यूएनएससी में भारत को रोकने के लिए 57 इस्लामिक देशों की घेराबंदी: क्या सफल होगा ताजिकिस्तान?

दुनिया के सबसे बड़े कूटनीतिक मंच, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में अब तक की सबसे दिलचस्प और कड़ी टक्कर देखने को मिल रही है। एक तरफ वह सशक्त और उभरता हुआ भारत है जिसे ‘ग्लोबल साउथ’ का नेतृत्वकर्ता माना जाता है, और दूसरी तरफ एक ऐसा देश है जिसे मोहरा बनाकर दुनिया के 57 इस्लामिक देश भारत की राह रोकने का प्रयास कर रहे हैं। मामला साल 2028-29 के लिए यूएनएससी की अस्थायी सदस्यता के चुनाव का है। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने न्यूयॉर्क में पूरी ताकत के साथ भारत की दावेदारी पेश की है, लेकिन इस बार का रास्ता चुनौतियों से भरा है। इस बार मुकाबले में ताजिकिस्तान खड़ा है, जिसे पाकिस्तान और इस्लामिक देशों का मजबूत समर्थन हासिल है। आइए इस जियोपॉलिटिकल महासंग्राम का विश्लेषण करते हैं और जानते हैं कि इस रेस में किसका पलड़ा भारी है।

कूटनीति का रणक्षेत्र और भारत का गौरवशाली इतिहास

सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि भारत पहली बार यूएनएससी की सदस्यता के लिए प्रयास नहीं कर रहा है। भारत का ट्रैक रिकॉर्ड इतना मजबूत है कि दुनिया के बड़े राष्ट्र भी इसका लोहा मानते हैं। भारत अब तक आठ बार, कुल 16 वर्षों के लिए यूएनएससी का अस्थायी सदस्य चुना जा चुका है। 1950 से लेकर 2022 तक, जब भी भारत ने इस वैश्विक मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, उसने अंतरराष्ट्रीय नीतियों को प्रभावित किया है।

आंकड़ों पर नजर डालें तो 2011-12 के चुनाव में भारत को 190 में से 187 वोट मिले थे, जबकि 2021-22 में 193 में से 184 वोट भारत के पक्ष में रहे। यह आंकड़े भारत की वैश्विक स्वीकार्यता को दर्शाते हैं। लेकिन, 2028-29 के कार्यकाल के लिए एशिया-पैसिफिक ग्रुप की खाली सीट पर ताजिकिस्तान की दावेदारी ने इस बार मुकाबले को काफी रोचक बना दिया है।

OIC का इस्लामिक कार्ड और ताजिकिस्तान की दावेदारी

ताजिकिस्तान व्यक्तिगत रूप से बहुत बड़ी कूटनीतिक शक्ति नहीं है। मध्य एशिया का यह देश रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण तो है, लेकिन वैश्विक प्रभाव में वह भारत के समकक्ष नहीं ठहरता। फिर भी उसकी दावेदारी को गंभीरता से लिया जा रहा है क्योंकि इसके पीछे 57 इस्लामिक देशों का संगठन (OIC) खड़ा है।

ताजिकिस्तान को ओआईसी का खुला समर्थन प्राप्त है, जिसका अर्थ है कि उसके पास 57 देशों का एक बड़ा वोट बैंक पहले से तैयार है। इस रणनीति के पीछे पाकिस्तान की भूमिका प्रमुख मानी जा रही है, जो किसी भी स्थिति में भारत को यूएनएससी के मंच पर नहीं देखना चाहता। इसके अतिरिक्त, ताजिकिस्तान ‘पहली बार’ सदस्य बनने का कार्ड भी खेल रहा है, जिससे उसे छोटे देशों की सहानुभूति मिल सकती है।

भारत का चक्रव्यूह और जयशंकर का रणनीतिक प्रहार

क्या भारत ओआईसी के 57 वोटों की चुनौती को पार कर पाएगा? यूएन के 193 सदस्य देशों में से चुनाव जीतने के लिए दो-तिहाई बहुमत, यानी कम से कम 129 वोटों की आवश्यकता होती है। यदि ताजिकिस्तान के पास 57 वोट हैं, तो उसे 129 तक पहुंचने के लिए कड़ी मशक्कत करनी होगी। वहीं भारत का वैश्विक नेटवर्क और कूटनीतिक संबंध बेहद गहरे हैं।

भारत को अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, फिजी और श्रीलंका जैसे देशों का समर्थन पहले ही मिल चुका है। यूरोपीय देश, कैरिबियाई द्वीप और अफ्रीका का एक बड़ा हिस्सा पारंपरिक रूप से भारत का समर्थक रहा है। इसके अलावा, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ओआईसी की एकजुटता में सेंध लगाने के लिए ‘शार्क डिप्लोमेसी’ का उपयोग शुरू कर दिया है।

जयशंकर अच्छी तरह जानते हैं कि ओआईसी कोई अटूट गुट नहीं है। हाल ही में उन्होंने कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान जैसे देशों के साथ संपर्क साधा है। सऊदी अरब और यूएई के साथ भारत के संबंध अब तक के सबसे बेहतर दौर में हैं। यह संभावना प्रबल है कि कई खाड़ी देश ओआईसी के रुख से अलग जाकर भारत के पक्ष में मतदान करेंगे।

यूएनएससी की इस जंग में कौन बाजी मारेगा?

यह सच है कि ताजिकिस्तान के आने से मुकाबला कुछ कठिन हुआ है, लेकिन भारत के लिए यह असंभव नहीं है। भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था, सैन्य क्षमता और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की नीति उसे एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति बनाती है। भारत एक नियम-आधारित विश्व व्यवस्था का पक्षधर है, जबकि ताजिकिस्तान के पास फिलहाल कोई बड़ा वैश्विक विजन नहीं है।

जून 2027 में होने वाला यह चुनाव केवल भारत और ताजिकिस्तान के बीच नहीं, बल्कि एक उभरती हुई महाशक्ति के वैश्विक परीक्षण जैसा होगा। यदि भारत खाड़ी और अफ्रीकी देशों में अपनी पकड़ मजबूत रखने में सफल रहा, तो 129 वोटों का आंकड़ा पार करना मात्र एक औपचारिकता होगी। पाकिस्तान की साजिशों के बावजूद, दुनिया जानती है कि वैश्विक निर्णय लेने वाली मेज पर बैठने का वास्तविक हकदार वर्तमान का नया भारत ही है।

 

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