2013 की केदारनाथ त्रासदी, 2021 का चमोली हादसा और अब अगस्त 2024 में नेपाल में आई प्रलयकारी हिमालयी सुनामी—क्या ये घटनाएं महज प्राकृतिक संयोग हैं? या फिर ड्रैगन भारत और नेपाल को दहलाने के लिए किसी ‘क्लाइमेट वेपन’ का परीक्षण कर रहा है? कयास लगाए जा रहे हैं कि अमेरिकी राजदूत के खुफिया ड्रोन ने तिब्बत की ऊंचाइयों पर चीन का कोई ऐसा राज देख लिया था, जिसे मिटाने के लिए बीजिंग ने कृत्रिम बाढ़ का सहारा लिया। सैटेलाइट डेटा संकेत दे रहे हैं कि जिस स्थान से यह जल-प्रलय शुरू हुई, वहां कोई बड़ा ग्लेशियर मौजूद ही नहीं था। तो फिर लाखों गैलन पानी अचानक कहां से आया? क्या तिब्बत की घाटियों में चीन का कोई ‘वाटर-बॉम्ब’ प्रयोग विफल हो गया? आखिर क्यों चीन ने अपने ही 51,000 करोड़ के केरुंग-काठमांडू रेलवे प्रोजेक्ट की बलि चढ़ा दी? क्या मलबे के नीचे चीन की कोई गुप्त वेदर-मॉडिफिकेशन लैब दफन है?
आज हम इन रहस्यों की परतें खोलेंगे और बताएंगे कि कैसे हिमालय में एक ‘साइलेंट वॉर’ छिड़ चुका है। अगस्त 2024 के अंत में नेपाल के रसुवा और भोटेकोशी क्षेत्रों में आई भीषण बाढ़ ने 1127 से अधिक जिंदगियां लील लीं और हजारों लापता हो गए। इस तबाही ने कूटनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। क्या यह चीन की कोई सोची-समझी भू-रणनीतिक साजिश थी? आखिर अमेरिकी राजनयिक सर्गियो गोर के दौरे के तुरंत बाद ही हिमालय का सीना क्यों फटा? और क्या नेपाल ने विदेशी प्रोजेक्ट्स के लालच में अपने ही अस्तित्व का सौदा कर लिया है?
अमेरिकी दौरा और चीन की घबराहट
इस त्रासदी की कड़ियां अप्रैल-मई 2024 के उस हाई-प्रोफाइल दौरे से जुड़ती हैं, जब अमेरिकी राजनयिक सर्गियो गोर एवरेस्ट बेस कैंप पहुंचे और सीमावर्ती इलाकों में ड्रोन उड़ाया। चीन के लिए तिब्बत हमेशा से एक संवेदनशील दुखती रग रहा है। मुस्तंग और एवरेस्ट के इलाकों में अमेरिकी सक्रियता ने बीजिंग को बेचैन कर दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि ड्रोन कैमरों ने पीएलए (PLA) की कुछ ऐसी गतिविधियों को कैद किया है, जिसने चीन की नींद उड़ा दी। इस विनाशकारी बाढ़ को कुछ जानकार चीन की तरफ से एक कड़ी चेतावनी और कूटनीतिक ब्लैकमेल के तौर पर देख रहे हैं, ताकि वह दिखा सके कि हिमालय के जलस्रोतों पर उसका पूर्ण नियंत्रण है।
नेपाल के कूटनीतिक हलकों में डर है कि चीन भविष्य में ‘कृत्रिम आपदाओं’ को हथियार बनाकर काठमांडू को अपनी उंगलियों पर नचा सकता है। सर्गियो गोर के दौरे ने चीन को संदेश दिया था कि वाशिंगटन की नजरें तिब्बत पर हैं, और मुस्तंग का ऐतिहासिक संबंध खम्पा विद्रोहियों से होने के कारण चीन का डर और भी गहरा गया है।
कृत्रिम बाढ़ और तिब्बत का छिपा सच
सरकारी तौर पर इसे ‘ग्लेशियर रॉक एवलांच’ कहा गया, लेकिन तिब्बती कार्यकर्ताओं और खुफिया सूत्रों ने इस थ्योरी पर सवाल उठाए हैं। आरोप है कि 26 अगस्त को जिस क्षेत्र से पानी आया, वहां कोई विशाल ग्लेशियर था ही नहीं। शक है कि चीन ने तिब्बत की ओर बहने वाली नदियों को अस्थाई बांध बनाकर रोका था और फिर एक सोची-समझी रणनीति के तहत पानी छोड़ दिया गया। चीन ने इस क्षेत्र में इंटरनेट और सूचनाओं पर पूरी तरह पाबंदी लगा रखी है, जिससे वास्तविक सैटेलाइट इमेजरी बाहर नहीं आ पा रही है। स्वतंत्र जांचकर्ताओं का दावा है कि चीन द्वारा जारी वीडियो एआई-जनरेटेड या भ्रामक हो सकते हैं।
