हिंद महासागर के रणनीतिक जलक्षेत्र में नई दिल्ली और बीजिंग के बीच कूटनीतिक शतरंज का एक ऐसा खेल शुरू हो गया है, जिसने वैश्विक सैन्य विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। श्रीलंका के दक्षिणी छोर पर स्थित एक शांत हवाई पट्टी अब एशिया की सबसे बड़ी जियो-पॉलिटिकल जंग का केंद्र बन गई है। भारत यहाँ अपना मज़बूत आधार तैयार करने की योजना बना रहा है, जिससे बीजिंग में बैठे रणनीतिकारों की चिंता बढ़ गई है। श्रीलंका का मत्ताला राजपक्षे इंटरनेशनल एयरपोर्ट, जिसे कभी ‘दुनिया का सबसे खाली एयरपोर्ट’ कहा जाता था, अब भारत की समुद्री सुरक्षा रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनने जा रहा है। सवाल यह है कि आखिर इस वीरान एयरपोर्ट में भारत को ऐसा क्या दिख रहा है? क्या हिंद महासागर में चीन के प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए भारत ने ठोस योजना बना ली है? क्या भारत ड्रैगन को उसी के कर्ज के जाल में उलझाने के लिए तैयार है? इन सवालों के जवाब भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव की गवाही देते हैं।
हंबनटोटा में चीन के प्रभाव को कम करने की रणनीति
इस पूरे रणनीतिक घटनाक्रम को समझने के लिए हमें श्रीलंका के मानचित्र और वहां चीन की बढ़ती दखलअंदाजी को देखना होगा। श्रीलंका के दक्षिण में स्थित हंबनटोटा पोर्ट को चीन ने 2017 में 99 साल की लीज पर लिया था, जो भारत की सुरक्षा के लिए हमेशा से चिंता का विषय रहा है। यहाँ से भारत के दक्षिणी नौसैनिक कमांड की दूरी काफी कम है, और चीन अक्सर यहाँ अपने जासूसी जहाज भेजकर भारत की निगरानी करने की कोशिश करता है। लेकिन अब समय बदल रहा है। भारत ने हंबनटोटा पोर्ट के बेहद करीब स्थित मत्ताला राजपक्षे इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर अपना नियंत्रण स्थापित करने का एक व्यापक मास्टर प्लान तैयार किया है। श्रीलंका सरकार ने आधिकारिक तौर पर इस हवाई अड्डे को 30 साल की लीज पर देने के लिए वैश्विक निविदाएं (Tenders) जारी की हैं, और भारत इस रणनीतिक अवसर को हासिल करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
चीनी कर्ज का ‘सफेद हाथी’ बना भारत का अवसर
मत्ताला एयरपोर्ट की कहानी किसी सबक से कम नहीं है। 2013 में श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने अपने गृहनगर में इस भव्य अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का निर्माण कराया था। लगभग 20.9 करोड़ डॉलर की लागत से बने इस प्रोजेक्ट के लिए चीन के एक्सिम बैंक ने भारी कर्ज दिया था। चीन की मंशा श्रीलंका को कर्ज के जाल (Debt Trap Diplomacy) में फंसाकर उसकी रणनीतिक संपत्तियों पर कब्जा करने की थी।
एयरपोर्ट तो बन गया, जिसमें 3500 मीटर का रनवे और आधुनिक टर्मिनल था, लेकिन यहाँ यात्रियों का आना शुरू नहीं हुआ। धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस ने यहाँ से अपनी उड़ानें बंद कर दीं और यह ‘दुनिया का सबसे खाली एयरपोर्ट’ बन गया। श्रीलंका के लिए इसका रखरखाव करना एक बड़ा आर्थिक बोझ बन गया। जहाँ चीन ने इसे केवल अपनी सैन्य उपस्थिति के लिए एक मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया था, वहीं भारत अब इसे एक सक्रिय और लाभकारी केंद्र में बदलने की सोच रहा है।
भारत का प्रवेश और लीज का नया मॉडल
भारत की सुरक्षा एजेंसियां जानती थीं कि यदि मत्ताला एयरपोर्ट भी चीन के हाथों में चला गया, तो वह और हंबनटोटा मिलकर भारत के खिलाफ एक संयुक्त सैन्य अड्डा बन सकते हैं। यह भारत के अंतरिक्ष और परमाणु केंद्रों के लिए एक सीधा खतरा होता। इसी खतरे को देखते हुए भारत ने श्रीलंका के सामने एक ऐसा प्रस्ताव रखा जिसे नकारा नहीं जा सका। श्रीलंका भी अब समझ चुका है कि चीन की तुलना में भारत एक अधिक विश्वसनीय और संतुलित साझेदार है।
इस बार श्रीलंका ने लीज के लिए एक विशेष मॉडल पेश किया है, जिसमें हवाई अड्डे के संचालन को ‘एयरसाइड’ और ‘लैंडसाइड’ दो भागों में बांटा गया है। एयरसाइड ऑपरेशन्स के तहत रनवे और एयर ट्रैफिक कंट्रोल का जिम्मा होगा, जबकि लैंडसाइड ऑपरेशन्स के तहत 238 हेक्टेयर जमीन को 30 साल के लिए ‘बिल्ड-ऑपरेट-एंड-ट्रांसफर’ (BOT) मॉडल पर दिया जा रहा है। यह भारत के लिए वहां बुनियादी ढांचा विकसित करने और लंबे समय तक अपनी उपस्थिति बनाए रखने का बेहतरीन मौका है।
