दिल्ली के सत्ता गलियारों में हुई हालिया बैठक को भले ही कुछ लोग सामान्य शिष्टाचार मान रहे हों, लेकिन यह वास्तव में वैश्विक कूटनीति के पटल पर एक बड़े ‘महा-भूकंप’ जैसा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के बीच की यह वार्ता केवल दो देशों की बातचीत नहीं थी, बल्कि यह चीन की उस घेरेबंदी का करारा जवाब है जिसे बीजिंग लंबे समय से बुन रहा था। इस मुलाकात के कुछ ही घंटों के भीतर चीन के आधिकारिक तंत्र और मीडिया में हड़कंप मच गया। स्थिति यह है कि चीनी विदेश मंत्रालय को अपनी बौखलाहट सार्वजनिक रूप से जाहिर करनी पड़ी। आखिर इस मुलाकात में ऐसा क्या था जिसने ड्रैगन की रातों की नींद उड़ा दी है?
चीन की बेचैनी और भारत की कूटनीतिक जीत
भू-राजनीतिक विश्लेषक इस बात से हैरान हैं कि आखिर चीन को इस मुलाकात से इतनी ‘मिर्ची’ क्यों लग रही है? दरअसल, बीजिंग को उम्मीद थी कि भारत-जापान संबंध केवल व्यापारिक समझौतों तक सीमित रहेंगे। लेकिन जब 10 ट्रिलियन येन (लगभग 5.9 लाख करोड़ रुपये) के निवेश का ब्लूप्रिंट सामने आया, तो चीन के आर्थिक हितों को गहरा झटका लगा। सेमीकंडक्टर से लेकर स्पेस और डिफेंस सेक्टर में साझा रोडमैप तैयार करना चीन के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है। भारत और जापान ने मिलकर ड्रैगन की उस कमजोर नस को पकड़ लिया है जिसे वह दुनिया से छिपाने का प्रयास करता रहा है।
‘छोटी बहन’ संबोधन के पीछे का गहरा संदेश
कूटनीति में शब्दों का चयन हथियारों से अधिक मारक होता है। पीएम मोदी द्वारा सनाए ताकाइची को ‘छोटी बहन’ कहना महज एक भावनात्मक शब्द नहीं था, बल्कि एशिया की राजनीति में एक कड़ा संदेश था। इस संबोधन ने कागजी समझौतों को एक अटूट पारिवारिक और रणनीतिक विश्वास में बदल दिया है। यह रिश्ता सीधे तौर पर पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की विरासत को आगे बढ़ाता है। ताकाइची, जो आबे को अपना आदर्श मानती हैं, अब मोदी के साथ मिलकर उसी विजन पर काम कर रही हैं। चीन को डर है कि जब नेतृत्व के बीच इतना गहरा भरोसा हो, तो उसकी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति विफल हो जाएगी।
ड्रैगन के बौखलाने के वास्तविक कारण
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन की तीखी टिप्पणियां बीजिंग के डर को दर्शाती हैं। उन्होंने जापान की पीएम के बयानों को शांति विरोधी बताया है, लेकिन असलियत यह है कि चीन ‘फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक’ की अवधारणा से घबराता है। ताकाइची का ताइवान के प्रति कड़ा रुख और यह कहना कि ताइवान की सुरक्षा जापान की सुरक्षा है, सीधे तौर पर चीन की विस्तारवादी नीतियों को चुनौती देता है।
चीन हमेशा से भारत को हिमालयी सीमाओं और जापान को पूर्वी चीन सागर में उलझाए रखना चाहता था। लेकिन अब भारत-जापान की इस जुगलबंदी ने चीन पर ‘टू-फ्रंट प्रेशर’ बना दिया है। यदि चीन हिमालय में कोई दुस्साहस करता है, तो जापान प्रशांत क्षेत्र में उसकी सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, ताइवान पर दबाव बनाने की स्थिति में भारतीय नौसेना हिंद महासागर में चीन की सप्लाई चेन को बाधित करने में सक्षम है।
आर्थिक मोर्चे पर चीन की घेराबंदी
यह साझेदारी केवल रक्षा तक सीमित नहीं है। फार्मा, डिफेंस और क्रिटिकल टेक्नोलॉजी में भारत-जापान का गठबंधन ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति को धार दे रहा है। जापान की हाई-एंड तकनीक और भारत का विशाल बाजार मिलकर वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब का केंद्र चीन से भारत की ओर स्थानांतरित कर रहे हैं। नॉर्थ-ईस्ट इंडिया में जापान का निवेश भारत की संप्रभुता को मजबूती प्रदान करता है और चीन के दावों को खारिज करता है।
यह कूटनीतिक बदलाव पूरे आसियान देशों के लिए एक नई उम्मीद है। वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देश अब एक मजबूत विकल्प देख रहे हैं जो क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रख सके। चीन का यह प्रोपेगेंडा कि क्वाड या भारत-जापान की दोस्ती अस्थिरता पैदा करेगी, अब पूरी दुनिया के सामने बेअसर साबित हो रहा है।
भारत की मजबूत वैश्विक स्थिति
आज का भारत अपनी रक्षा और विदेश नीति के लिए किसी अन्य पर निर्भर नहीं है, बल्कि स्वयं विमर्श (नैरेटिव) तय कर रहा है। पीएम मोदी और ताकाइची की यह शिखर वार्ता संदेश देती है कि एशिया का भविष्य अब बीजिंग के दबाव में नहीं, बल्कि दिल्ली और टोक्यो के आपसी तालमेल से तय होगा। जापान का भारत पर यह अटूट भरोसा भारत को एक विश्वसनीय ग्लोबल पार्टनर के रूप में स्थापित करता है। चीन की यह बौखलाहट उसकी कूटनीतिक हार का प्रमाण है, जबकि भारत का यह मास्टरस्ट्रोक उसे विश्व शक्ति बनाने की दिशा में एक निर्णायक कदम है।

