SHANTI Act: भारत ने कैसे पलटा परमाणु ऊर्जा का खेल और अमेरिका को किया मजबूर?

कल तक जो अमेरिका अपनी ताकत के दम पर दुनिया भर में प्रतिबंधों की राजनीति करता था और ईरान जैसे राष्ट्रों को परमाणु कार्यक्रम के नाम पर अलग-थलग रखता था, आज वही महाशक्ति भारत के साथ साझेदारी के लिए लालायित है। वाशिंगटन की 20 सबसे बड़ी न्यूक्लियर कंपनियों का प्रतिनिधिमंडल इन दिनों नई दिल्ली में डेरा डाले हुए है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि कल तक कतराने वाले अमेरिकी दिग्गज आज भारत के लिए रेड कार्पेट बिछा रहे हैं? क्या यह अमेरिका की कोई रणनीतिक विवशता है या भारत का कोई ऐसा ग्लोबल गेम प्लान, जिसे समझना हर भारतीय के लिए गर्व की बात है। इसका उत्तर भारत के उस कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक में है, जिसने वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल पैदा कर दी है।

भारत ने एक ऐसा चक्रव्यूह तैयार किया है जिसमें अमेरिका उसी के नियमों में उलझता दिख रहा है। एक तरफ भारत की महत्वाकांक्षी ऊर्जा योजना है जो अगले दो दशकों में देश की तस्वीर बदल देगी, तो दूसरी तरफ अमेरिका की इस विशाल बाजार में हिस्सा पाने की छटपटाहट है। भारत ने 2047 तक अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को 100 गीगावॉट तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। यह करीब 300 अरब डॉलर का विशाल बाजार है, जिस पर दुनिया भर की नजरें टिकी हैं। सवाल यह है कि आखिर सालों तक दूरी बनाए रखने वाली ये विदेशी कंपनियां अब भारत आने के लिए इतनी उतावली क्यों हैं?

SHANTI Act: भारत का नया रणनीतिक ब्रह्मास्त्र

वैश्विक परिदृश्य को बदलने वाले इस ब्रह्मास्त्र का नाम है SHANTI Act (Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India)। इस कानून के ऐलान के साथ ही अंतरराष्ट्रीय न्यूक्लियर मार्केट में नई हलचल शुरू हो गई है। जो अमेरिकी कंपनियां पहले निवेश से पीछे हट रही थीं, वे अब भारत सरकार के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश में हैं।

इस कानून के महत्व को समझने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटना होगा। 2010 का भारत का पुराना परमाणु उत्तरदायित्व कानून विदेशी कंपनियों के लिए एक बड़ी बाधा था। उस समय के नियमों के अनुसार, किसी भी दुर्घटना की स्थिति में उपकरणों की आपूर्ति करने वाली कंपनी पर भारी वित्तीय और कानूनी जिम्मेदारी डाल दी जाती थी।

इसे सरल भाषा में समझें तो, यदि आप कार खरीदते हैं और उसका एक्सीडेंट हो जाता है, तो पुराने नियमों के तहत जिम्मेदारी चालक के साथ-साथ कार निर्माता की भी होती थी। ऐसी सख्त शर्तों पर कोई भी अंतरराष्ट्रीय कंपनी भारत में निवेश करने को तैयार नहीं थी, क्योंकि उन्हें कानूनी पचड़ों और दिवालिया होने का डर सताता था।

इसी कारण 2008 के ऐतिहासिक परमाणु समझौते के बावजूद धरातल पर कोई बड़ा काम नहीं हो सका। लेकिन अब SHANTI Act ने इस गतिरोध को खत्म कर दिया है। नए कानून ने उत्तरदायित्व के नियमों को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाया है और भारतीय निजी कंपनियों के लिए भी परमाणु क्षेत्र के दरवाजे खोल दिए हैं।

अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रही मारिया कोर्सनिक (प्रेसिडेंट, न्यूक्लियर एनर्जी इंस्टीट्यूट) के अनुसार, अब अमेरिकी उद्योग भारत के साथ सहयोग के लिए पूरी तरह तैयार है। SHANTI Act के बदलावों ने कंपनियों के भीतर भरोसा पैदा किया है, जिससे अब बातचीत समझौतों की ओर बढ़ रही है।

क्या तकनीक का हस्तांतरण बिना शर्त होगा?

