ड्रैगन का दबदबा खत्म! भारत ने अमेरिका और रूस के साथ मिलकर चीन से छीना रेयर अर्थ का ‘खजाना’

आज के युग में दुनिया की सबसे बड़ी और निर्णायक जंग सीमाओं पर नहीं, बल्कि धरती के नीचे छिपे उस बेशकीमती खजाने के लिए लड़ी जा रही है, जिसके बिना न तो आधुनिक फाइटर जेट उड़ान भर सकते हैं और न ही आपका स्मार्टफोन काम कर सकता है। यह मुकाबला ‘रेयर अर्थ’ और ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ का है। दशकों तक चीन इस घमंड में रहा कि ग्लोबल सप्लाई चेन की चाबी सिर्फ उसके पास है और उसकी मर्जी के बिना दुनिया भविष्य की तकनीक विकसित नहीं कर सकती। लेकिन अब वैश्विक भू-राजनीति का पासा पलट चुका है। भारत ने एक ऐसा कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक खेला है जिसने बीजिंग की नींद उड़ा दी है। नई दिल्ली ने चीन के इस एकाधिकार को तोड़ने के लिए रूस और अमेरिका के साथ मिलकर एक ऐसी बिसात बिछाई है, जो सीधे तौर पर ड्रैगन के साम्राज्य का अंत करने वाली है।

चीन का एकाधिकार और खनिजों पर ग्लोबल कंट्रोल

जब भी क्रिटिकल मिनरल्स की बात आती है, तो चीन का वर्चस्व डराने वाला रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, रेयर अर्थ माइनिंग के क्षेत्र में चीन ग्लोबल मार्केट का लगभग 70% हिस्सा नियंत्रित करता है। लेकिन असली खेल प्रोसेसिंग में है, जहाँ 90% खनिजों की प्रोसेसिंग अकेले चीन में होती है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर चीन सप्लाई रोक दे, तो दुनिया भर के टेक हब और डिफेंस प्लांट ठप हो सकते हैं। चीन ने पर्यावरण के मानकों की अनदेखी कर इस बाजार पर कब्जा जमाया था, लेकिन अब भारत इस निर्भरता को जड़ से खत्म करने के लिए तैयार है।

भारत और रूस की महा-डील: कूटनीतिक जीत

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी संतुलित कूटनीति है। जहाँ दुनिया गुटों में बंटी है, वहीं भारत ने रूस के साथ एक ऐसी डील की है जो भविष्य की तकनीक का आधार बनेगी। हाल ही में रूसी परमाणु ऊर्जा कंपनी ‘रोसाटॉम’ के वैज्ञानिक प्रभाग जेएससी गिरेडमेट और भारत की ‘नेक्सॉन जियोकेम’ के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ है। यह डील सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि रेयर अर्थ खनिजों की डीप प्रोसेसिंग और रिसर्च की मजबूत नींव है।

इस समझौते के तहत भारत और रूस मिलकर इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल और परमाणु उद्योग के लिए उन्नत मटेरियल तैयार करेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जेएससी गिरेडमेट ने आईआईटी धनबाद के ‘टेक्समिन फाउंडेशन’ के साथ भी हाथ मिलाया है। यह साझेदारी ‘नियोडिमियम-आयरन-बोरॉन’ (NdFeB) परमानेंट मैग्नेट बनाने के लिए है। ये वही मैग्नेट हैं जो इलेक्ट्रिक वाहनों (EV), विंड टर्बाइन और सैटेलाइट्स की जान होते हैं। इस तकनीक पर अब तक चीन का कब्जा था, लेकिन अब भारत खुद इसका मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की ओर अग्रसर है।

क्वॉड का मेगा-प्लान और 20 अरब डॉलर की चोट

रूस के साथ सहयोग के साथ-साथ भारत ने ‘क्वॉड’ (Quad) गठबंधन में भी अपनी पकड़ मजबूत की है। हालिया बैठकों में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने साफ कर दिया कि कोई भी एक देश ग्लोबल सप्लाई चेन को ब्लैकमेल नहीं कर सकता। ‘क्वॉड क्रिटिकल मिनरल्स इनिशिएटिव’ के तहत सप्लाई चेन के व्यवधानों को खत्म करने की रणनीति तैयार की गई है, जो सीधे बीजिंग के दबदबे को चुनौती देती है।

इन देशों ने मिलकर 20 अरब अमेरिकी डॉलर (लगभग 1.60 लाख करोड़ रुपये) के भारी निवेश का वादा किया है। इस विशाल फंड का मुख्य उद्देश्य चीन का विकल्प खड़ा करना है। चाहे वह बंदरगाहों का निर्माण हो या रेयर अर्थ की सुरक्षित सप्लाई चेन, क्वॉड ने चीन की मनमानी और प्राइस मैनिपुलेशन को कुचलने का पूरा ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया है।

क्रिटिकल मिनरल्स: 21वीं सदी का नया सोना

यह समझना जरूरी है कि आखिर इन खनिजों के लिए इतनी होड़ क्यों है। क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ एलिमेंट्स वो तत्व हैं जो आधुनिक जीवन और राष्ट्रीय सुरक्षा की गारंटी देते हैं। लिथियम और कोबाल्ट के बिना इलेक्ट्रिक वाहन नहीं चल सकते, और बिना इन हाई-टेक मिनरल्स के सेना के उन्नत ड्रोन या मिसाइलें सटीक वार नहीं कर सकतीं।

एंटीमनी, बेरिलियम, कोबाल्ट, गैलियम और टाइटेनियम जैसे खनिजों के बिना सेमीकंडक्टर चिप्स और सोलर पैनल का निर्माण असंभव है। यही कारण है कि भारत ने इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मान लिया है और इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने का संकल्प लिया है।

भारत का ‘रेयर अर्थ कॉरिडोर’ और भविष्य की योजना

भारत ने सिर्फ कूटनीति ही नहीं, बल्कि घरेलू स्तर पर भी काम शुरू कर दिया है। खान मंत्रालय के अनुसार, भारत के पास 30 अत्यंत महत्वपूर्ण खनिजों के विशाल भंडार मौजूद हैं। हमें सिर्फ सही तकनीक और विजन की जरूरत थी, जो अब हमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से मिल रही है।

भारत सरकार ने बजट 2026-2027 में ‘रेयर अर्थ कॉरिडोर’ विकसित करने की घोषणा की है। ये कॉरिडोर ओडिशा, तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में बनाए जाएंगे। इनका उद्देश्य केवल खनिज निकालना नहीं, बल्कि भारत को हाई-परफॉरमेंस मैग्नेट और इलेक्ट्रिक व्हीकल कंपोनेंट्स का ग्लोबल पावरहाउस बनाना है।

निष्कर्ष स्पष्ट है: चीन ने जिस एकाधिकार के दम पर दुनिया को डराने की कोशिश की थी, भारत ने उसे अमेरिका और रूस के सहयोग से ध्वस्त कर दिया है। अमेरिका की तकनीक, रूस की प्रोसेसिंग विशेषज्ञता और भारत का टैलेंट—यह त्रिकोण आने वाले समय में वैश्विक बाजार के नियम तय करेगा।

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