पहाड़ों को चीरकर निकलेगी नई जलधारा
पाकिस्तान अब सावधान हो जाए! वह समय अब बीत चुका है जब भारत उसकी नापाक हरकतों को खामोशी से सहता था। वह दौर भी खत्म हुआ जब हमारी नदियों का पानी सीमा पार प्यास बुझाता था और बदले में हमें केवल आतंकवाद मिलता था। यह ‘नया भारत’ है, जो अब ईंट का जवाब पत्थर से देना जानता है और इस बार प्रहार सीधा तुम्हारी दुखती रग पर हुआ है। सिंधु जल संधि की आड़ में अब तक जो मनमानी चल रही थी, उस पर लगाम लगाने का वक्त आ गया है। भारत ने अब अपनी एक-एक बूंद पानी का हिसाब लेने का संकल्प कर लिया है। इसकी शुरुआत चिनाब नदी से हो चुकी है, जहां पानी का रुख मोड़ने के लिए हिमालय के सीने को चीरकर एक विशाल सुरंग बनाने का काम युद्ध स्तर पर जारी है। यह केवल एक इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि पाकिस्तान के गुरूर को तोड़ने वाला एक बड़ा ‘स्ट्रैटेजिक’ और ‘पॉलिटिकल’ कदम है। जब पड़ोसी मुल्क में साजिशें रची जा रही थीं, तब दिल्ली में इस ‘मास्टरप्लान’ पर अंतिम मुहर लग रही थी।
पाकिस्तान की दुखती रग पर कड़ा प्रहार
क्या तुम्हें लगता था कि अंतरराष्ट्रीय संधियों के पीछे छिपकर तुम हमेशा बचते रहोगे? याद रहे, संधियां बराबरी और भरोसे पर टिकी होती हैं, पीठ में छुरा घोंपने वालों के साथ नहीं। 1960 की सिंधु जल संधि ने पाकिस्तान को सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों पर प्राथमिकता तो दी, लेकिन भारत ने कभी भी इन नदियों के पानी के इस्तेमाल का अपना कानूनी अधिकार नहीं छोड़ा। अब तक हमारी उदारता को कमजोरी समझा गया, लेकिन सीमा पार से होने वाले आतंकी हमलों ने भारत के धैर्य का बांध तोड़ दिया है। प्रधानमंत्री मोदी का संदेश स्पष्ट है कि ‘खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते’। अब भारत अपने उसी अधिकार का उपयोग कर रहा है। चिनाब नदी, जो पाकिस्तान की कृषि के लिए रीढ़ की हड्डी है, अब भारत की इस बड़ी योजना का मुख्य केंद्र है।
हिमालय में ‘ब्रह्मास्त्र’ की तैयारी: ₹2600 करोड़ की परियोजना
भारत सरकार ने दो बड़ी परियोजनाओं पर काम की गति तेज कर दी है, जिससे पड़ोसी मुल्क की चिंताएं बढ़ना तय है। नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (NHPC) के इन प्रोजेक्ट्स पर लगभग ₹2,600 करोड़ खर्च किए जा रहे हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण कदम हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति में बन रहा ‘चिनाब-ब्यास लिंक टनल प्रोजेक्ट’ है। यह 8.7 किलोमीटर लंबी (लगभग 9 किमी) एक ऐसी सुरंग है, जो चिनाब की सहायक चंद्रा नदी के अतिरिक्त पानी को ब्यास बेसिन की ओर मोड़ देगी। अब वह पानी पाकिस्तान जाने के बजाय भारत के खेतों को हरा-भरा करेगा और हमारे पावर प्रोजेक्ट्स को ऊर्जा देगा। पहाड़ों के बीच बनाई जा रही यह सुरंग एक रणनीतिक हथियार की तरह है।
दूसरा बड़ा कदम सलाल बांध की जल भंडारण क्षमता को फिर से बहाल करना है। सालों से जमा गाद (Silt) के कारण इस बांध की क्षमता कम हो गई थी। अब भारत ने इसे साफ करने का निर्णय लिया है, जिसका अर्थ है कि हम अब अधिक पानी स्टोर कर पाएंगे और अपनी जरूरत के अनुसार उसे रिलीज करेंगे। पानी के प्रवाह पर नियंत्रण का यह अधिकार सीधा सीमा पार के सिंचाई और बिजली सिस्टम को प्रभावित करने की ताकत रखता है। यह एक ऐसा रणनीतिक हमला है जिसका जवाब पाकिस्तान के पास नहीं है।