238 हेक्टेयर जमीन पर भारत का गेम प्लान
मत्ताला एयरपोर्ट की 238 हेक्टेयर जमीन पर भारत एक विशाल ‘एमआरओ’ (MRO – Maintenance, Repair and Overhaul) हब बनाने की योजना बना रहा है। एमआरओ हब विमानों की मरम्मत और तकनीकी जांच का एक उच्च-स्तरीय केंद्र होता है। वर्तमान में, भारतीय एयरलाइंस (जैसे इंडिगो और एयर इंडिया) को अपने विमानों की मरम्मत के लिए सिंगापुर या यूरोपीय देशों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे काफी विदेशी मुद्रा देश से बाहर जाती है।
अगर भारत मत्ताला में एक विश्वस्तरीय एमआरओ हब स्थापित करता है, तो न केवल भारतीय एयरलाइंस को फायदा होगा, बल्कि यह क्षेत्र का एक प्रमुख एविएशन हब बन जाएगा। यहाँ प्रचुर मात्रा में जमीन, लंबा रनवे और समुद्री व्यापार मार्गों की निकटता इसे निवेश के लिए आदर्श बनाती है। यह कदम पूरे दक्षिण एशिया के विमानन क्षेत्र की दिशा बदल सकता है।
‘नेबरहुड फर्स्ट’ और स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स का अंत
भारत का यह कदम प्रधानमंत्री मोदी की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ और ‘सागर’ (SAGAR – Security and Growth for All in the Region) नीति का हिस्सा है। भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ सुरक्षा और आर्थिक संबंधों को मजबूत कर रहा है ताकि बाहरी शक्तियों का प्रभाव क्षेत्र में कम किया जा सके।
मत्ताला एयरपोर्ट पर भारत की मौजूदगी चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति को बड़ा झटका देगी। हंबनटोटा के ठीक बगल में होने के कारण, भारत चीन की हर गतिविधि पर करीब से नजर रख सकेगा। यह चीन के प्रभाव को बेअसर करने का सबसे प्रभावी तरीका है। अब चीन यहाँ अपनी नौसेना के गुप्त अभियान नहीं चला पाएगा, क्योंकि भारत की वहां चौबीसों घंटे निगरानी रहेगी।
2026 की नई शुरुआत और चीनी प्रभाव की विदाई
भारत लंबे समय से इस एयरपोर्ट के लिए प्रयास कर रहा है। इससे पहले एक भारतीय-रूसी संयुक्त उद्यम ने भी इसमें रुचि दिखाई थी, लेकिन श्रीलंका में राजनीतिक अस्थिरता के कारण मामला टल गया था। चीन ने उस समय इस डील को रोकने की पूरी कोशिश की थी।
लेकिन 2026 की शुरुआत के साथ, श्रीलंका की सरकार को आर्थिक संकट से उबरने के लिए ठोस निवेश की आवश्यकता है। श्रीलंका अब भारत और चीन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन संकट के समय भारत द्वारा दी गई मदद ने उसे भारत का एक मज़बूत सहयोगी बना दिया है। फ्रेश टेंडर जारी होने के बाद, भारत के लिए फिर से द्वार खुल गए हैं।
भारत की आक्रामक और दूरदर्शी कूटनीति
यह समय भारत के लिए अपनी शक्ति प्रदर्शन का है। भारतीय कॉर्पोरेट और सरकार इस टेंडर को जीतने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। यदि भारत सफल होता है, तो यह हिंद महासागर के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ होगा। भारत अब रक्षात्मक रुख छोड़कर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थानों पर अपनी सक्रियता बढ़ा रहा है।
इस प्रोजेक्ट से न केवल भारत की सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी। जहाँ चीन ने केवल शोषण किया, वहीं भारत एक ऐसा मॉडल पेश कर रहा है जो दोनों देशों के विकास के लिए लाभदायक हो। यह ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना का प्रमाण है।
हिंद महासागर आने वाले समय में वैश्विक व्यापार का मुख्य केंद्र बना रहेगा। भारत का मत्ताला एयरपोर्ट को नियंत्रित करना उसकी दूरदर्शिता और संप्रभुता की रक्षा के लिए आवश्यक है। इस महत्वपूर्ण कूटनीतिक विकास पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि भारत इसके जरिए चीन को मात देने में सफल होगा? कमेंट में अपनी राय साझा करें और इस जानकारी को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएं।

