भारत-फ्रांस रक्षा डील: DRDO की इस मीटिंग और राफेल के ‘मेक इन इंडिया’ प्लान से दुनिया हैरान!

आज की बदलती वैश्विक राजनीति में एक बहुत बड़ा बदलाव महसूस किया जा रहा है। दिल्ली के सत्ता गलियारों से लेकर पेरिस के एलिसी पैलेस तक केवल एक ही चर्चा है—भारत की सैन्य आत्मनिर्भरता। भारत अब केवल हथियारों का खरीदार नहीं रहा, बल्कि अपनी शर्तों पर रक्षा सौदे करने वाला एक मजबूत राष्ट्र बन गया है। इस नए और आक्रामक भारत की एक झलक 20 मई को नई दिल्ली में देखने को मिली।

फ्रांस की शक्तिशाली रक्षा एजेंसी DGA का एक हाई-प्रोफाइल प्रतिनिधिमंडल, जिसका नेतृत्व आर्मामेंट्स के डेलिगेट जनरल पैट्रिक पैलू कर रहे थे, भारत पहुंचा। यह कोई सामान्य दौरा नहीं था। यह डेलिगेशन सीधे DRDO मुख्यालय पहुंचा और वहां DRDO के अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत के साथ गहन चर्चा की। इस बैठक का एकमात्र बड़ा एजेंडा था—’एडवांस डिफेंस टेक्नोलॉजी’ में सहयोग।

आज के युग में युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं, बल्कि एआई (AI), साइबर सुरक्षा, स्पेस डिफेंस और नेक्स्ट-जेनरेशन वेपन सिस्टम्स से लड़े जाते हैं। फ्रांस अच्छी तरह जानता है कि एशिया में उसके लिए भारत से बेहतर कोई साझेदार नहीं है। वहीं, भारत अपनी सेना को 21वीं सदी की चुनौतियों के लिए तैयार करने हेतु फ्रांस की विश्वस्तरीय तकनीक का लाभ उठाना चाहता है। इस बैठक में केवल खरीद-फरोख्त नहीं, बल्कि को-डेवलपमेंट (सह-विकास) और को-प्रोडक्शन पर ध्यान दिया गया।

इस रणनीतिक विकास को समझने के लिए हमें इसी साल 17 फरवरी को बेंगलुरु में हुई 6वीं भारत-फ्रांस वार्षिक रक्षा वार्ता को देखना होगा। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और फ्रांस की मंत्री कैथरीन वॉट्रिन के बीच हुई इस बैठक में सबसे बड़ा फैसला दोनों देशों के रक्षा समझौते को अगले 10 वर्षों के लिए रिन्यू करना था। यह फैसला भविष्य के रक्षा संबंधों की नींव है।

यह 10 साल का एग्रीमेंट महज एक दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत को ‘ग्लोबल डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग हब’ बनाने का रोडमैप है। इसी समझौते के तहत वह गेमचेंजर छिपा है जिसने दुनिया का ध्यान खींचा—राफेल विमानों का ‘मेक इन इंडिया’ अवतार।

भारत ने फ्रांस के सामने स्पष्ट मांग रखी है कि राफेल विमानों में स्वदेशी सामग्री की हिस्सेदारी को बढ़ाकर 50 प्रतिशत किया जाए। कल्पना कीजिए, दुनिया के सबसे घातक विमानों में से एक राफेल का आधा हिस्सा, उसका सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर भारत में तैयार होगा। यह ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान की एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी।

इसके अलावा, भारत ने देश के भीतर ही MRO (मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल) सुविधाएं स्थापित करने पर जोर दिया है। अब तक उन्नत जेट्स की मरम्मत के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन अब राफेल का रख-रखाव भारत में ही होगा। इससे न केवल विदेशी मुद्रा बचेगी, बल्कि भारत इस क्षेत्र में फ्रांसीसी फाइटर जेट्स के लिए एक सर्विस हब के रूप में उभरेगा।

इस रणनीतिक साझेदारी का एक और बड़ा पहलू सैन्य अधिकारियों की पारस्परिक तैनाती है। अब भारत के सैन्य अधिकारी फ्रांसीसी बेस पर और फ्रांसीसी अधिकारी भारतीय प्रतिष्ठानों में काम करेंगे। इससे दोनों देशों के बीच सामरिक विश्वास बढ़ेगा और वे भविष्य के वैश्विक मिशनों में एक एकीकृत इकाई की तरह कार्य कर सकेंगे।

रक्षा मंत्रालय ने ‘को-प्रोडक्शन’ शब्द पर विशेष बल दिया है। अब वह दौर बीत गया जब भारत सिर्फ एक बाजार था। अब भारत की निर्माण क्षमता और फ्रांस की आधुनिक तकनीक मिलकर एक ऐसा इकोसिस्टम बना रही हैं जो वैश्विक स्तर पर किसी भी शक्ति को चुनौती देने में सक्षम है।

राजनाथ सिंह ने भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच नई सुरक्षा साझेदारी के महत्व को भी रेखांकित किया। फ्रांस के माध्यम से भारत पूरे यूरोप के साथ अपने रक्षा संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है। दोनों देश इस बात पर सहमत हैं कि इस साझेदारी के ठोस परिणाम जल्द ही पूरी दुनिया के सामने होंगे।

समुद्र की गहराई से लेकर अंतरिक्ष की सुरक्षा तक, भारत-फ्रांस की यह जोड़ी हर मोर्चे पर मुस्तैद है। 20 मई की DRDO-DGA बैठक इसी लंबी यात्रा का एक पड़ाव है। भारत अपनी सीमाओं को सुरक्षित रखने और वैश्विक महाशक्ति बनने के लिए पूरी तरह तैयार है। फ्रांस के साथ यह 10 वर्षीय सहयोग सुनिश्चित करता है कि आने वाले समय में भारत किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए आत्मनिर्भर और अभेद्य होगा।

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