रणनीतिक स्थान और इंजीनियरिंग का कमाल
यह टनल प्रोजेक्ट रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण लाहौल-स्पीति के ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में स्थित है। भारत ने हाल के वर्षों में इस इलाके में सड़कों और सुरंगों का जाल बिछाया है। यह टनल कोस्कर गांव के पास और रोहतांग की अटल सुरंग के उत्तरी द्वार के ऊपर की ओर बनाई जा रही है। यह क्षेत्र चीन और पाकिस्तान दोनों के लिहाज से संवेदनशील है, लेकिन अब भारत ने यहां अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। यह प्रोजेक्ट न केवल जलविद्युत के लिए अहम है, बल्कि पश्चिमी नदियों के जल पर भारत के अधिकार को पूरी तरह सुरक्षित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
आतंकवाद का करारा जवाब
यह वही भारत है जिसने दुनिया को मदद का हाथ बढ़ाया, लेकिन जरूरत पड़ने पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ और ‘बालाकोट’ जैसे जवाब भी दिए। अब जल संसाधनों का सही प्रबंधन हमारे दुश्मनों के लिए चेतावनी है। जब आतंकी गतिविधियों के बदले संसाधनों पर नियंत्रण की बात आती है, तो भारत का रुख अब अत्यंत सख्त है। हमारे वीर जवानों के बलिदान का हिसाब अब हर स्तर पर लिया जाएगा। हमारी शालीनता को दुर्बलता मानना बड़ी भूल होगी। अब उन जलधाराओं का सदुपयोग भारत के हित में होगा जिनका लाभ अब तक दुश्मन उठाता रहा है।
सिंधु जल संधि पर भारत का कड़ा रुख
भारत ने यह कदम तब उठाया है जब नई दिल्ली ने सिंधु जल संधि के प्रावधानों के तहत अपने अधिकारों के प्रति रुख बेहद कड़ा कर लिया है। 1960 की संधि के अनुसार भारत को रावी, ब्यास और सतलुज पर पूर्ण अधिकार है, जबकि पश्चिमी नदियों पर पाकिस्तान का प्राथमिक अधिकार है। हालांकि, भारत के पास इन नदियों पर बिजली परियोजनाएं बनाने और गैर-उपभोक्ता कार्यों के लिए पानी इस्तेमाल करने का अधिकार सुरक्षित है। भारत अब कानून के दायरे में रहकर अपने इन अधिकारों का पूरी तरह से इस्तेमाल कर रहा है, जो पड़ोसी देश के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
पाकिस्तान और चीन में हलचल
इस परियोजना की खबर से इस्लामाबाद के गलियारों में हड़कंप है। पाकिस्तान अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गुहार लगाने की कोशिश करेगा, लेकिन आतंकवाद के इतिहास के कारण दुनिया अब उसकी सुनने को तैयार नहीं है। यहां तक कि चीन भी इस मामले में उसे कोई बड़ी राहत नहीं दिला पाएगा। हिमालय के ऊंचे क्षेत्रों में भारत का बढ़ता इन्फ्रास्ट्रक्चर बीजिंग के लिए भी चिंता का विषय है। भारत अब किसी के दबाव में आए बिना अपनी संप्रभुता और जनता के हक के लिए फैसले ले रहा है।
आत्मनिर्भर और निडर ‘नया भारत’
यह ‘नया भारत’ अपनी जल नीति और सुरक्षा नीति को लेकर स्पष्ट है। हमारी नदियों का पानी हमारी संपत्ति है और इसका अधिकतम उपयोग भारत के विकास के लिए किया जाएगा। यदि सीमा पार से अस्थिरता फैलाने की कोशिश होगी, तो भारत अपने संसाधनों का उपयोग एक रणनीतिक हथियार के रूप में करने से पीछे नहीं हटेगा। यह तो बस शुरुआत है; अगर उकसावे की कार्रवाई जारी रही, तो आने वाले समय में स्थिति और भी गंभीर हो सकती है।
अब हर चीज का हिसाब होगा, और इस बार यह हिसाब जलधाराओं के जरिए होगा। भारत की सीमाओं और संसाधनों के साथ खिलवाड़ अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

