क्या संयुक्त राष्ट्र (UN) का अस्तित्व बना रहेगा या यह इतिहास बन जाएगा? विदेश मंत्री एस जयशंकर का हालिया अल्टीमेटम UN की 80 साल पुरानी नींव को हिला रहा है। सवाल यह है कि क्या 2027 तक वैश्विक व्यवस्था दो हिस्सों में बंट जाएगी? जयशंकर ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में वह स्थान नहीं मिला जिसका वह हकदार है, तो यह पूरी व्यवस्था ढह सकती है। अरब देशों के साथ जयशंकर की गोपनीय बातचीत और 57 इस्लामिक देशों के गुट द्वारा ताजिकिस्तान को मोहरे की तरह इस्तेमाल करने के पीछे की असल कहानी क्या है? आज हम वैश्विक राजनीति के उस मंच का विश्लेषण करेंगे जहां P-5 देशों के वीटो एकाधिकार को चुनौती देने की तैयारी हो चुकी है।
शुरुआत में यह केवल 2028-29 की दो साल की अस्थायी सदस्यता का चुनाव लग सकता है, लेकिन यह उससे कहीं बड़ा है। भारत 1950 से 2022 के बीच आठ बार UNSC का अस्थायी सदस्य रह चुका है, लेकिन इस बार का अभियान अलग है। भारत अब केवल नियमों का पालन करने वाला ‘रूल टेकर’ नहीं, बल्कि ‘रूल मेकर’ बनने की राह पर है। यह 2028 का कार्यकाल एक ड्रेस रिहर्सल है, जिसका मुख्य लक्ष्य स्थायी सदस्यता और वीटो पावर हासिल करना है। जयशंकर ने न्यूयॉर्क से स्पष्ट कर दिया है कि यदि UN ने वर्तमान वास्तविकताओं के अनुसार खुद को नहीं बदला, तो इसका हश्र भी ‘लीग ऑफ नेशंस’ जैसा होगा—यानी पूर्ण पतन।
OIC की घेराबंदी और पाकिस्तान का ‘कॉफी क्लब’
जून 2027 में होने वाला चुनाव चुनौतीपूर्ण है। एशिया-पैसिफिक समूह की सीट के लिए भारत का मुकाबला ताजिकिस्तान से है। भले ही ताजिकिस्तान एक छोटा देश हो, लेकिन उसके पीछे 57 देशों वाले इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) का समर्थन है। पाकिस्तान इस खेल का मुख्य सूत्रधार है, जिसका एकमात्र एजेंडा भारत को वैश्विक मंचों पर रोकना और कश्मीर मुद्दे पर भ्रम फैलाना है। OIC के ब्लॉक वोट ताजिकिस्तान की ओर मुड़ने की स्क्रिप्ट पहले ही तैयार की जा चुकी है।
संयुक्त राष्ट्र में 193 सदस्य हैं और जीतने के लिए 129 वोटों की आवश्यकता है। यदि OIC के 57 देश एकजुट होकर ताजिकिस्तान को वोट देते हैं, तो भारत के लिए राह कठिन हो सकती है। इसके अलावा, ‘कॉफी क्लब’ (Uniting for Consensus) भी सक्रिय है, जिसमें इटली, पाकिस्तान, तुर्की और अर्जेंटीना जैसे देश शामिल हैं। इनका मुख्य उद्देश्य भारत, ब्राजील, जापान और जर्मनी (G-4) को स्थायी सदस्य बनने से रोकना है। ये देश अपनी क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता के कारण वैश्विक सुधारों में बाधा डाल रहे हैं।
जयशंकर की चाणक्य नीति और सीक्रेट बैलेट का खेल
क्या ‘कॉफी क्लब’ भारत को रोक पाएगा? यहीं जयशंकर की कूटनीति काम आती है। जयशंकर जानते हैं कि कागजों पर OIC एक ब्लॉक हो सकता है, लेकिन गुप्त मतदान के समय हर देश अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है। भारत ने बहुपक्षीय मंचों के बजाय द्विपक्षीय संबंधों पर जोर दिया है। जयशंकर के कतर, यूएई, सऊदी अरब और ओमान के हालिया दौरे इसी रणनीतिक सेंधमारी का हिस्सा हैं।
UN में चुनाव ‘सीक्रेट बैलेट’ से होता है, जिससे किसी देश को पता नहीं चलता कि किसने किसे वोट दिया। भारत इसी का लाभ उठाएगा। खाड़ी देशों के लिए भारत एक अनिवार्य व्यापारिक और रणनीतिक साझेदार है। अपनी खाद्य सुरक्षा और तकनीकी भविष्य के लिए ये देश पाकिस्तान के एजेंडे के बजाय भारत के साथ खड़े होना पसंद करेंगे। 2027 में यही आर्थिक रिश्ते वोट में तब्दील होंगे।
समुद्री सुरक्षा: भारत की शक्ति बनाम लैंडलॉक्ड ताजिकिस्तान
