नया हिंदुस्तान: स्कूलों में सेक्स एजुकेशन की तैयारी, POCSO मामलों को रोकने के लिए सरकार का ऐतिहासिक कदम

इक्कीसवीं सदी का उभरता भारत अब न केवल रक्षा और अर्थव्यवस्था में दुनिया को चुनौती दे रहा है, बल्कि सामाजिक सुधारों और आधुनिक सोच में भी वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बना रहा है। समाज की उन रूढ़ियों और संकोच की बेड़ियों को तोड़ने का समय आ गया है, जिसने दशकों से हमें जकड़ रखा था। आज हम एक ऐसे ऐतिहासिक निर्णय की चर्चा कर रहे हैं जो हमारे बच्चों के भविष्य और उनकी सुरक्षा से गहरा नाता रखता है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक बड़ा ऐलान किया है, जिसकी मांग लंबे समय से हो रही थी। अब अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों की तर्ज पर भारत के स्कूलों में भी ‘कॉम्प्रेहेंसिव सेक्स एजुकेशन’ को मुख्य पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा। यह कदम एक सुरक्षित और जागरूक समाज की ओर बढ़ता हुआ भारत का सबसे साहसिक प्रयास है।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ के समक्ष केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने स्पष्ट किया कि सरकार ने स्कूलों और कॉलेजों में व्यापक यौन शिक्षा (CSE) शुरू करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है। सरकार ने स्पष्ट किया कि जैसे ही न्यायालय से इस योजना को हरी झंडी मिलती है, इसे देश की शिक्षा प्रणाली का हिस्सा बना दिया जाएगा। यह फैसला दर्शाता है कि वर्तमान व्यवस्था पुरानी सोच को पीछे छोड़ बच्चों के अधिकारों के लिए कड़े निर्णय लेने के लिए तैयार है।

इस बड़े बदलाव की आवश्यकता क्यों पड़ी, इसे समझना भी जरूरी है। दरअसल, हमारा कानूनी तंत्र लंबे समय से पॉक्सो (POCSO) एक्ट से जुड़ी एक जटिल समस्या का सामना कर रहा था। कानूनन 18 साल से कम उम्र के बच्चों के बीच शारीरिक संबंध अपराध है, लेकिन वर्तमान डिजिटल युग में किशोरों के बीच आपसी सहमति से बनने वाले संबंधों के कारण कई कानूनी पेचदगियां पैदा हो रही थीं।

ऐसे मामलों में अक्सर किशोरों को गंभीर अपराधी मान लिया जाता था, जिससे उनका भविष्य दांव पर लग जाता था। सुप्रीम कोर्ट ने इसी समस्या को देखते हुए सरकार को एक मनोवैज्ञानिक और ठोस समाधान निकालने का निर्देश दिया था। इसी निर्देश के बाद सरकार ने यह नया शैक्षणिक खाका तैयार किया है ताकि किशोरों को सही और गलत के बीच का फर्क वैज्ञानिक तरीके से समझाया जा सके।

इस योजना को तैयार करने के लिए महिला और बाल विकास मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव की अध्यक्षता में 26 सदस्यीय एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति बनाई गई थी। इसमें टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक, कई मंत्रालयों के अधिकारी और बाल अधिकार संरक्षण आयोग के प्रतिनिधि शामिल थे। पैनल का मुख्य उद्देश्य यह तय करना था कि किशोरों की निजता और उनके अधिकारों को पॉक्सो एक्ट के दायरे में कैसे संतुलित किया जाए।

विशेषज्ञों ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि अब समय आ गया है जब यौन शिक्षा और शोषण जैसे संवेदनशील विषयों को सिलेबस में अनिवार्य किया जाए। समिति ने सिफारिश की है कि इसकी शुरुआत ‘फाउंडेशनल स्टेज’ यानी प्राथमिक स्कूलों से ही होनी चाहिए। बच्चों को शरीर के अंगों की सही जानकारी, स्वच्छता और सबसे महत्वपूर्ण ‘गुड टच और बैड टच’ के बीच का अंतर बचपन से ही सिखाया जाना चाहिए ताकि वे खुद का बचाव कर सकें।

इस नए पाठ्यक्रम को तैयार करने की जिम्मेदारी एनसीईआरटी (NCERT) को दी गई है। यह शिक्षा पूरी तरह से ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ (NEP) के अनुरूप होगी, जो बच्चों के समग्र विकास और जीवन कौशल पर जोर देती है। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि प्राथमिक स्तर से ही हर स्कूल में एक विशेष शिक्षक नियुक्त होना चाहिए और इन विषयों पर साप्ताहिक कक्षाएं आयोजित की जानी चाहिए।

समिति का यह भी मानना है कि यह बदलाव अभिभावकों के सहयोग के बिना संभव नहीं है। इसलिए, शिक्षकों के साथ-साथ पेरेंट्स के लिए भी विशेष सत्र आयोजित किए जाएंगे ताकि घर और स्कूल दोनों जगह बच्चों को एक सुरक्षित और खुला माहौल मिल सके। जब बच्चे बिना डरे अपनी बात साझा करेंगे, तभी समाज में सकारात्मक बदलाव आएगा।

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ताओं और एमिकस क्यूरी ने भी इस रिपोर्ट की सराहना की है। अदालत सरकार की इस पहल से संतुष्ट दिखी और जल्द ही इस पर औपचारिक आदेश पारित होने की संभावना है। यदि हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो अमेरिका, स्वीडन और नीदरलैंड जैसे देशों में दशकों पहले से ऐसी शिक्षा दी जा रही है, जिसके सकारात्मक परिणाम टीनएज प्रेगनेंसी और बाल शोषण के मामलों में कमी के रूप में सामने आए हैं।

भारत युवाओं का देश है और यदि हमारी भावी पीढ़ी मानसिक रूप से जागरूक होगी, तो वे किसी भी तरह के शोषण का शिकार होने से बच सकेंगे। सरकार और न्यायपालिका का यह समन्वय नए भारत की एक सुरक्षित और सशक्त बुनियाद रखने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

 

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