हाइड्रोलॉजिकल वॉरफेयर: भारत के लिए खतरे की घंटी
नेपाल की यह घटना भारत के लिए भी बड़ी चेतावनी है। 2013 की केदारनाथ और 2021 की चमोली आपदा के समय भी ऐसे ही सवाल उठे थे। चीन ‘स्काई रिवर’ (तियानहे) जैसे प्रोजेक्ट्स पर अरबों डॉलर खर्च कर रहा है, ताकि तिब्बती पठार पर बारिश और बर्फबारी को नियंत्रित किया जा सके। इसे ‘हाइड्रोलॉजिकल वॉरफेयर’ कहते हैं।
भारत और नेपाल की नदियां तिब्बत से निकलती हैं। चीन ‘अपर राइपेरियन’ देश होने का फायदा उठाकर डेटा को हथियार की तरह इस्तेमाल करता है, जैसा उसने डोकलाम विवाद के समय ब्रह्मपुत्र के मामले में किया था। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन हिमालय में ऐसे प्रयोग कर रहा है जिससे वह बिना युद्ध लड़े दुश्मन के इंफ्रास्ट्रक्चर को पानी से तबाह कर सके।
केरुंग-काठमांडू प्रोजेक्ट और ड्रैगन का दांव
इस कहानी में एक पेच यह भी है कि इस बाढ़ में चीन का अपना ग्यिरोंग लैंड पोर्ट भी तबाह हो गया। यह पोर्ट नेपाल-चीन व्यापार की लाइफलाइन था। साथ ही 51,000 करोड़ रुपये का महत्वाकांक्षी रेलवे प्रोजेक्ट भी खतरे में पड़ गया है। सवाल उठता है कि क्या चीन खुद अपना नुकसान करेगा? इसके दो विश्लेषण हैं: पहला, ‘कैलकुलेटेड रिस्क’ यानी अमेरिका को दूर रखने के लिए छोटे नुकसान को सहना। दूसरा, चीन के कृत्रिम बांध हिमालय के भूगोल के आगे टिक नहीं पाए और अनियंत्रित होकर खुद उसके अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को ले डूबे।
नेपाल की आत्मघाती नीतियां
इस तबाही के लिए काठमांडू की नीतियां भी जिम्मेदार हैं। नेपाल ने विदेशी निवेश के लालच में हिमालय के संवेदनशील इको-सिस्टम को बांधों के जाल में बदल दिया है। वर्तमान में 225 से अधिक हाइड्रो पावर प्लांट चालू हैं, जिनमें से अधिकतर सीज्मिक जोन 5 में आते हैं। त्रिशूली बेसिन की 12 बड़ी परियोजनाएं इस बाढ़ में पूरी तरह नष्ट हो गई हैं। पर्यावरण मानकों की अनदेखी कर बनाए गए ये प्रोजेक्ट अब जानलेवा साबित हो रहे हैं।
मुआवजे की राजनीति और चीन का दबाव
तबाही के बाद नेपाल सरकार ने ‘क्लाइमेट चेंज’ के नाम पर बड़ी शक्तियों से हर्जाना मांगने का नाटक शुरू किया। विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने पहले तो आक्रामक रुख अपनाया, लेकिन काठमांडू स्थित चीनी दूतावास के एक फोन कॉल के बाद उन्होंने तुरंत यू-टर्न ले लिया। यह दिखाता है कि नेपाल की विदेश नीति किस कदर चीन के प्रभाव में है। अब नेपाल सीधे किसी देश पर उंगली उठाने के बजाय संयुक्त राष्ट्र के ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ से पैसे मांग रहा है।
निष्कर्ष: भारत को होना होगा सतर्क
नेपाल की यह बाढ़ केवल एक आपदा नहीं, बल्कि भविष्य के ‘साइलेंट वॉर’ का ट्रेलर है। चीन का वेदर मॉडिफिकेशन प्रोग्राम भारत की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है। अगर चीन बादलों और पानी को हथियार बनाने में सफल रहा, तो पूरा उत्तर भारत खतरे में पड़ सकता है। भारत को अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन के इस हाइड्रोलॉजिकल वॉरफेयर को बेनकाब करना होगा और एक प्रो-एक्टिव पॉलिसी अपनानी होगी, क्योंकि हिमालय पर नियंत्रण ही एशिया का भविष्य तय करेगा।