हालाँकि, यह राह इतनी भी सरल नहीं है। अमेरिकी कंपनियां अभी भी नियमों के बारीकियों पर ध्यान दे रही हैं। वे चाहती हैं कि कानून के कार्यान्वयन के नियम उनके व्यापारिक हितों के अनुकूल हों। परमाणु उद्योग में निवेश और जोखिम दोनों ही बहुत ऊंचे स्तर के होते हैं, इसलिए कंपनियां पूरी स्पष्टता चाहती हैं।

भारत के लिए भी यह समय अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्तमान में हमारी परमाणु क्षमता महज 8 गीगावॉट है, जिसे 100 गीगावॉट तक पहुँचाना एक बड़ी चुनौती है। यह छलांग भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था की बिजली जरूरतों को पूरा करने और कार्बन उत्सर्जन को शून्य करने की प्रतिबद्धता का हिस्सा है।

इस दौड़ में ‘वेस्टिंगहाउस इलेक्ट्रिक कंपनी’ सबसे आगे है, जो आंध्र प्रदेश में अपने AP1000 रिएक्टर स्थापित करना चाहती है। हालाँकि, व्यावसायिक शर्तों पर बातचीत अभी भी जारी है, क्योंकि भारत अपनी शर्तों पर कोई समझौता नहीं करना चाहता।

विशेष बात यह है कि इस बार होलटेक इंटरनेशनल जैसी कंपनियां ‘स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स’ (SMR) तकनीक लेकर आई हैं। SMR छोटे और आधुनिक रिएक्टर होते हैं जिन्हें सीधे कारखानों में बनाकर जरूरत वाली जगहों पर तैनात किया जा सकता है। यह वैसा ही है जैसे पुराने विशाल कंप्यूटरों की जगह आज पोर्टेबल लैपटॉप ने ले ली है।

तारापुर का इतिहास और भारत की सावधानी

अमेरिका के साथ इन समझौतों के बीच 1969 के तारापुर परमाणु स्टेशन की यादें भी जुड़ी हैं। 1974 में भारत के पहले परमाणु परीक्षण (पोखरण) के बाद अमेरिका ने तारापुर के लिए ईंधन की आपूर्ति रोक दी थी, जिससे भारत को बड़ा सबक मिला।

वह विश्वास की कमी आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। जब अमेरिकी प्रतिनिधियों से भविष्य में ईंधन आपूर्ति की गारंटी पर सवाल पूछा गया, तो उनके अस्पष्ट उत्तर बताते हैं कि भारत की चिंताएं अभी भी वाजिब हैं।

ईंधन के साथ-साथ लागत भी एक बड़ा मुद्दा है। भारत ने स्वदेशी तकनीक से 700 मेगावॉट के रिएक्टर बनाने की क्षमता विकसित कर ली है, जिनकी लागत अमेरिकी रिएक्टर्स की तुलना में काफी कम है। यदि अमेरिकी कंपनियों को भारतीय बाजार में टिकना है, तो उन्हें अपनी लागत को प्रतिस्पर्धी बनाना होगा।

भविष्य की रणनीति और संप्रभुता

विज्ञान मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह और प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिकी नेतृत्व के साथ हालिया मुलाकातों ने ‘यूएस-इंडिया ट्रस्ट इनिशिएटिव’ के माध्यम से सहयोग के नए द्वार खोले हैं। यह साझेदारी तकनीकी भरोसे और मजबूत सप्लाई चेन पर टिकी है।

भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण ‘रीप्रोसेसिंग राइट्स’ और यूरेनियम की निर्बाध आपूर्ति है। भारत अपने ‘क्लोज्ड न्यूक्लियर फ्यूल साइकिल’ मॉडल के तहत इस्तेमाल किए गए ईंधन को रिसाइकिल कर फिर से ऊर्जा पैदा करता है, जो हमारी ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लिए अनिवार्य है।

निष्कर्षतः, यह साझेदारी तभी सफल होगी जब अमेरिका भारत को एक समान भागीदार के रूप में देखे। भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और संप्रभुता से समझौता किए बिना आगे बढ़ रहा है। अमेरिका के लिए यह सिर्फ व्यापार का अवसर नहीं, बल्कि एशिया में अपनी रणनीतिक उपस्थिति बनाए रखने की मजबूरी भी है।

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