही कूटनीतिक दबाव में सार्वजनिक मंचों से भारत के प्रधानमंत्री और भारत सरकार के सहयोग की तारीफ कर रहे हों, लेकिन उनका असली झुकाव और उनकी नीतियां पूरी तरह से चीन के पक्ष में हैं। मालदीव में एक ही रणनीतिक इलाके में भारत और चीन की महा-परियोजनाओं का सीधा आमना-सामना चल रहा है, जो आज कूटनीति का सबसे बड़ा अखाड़ा बन चुका है। फरवरी 2026 में Maldives Ports Limited यानी MPL ने एक बेहद अहम घोषणा की, जिसने नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में हलचल मचा दी। Thilafushi Port Development Project का पहले चरण का ठेका China Harbour Engineering Company यानी CHEC को दे दिया गया। Thilafushi कोई आम द्वीप नहीं है। 1991 में इसे केवल माले शहर का कचरा डंप करने के लिए एक लैंडफिल के रूप में बनाया गया था, लेकिन अब यह एक विशाल कमर्शियल हब में तब्दील हो रहा है। इसके 5 हेक्टेयर आकार को बढ़ाकर 20 हेक्टेयर किया जा रहा है। 650 मीटर लंबी क्वे वॉल, 125 मीटर का रोडसाइड जेट्टी, आधुनिक बॉन्डेड वेयरहाउस और हाई-टेक एक्स-रे सुविधाएं स्थापित की जा रही हैं। मालदीव का लक्ष्य है कि इन ऑटोमेटेड सुविधाओं के जरिए कार्गो क्लियरेंस का समय 5 दिन से घटाकर 48 घंटे कर दिया जाए। राष्ट्रपति मुइज्जू ने खुले तौर पर ऐलान किया है कि मुख्य व्यापारिक पोर्ट को नवंबर 2027 तक माले के माफान्नु इलाके से हटाकर Thilafushi में शिफ्ट कर दिया जाएगा।
कूटनीतिक पेंच यहीं पर आकर सबसे बुरी तरह फंसता है। Thilafushi कोई अलग-थलग पड़ा हुआ द्वीप नहीं है। यह भारत द्वारा बनाए जा रहे Greater Male Connectivity Project यानी GMCP का अंतिम छोर है। भारत ने 400 million USD की Line of Credit और 100 million USD के सीधे अनुदान के जरिए 6.7 किलोमीटर लंबे समुद्री पुल का निर्माण शुरू किया था। यह काम भारत की जानी-मानी कंपनी Afcons Infrastructure कर रही है। यह विशाल पुल माले को Villingili, Gulhifalhu और Thilafushi से जोड़ता है। इसका सीधा और खौफनाक अर्थ यह है कि जिस द्वीप तक पहुंचने के लिए भारत करोड़ों डॉलर खर्च करके बुनियादी ढांचा और पुल बना रहा है, उसी द्वीप के रणनीतिक पोर्ट का नियंत्रण मुइज्जू सरकार ने एक चीनी सरकारी कंपनी CHEC के हाथों में सौंप दिया है। यह भारत की पीठ में अब तक का सबसे बड़ा छुरा घोंपने जैसा कदम है। मुइज्जू सरकार की यह दोहरी रणनीति अब साफ हो चुकी है कि बुनियादी ढांचे के लिए भारत का पैसा और संसाधन इस्तेमाल करो, लेकिन रणनीतिक संपत्तियों पर ड्रैगन को काबिज होने दो। यह भारत के रणनीतिक हितों पर एक सीधा प्रहार है।
भारत का मास्टरस्ट्रोक और लक्षद्वीप में रणनीतिक घेराबंदी
लेकिन India Out के नारों के साथ सत्ता के नशे में चूर होकर आए मोहम्मद मुइज्जू को अब समझ आ गया है कि चुनावी रैलियों में भारत विरोधी नारे लगाना और एक दिवालिया हो रहे देश की सरकार चलाना, दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। देश के खजाने में जब डॉलर खत्म होने लगे, तो मुइज्जू को मजबूरन उसी भारत की शरण में आना पड़ा, जिसे उन्होंने मालदीव की संप्रभुता के लिए खतरा बताया था। भारत ने बड़े भाई की भूमिका निभाते हुए