ट्रेन में खाना होगा महंगा? पेट्रोल-डीजल के बहाने रेल यात्रियों की जेब ढीली करने का ‘प्लान’ तैयार

रेल यात्रियों के लिए बड़ी चेतावनी

एक ओर जहां वंदे भारत और शताब्दी जैसी आधुनिक ट्रेनों में वर्ल्ड क्लास सुविधाओं का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इन ट्रेनों में सफर करने वाले यात्रियों की जेब पर भारी बोझ डालने की तैयारी चल रही है। क्या आपको पता है कि रेलवे के भीतर ऐसी योजनाएं बन रही हैं जो सीधे आपकी थाली की कीमत बढ़ा देंगी? जी हां, ईरान और इजरायल के बीच छिड़े युद्ध और बढ़ती महंगाई का बहाना बनाकर भारतीय ट्रेनों में मिलने वाला खाना अब काफी महंगा हो सकता है।

यह मामला बेहद गंभीर है और सीधे तौर पर आम आदमी से जुड़ा है। रेलवे बोर्ड में आजकल ‘अवसर का लाभ उठाने’ की होड़ मची है। जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ीं, रेलवे के वेंडर्स ने इसे अपनी मांगें मनवाने का हथियार बना लिया। बाजार में तो महंगाई बढ़ी ही है, लेकिन अब रेलवे के खानपान ठेकेदारों ने भी अपनी मांगों का पुलिंदा रेलवे के सामने रख दिया है।

कैटरर्स की भारी भरकम मांग: 250% वृद्धि का दावा

ट्रेनों में कैटरिंग सर्विस देने वाले ठेकेदारों के संगठन इंडियन रेलवे मोबाइल कैटरर्स एसोसिएशन (IRMCA) ने मोर्चा खोल दिया है। इस संगठन के अध्यक्ष शरण बिहारी अग्रवाल हैं, जिनका RK Business Group राजधानी, शताब्दी और वंदे भारत जैसी प्रीमियम ट्रेनों के खानपान का करीब 70 प्रतिशत काम संभालता है।

इस एसोसिएशन ने आईआरसीटीसी (IRCTC) को एक पत्र भेजकर सबको चौंका दिया है। पत्र में दावा किया गया है कि खाने-पीने की चीजों के दाम 2019 में तय हुए थे, जबकि अब लागत 250 फीसदी तक बढ़ चुकी है। साथ ही कर्मचारियों के वेतन में भी इजाफा हुआ है। कैटरर्स का कहना है कि अगर भोजन की गुणवत्ता बनाए रखनी है, तो कीमतों में संशोधन अनिवार्य है।

आम यात्रियों पर क्या होगा असर?

रेलवे में दो तरह की कैटरिंग सेवा होती है: प्री-पेड और पोस्ट-पेड। प्री-पेड सेवा वंदे भारत और राजधानी जैसी ट्रेनों में होती है जहां खाना टिकट का हिस्सा होता है, जबकि अन्य ट्रेनों में यात्री अपनी पसंद से खाना खरीदते हैं।

एसोसिएशन चाहता है कि दोनों ही सेवाओं में कीमतें तुरंत बढ़ाई जाएं। सोचिए, अगर 250 फीसदी बढ़ोतरी का यह तर्क मान लिया गया, तो मध्यम वर्ग के यात्री के लिए ट्रेन में भोजन करना कितना दूभर हो जाएगा। यह सिर्फ भोजन की नहीं, बल्कि आम आदमी के हक की लड़ाई है। क्या हर वैश्विक समस्या का बोझ भारतीय रेल यात्री ही उठाएगा? रेलवे प्रशासन को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

रेलवे के नियम और टेंडर का कानूनी पेंच

हालांकि, कैटरर्स के लिए यह राह इतनी आसान नहीं है। रेलवे के विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रेनों के पेंट्री कार टेंडर ‘फिक्स रेट सप्लाई’ पर आधारित होते हैं। टेंडर की अवधि के दौरान बीच में कीमतें बढ़ाने का कोई प्रावधान नियमों में नहीं है।

इसका सीधा मतलब है कि जिस ठेकेदार ने जिस दर पर टेंडर लिया है, उसे उसी पर काम करना होगा। कोई भी कंपनी बीच में दबाव डालकर रेट रिवाइज नहीं करवा सकती। अगर दरों में संशोधन होता भी है, तो वह केवल भविष्य के नए टेंडर्स पर ही लागू होगा, पुराने टेंडर्स पर नहीं।

नुकसान का दावा या केवल बहाना?

अगर बाजार की महंगाई के कारण काम करना मुश्किल है, तो क्या ठेकेदार घाटा सहेंगे? रेलवे अधिकारियों का इस पर बड़ा ही स्पष्ट नजरिया है। वे बताते हैं कि हर अनुबंध में ‘एक्जिट क्लॉज’ (निकास विकल्प) होता है।

यदि किसी ठेकेदार को लगता है कि उसे नुकसान हो रहा है, तो वह अनुबंध खत्म करके बाहर निकल सकता है। रेलवे किसी पर जबरदस्ती दबाव नहीं डालता। लेकिन बीच रास्ते में यात्रियों की जेब पर डाका डालने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अगर मुनाफा नहीं है, तो वे नए सिरे से टेंडर भरें, न कि पुरानी शर्तों को तोड़ें।

निष्कर्ष: यात्रियों की सेवा या व्यापार?

ईंधन की बढ़ती कीमतों का हवाला देकर यात्रियों को लूटने की अनुमति किसी को नहीं दी जानी चाहिए। भारतीय रेल एक सेवा माध्यम है, मुनाफाखोरी का अड्डा नहीं। हम उम्मीद करते हैं कि आईआरसीटीसी और रेलवे बोर्ड यात्रियों के हितों की रक्षा करेंगे और कैटरर्स की इन अनुचित मांगों को खारिज करेंगे। यात्रा सुलभ होनी चाहिए, न कि आर्थिक बोझ।

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