तीस्ता नदी पर बांग्लादेश और चीन की नई जुगलबंदी: क्या भारत के लिए पैदा होगा सुरक्षा का संकट?

दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में इस वक्त दिल्ली, ढाका, कोलकाता और बीजिंग के बीच एक बड़ी हलचल महसूस की जा रही है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए बदलावों के बाद पड़ोसी देश बांग्लादेश में एक अलग तरह की सरगर्मी देखने को मिल रही है। हालांकि, यह मामला सिर्फ पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा गेमप्लान छिपा है, जिसके तार सीधे तौर पर चीन से जुड़ रहे हैं। आज हम उस रणनीति का विश्लेषण करेंगे जो तीस्ता नदी के बहाने भारत के सबसे संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र में रची जा रही है। सालों से लंबित पड़ा यह मुद्दा अब एक नए मोड़ पर आ गया है, जहाँ बांग्लादेश की नई लीडरशिप और चीन की सक्रियता ने भारत की चिंताएं बढ़ा दी हैं।

बंगाल के नए राजनीतिक परिदृश्य का अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसे समझना अनिवार्य है। ढाका में प्रधानमंत्री तारिक रहमान के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर ने एक ऐसा बयान दिया है जिसने भारतीय विदेश मंत्रालय को सतर्क कर दिया है। कबीर ने स्पष्ट किया है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सत्ता से विदाई तीस्ता विवाद सुलझाने के लिए एक सकारात्मक संकेत है। अब प्रश्न यह है कि ढाका की दिलचस्पी बंगाल की घरेलू राजनीति में इतनी क्यों बढ़ गई है?

इसकी पृष्ठभूमि समझना आवश्यक है। भारत सरकार पहले यह तर्क देती रही है कि राज्य सरकार की असहमति के कारण तीस्ता समझौते पर मुहर नहीं लग पा रही है। चूंकि भारत के संघीय ढांचे में पानी राज्य का विषय है, इसलिए राज्य की रजामंदी के बिना अंतरराष्ट्रीय संधि संभव नहीं थी। हुमायूं कबीर का मानना है कि अब बंगाल और केंद्र दोनों जगह बीजेपी की सरकार होने से राजनीतिक बाधाएं समाप्त हो गई हैं। ढाका को उम्मीद है कि अब बातचीत के माध्यम से दशकों पुराना यह विवाद हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।

मगर यह तस्वीर उतनी सरल नहीं है जितनी दिखाई दे रही है। असली पेंच तो अब शुरू होता है। यदि यह केवल भारत और बांग्लादेश के बीच का द्विपक्षीय मसला होता, तो इसे कूटनीति से सुलझाया जा सकता था। लेकिन इस प्रकरण में चीन की एंट्री ने भारत के लिए ‘रेड अलर्ट’ जारी कर दिया है।

चीन लंबे समय से तीस्ता नदी परियोजना पर अपनी नजरें टिकाए हुए है। हुमायूं कबीर ने पुष्टि की है कि तीस्ता प्रोजेक्ट को लेकर चीन के साथ उनकी बेहद सकारात्मक चर्चा हुई है और चीन का एग्जिम बैंक इस मेगा प्रोजेक्ट को फाइनेंस करने के लिए तैयार है। वर्तमान में परियोजना की सर्वे रिपोर्ट का अध्ययन किया जा रहा है। कयास लगाए जा रहे हैं कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान की आगामी चीन यात्रा के दौरान इस समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। कबीर ने चीन को बांग्लादेश का एक अत्यंत महत्वपूर्ण साझेदार बताया है।

भारत के नजरिए से देखें तो चीन की कोई भी मदद बिना किसी स्वार्थ के नहीं होती। श्रीलंका, पाकिस्तान और मालदीव को अपने ‘डेब्ट ट्रैप’ (कर्ज के जाल) में फंसाने की चीन की नीति जगजाहिर है। बांग्लादेश के मामले में चीन का लक्ष्य केवल निवेश नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती देना है।

तीस्ता नदी सिक्किम के पहाड़ों से निकलकर पश्चिम बंगाल के रास्ते बांग्लादेश में प्रवेश करती है और लाखों किसानों की जीवनरेखा है। बांग्लादेश का मास्टरप्लान मानसून के अतिरिक्त पानी को जमा करने के लिए बड़े जलाशय और बांध बनाना है। इसी बुनियादी ढांचे और तकनीक के लिए चीन ने भारी भरकम निवेश का प्रस्ताव दिया है।

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय ‘चिकन नेक’ यानी सिलीगुड़ी कॉरिडोर है। यह संकरा गलियारा पूर्वोत्तर भारत को शेष देश से जोड़ता है और इसकी चौड़ाई मात्र 20-22 किलोमीटर है। जिस स्थान पर बांग्लादेश चीन की मदद से यह प्रोजेक्ट बनाना चाहता है, वह इसी संवेदनशील गलियारे के अत्यंत निकट है।

यदि चीन इस प्रोजेक्ट के बहाने अपने इंजीनियरों और निगरानी तंत्र को यहाँ स्थापित कर लेता है, तो यह भारत की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा होगा। भारत अपने इतने महत्वपूर्ण बॉर्डर के पास चीनी मौजूदगी को कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता। चीन ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नीति के तहत भारत के पड़ोसियों को लालच देकर भारत की घेराबंदी करने की फिराक में है।

हालांकि, भारत का नेतृत्व भी इस स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए है। अब दिल्ली की विदेश नीति रक्षात्मक नहीं रही। भारत ने हमेशा एक अच्छे पड़ोसी की भूमिका निभाई है, लेकिन जब बात राष्ट्रीय सुरक्षा और सिलीगुड़ी कॉरिडोर की आती है, तो भारत का रुख ‘जीरो टॉलरेंस’ का है।

बंगाल में बदली राजनीतिक परिस्थितियों के बीच केंद्र सरकार के पास इस मुद्दे को अपने पक्ष में हल करने का सुनहरा अवसर है। अब राज्य सरकार की ओर से किसी विरोध की संभावना नहीं है। भारत को जल्द ही ऐसा कूटनीतिक कदम उठाना होगा जिससे बांग्लादेश की जरूरतें भी पूरी हों और चीन को इस क्षेत्र से बाहर रखा जा सके। भारत स्वयं इस प्रोजेक्ट के लिए एक बेहतर विकल्प पेश कर सकता है।

आगामी कुछ महीने दक्षिण एशिया की राजनीति के लिए निर्णायक होंगे। तारिक रहमान की चीन यात्रा से पहले भारत को अपने कूटनीतिक चैनलों को सक्रिय करना होगा। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि तीस्ता के पानी पर हक भले ही दोनों का हो, लेकिन सुरक्षा पर किसी तीसरे देश की छाया न पड़े। नए भारत की प्राथमिकता अपनी सीमाओं की सुरक्षा और विदेशी साजिशों को नाकाम करना है। अब चीन को उसी की भाषा में जवाब देने की जरूरत है।

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