Treasury Bill Rollover और 400 million USD के Currency Swap जैसी सुविधाओं से मालदीव को राहत दी। लेकिन इस बार भारत की नीति में एक सख्त Hard Realism नजर आ रहा है। मोदी सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह मदद करेगा, लेकिन ब्लैकमेल बिल्कुल नहीं होगा। कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक मालदीव सरकार ने State Bank of India यानी SBI द्वारा दी गई 150 million USD की विशेष बजट सहायता सुविधा की अवधि को आगे बढ़ाने या रोलओवर करने का अनुरोध किया था। लेकिन नई दिल्ली ने इस बार नरमी दिखाने से साफ इनकार कर दिया। 17 सितंबर को भारत ने मालदीव के इस अनुरोध को ठुकरा दिया। इसका कड़ा नतीजा यह हुआ कि मालदीव को अपने सूखते खजाने से 50 million USD की अंतिम किस्त भारत को चुकानी पड़ी। यह 150 million USD का कर्ज 50-50 million USD की तीन किस्तों में चुकाया गया है। इस आखिरी 50 million USD के निकास ने मालदीव के विदेशी मुद्रा भंडार की कमर पूरी तरह से तोड़ कर रख दी।
अब दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत मालदीव को पूरी तरह डूबने देगा? या भारत ने चीन के खिलाफ कोई गुप्त बिसात बिछा रखी है? रक्षा और रणनीतिक मामलों के विश्लेषकों की मानें तो भारत की रणनीति अब मालदीव को मनाने की नहीं, बल्कि मालदीव को विकल्पहीन बनाकर उसकी हदें याद दिलाने की है। भारत बहुत अच्छी तरह जानता है कि अगर मालदीव पूरी तरह तबाह होता है, तो चीन वहां राहत के नाम पर अपनी People’s Liberation Army यानी PLA के नौसैनिक बेस स्थापित कर लेगा। 830 million USD की लागत से माले में बनाया गया नया एयरपोर्ट और अन्य चीनी प्रोजेक्ट असल में Dual Use वाले बुनियादी ढांचे हैं, जिन्हें जरूरत पड़ने पर मिलिट्री बेस में आसानी से बदला जा सकता है। इसलिए भारत एक Circle of Denial रणनीति पर बहुत ही आक्रामक तरीके से काम कर रहा है। मालदीव की ब्लैकमेलिंग से निपटने के लिए भारत ने लक्षद्वीप के Minicoy द्वीप पर एक नया नेवल बेस INS Jatayu स्थापित कर दिया है। इसके अलावा Agatti और Minicoy में एयरस्ट्रिप का तेजी से विस्तार किया जा रहा है। यह नेवल बेस मालदीव से मात्र 130 किलोमीटर दूर है। अगर चीन मालदीव के Feydhoofinolhu से कोई भी सैन्य हरकत करता है, तो भारतीय नौसेना उसे Minicoy से चंद मिनटों में काउंटर कर सकती है। यह भारत की वह अचूक घेराबंदी है जिसे तोड़ पाना चीन के लिए नामुमकिन है।
भारत मालदीव को बुनियादी मदद देकर उसे दिवालिया होने से बचा रहा है ताकि वहां श्रीलंकाई शैली का हिंसक गृहयुद्ध न भड़के, लेकिन साथ ही भारत उसे इतनी अतिरिक्त छूट भी नहीं दे रहा कि वह चीन के साथ मिलकर नई चालें चल सके। SBI के रोलओवर से इनकार करना इसी कठोर रणनीति का हिस्सा था। मालदीव को यह स्पष्ट अहसास दिलाना जरूरी था कि भारत की अनदेखी करने का आर्थिक परिणाम क्या होता है। यह एक कूटनीतिक सर्जिकल स्ट्राइक थी जिसने मुइज्जू सरकार के होश उड़ा दिए। भारत ने दिखा दिया है कि हिंद महासागर में बॉस कौन है और अगर भारत अपनी पर आ जाए तो किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को घुटनों पर ला सकता है।