जयशंकर ने न्यूयॉर्क में समुद्री सुरक्षा (Maritime Security) को प्रमुख मुद्दा बनाया है। वर्तमान में लाल सागर और अदन की खाड़ी में हूती विद्रोहियों के हमलों से वैश्विक सप्लाई चेन खतरे में है। पश्चिमी देशों का व्यापार अरबों डॉलर का नुकसान झेल रहा है। ऐसी स्थिति में दुनिया की नजरें सुरक्षा के लिए भारत की ओर हैं।
ताजिकिस्तान एक स्थल-रुद्ध (Landlocked) देश है, जिसके पास नौसेना नहीं है। वह वैश्विक समुद्री व्यापार की रक्षा नहीं कर सकता। इसके विपरीत, भारतीय नौसेना ने हाल के महीनों में दर्जनों जहाजों को समुद्री लुटेरों और ड्रोन हमलों से बचाया है। जयशंकर ने दुनिया को याद दिलाया है कि यदि समुद्री रास्तों को सुरक्षित रखना है, तो UNSC की मेज पर भारत की उपस्थिति अनिवार्य है। यह केवल भारत की मांग नहीं, बल्कि दुनिया के आर्थिक अस्तित्व की जरूरत है।
भारत का ‘SHANTI’ एजेंडा और वैश्विक दक्षिण की आवाज
भारत ने अपने अभियान को ‘SHANTI’ (Securing Holistic Advancement through Norms, Trust and Integrity) का नाम दिया है। यह विजन डॉक्यूमेंट वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज बनने पर केंद्रित है। जहां चीन ने ‘बेल्ट एंड रोड’ के जरिए विकासशील देशों को कर्ज के जाल में फंसाया है, वहीं भारत ने G-20 में अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता दिलाकर अपनी विश्वसनीयता साबित की है।
अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के पास कुल 87 वोट हैं। यदि भारत इन देशों का विश्वास जीत लेता है, तो ताजिकिस्तान की चुनौती स्वतः समाप्त हो जाएगी। भारत अब खुलेआम कह रहा है कि 1945 के मॉडल पर आधारित वीटो पावर आज के समय में अप्रासंगिक है। मलेशिया और फिनलैंड जैसे देश भी अब भारत की इस मांग का समर्थन कर रहे हैं कि UNSC में व्यापक सुधार होने चाहिए।
वीटो पावर पर भारत का मास्टरस्ट्रोक
भारत ने एक बड़ा लचीला रुख अपनाते हुए प्रस्ताव दिया है कि यदि उसे स्थायी सदस्यता मिलती है, तो वह शुरुआती 15 वर्षों के लिए वीटो पावर का उपयोग टालने के लिए तैयार है। यह P-5 देशों के उस तर्क को काटता है कि अधिक वीटो से निर्णय लेने में देरी होगी। भारत ने स्पष्ट किया है कि उसे सत्ता का मोह नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर समानता चाहिए।
पोलैंड, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और ऑस्ट्रिया जैसे देश अब भारत की उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे हैं। भारत न केवल सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, बल्कि शांति सेना (Peacekeeping) में सबसे अधिक योगदान देने वालों में से एक है। जयशंकर ने साफ कर दिया है कि निर्णय लेने की शक्ति उन देशों के पास होनी चाहिए जो वास्तव में जमीन पर शांति के लिए अपना खून बहाते हैं।
इसके अतिरिक्त, भारत ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के खतरों और आतंकवाद की फंडिंग (Terror Funding) पर कड़ा रुख अपनाया है। यह सीधे तौर पर उन देशों को चेतावनी है जो आतंकवाद को सरकारी नीति के रूप में उपयोग करते हैं।
भारत 3.7 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और एक परमाणु शक्ति है। दूसरी ओर, ताजिकिस्तान का प्रभाव सीमित है। 2027 का चुनाव यह तय करेगा कि क्या UN एक प्रभावी संस्था बना रहेगा या अपनी प्रासंगिकता खो देगा। भारत अब रक्षात्मक नहीं खेल रहा है; वह नए वैश्विक व्यवस्था (New Global Order) की रूपरेखा तैयार कर रहा है।
क्या आपको लगता है कि भारत के बिना संयुक्त राष्ट्र वाकई अपना वजूद खो देगा? क्या ‘कॉफी क्लब’ भारत की राह रोक पाएगा? अपने विचार नीचे कमेंट्स में साझा करें।

