आसमान में उड़ता अमेरिका का वो गुरूर, जिसे दुनिया MQ-9 रीपर के नाम से जानती है, यमन के रेगिस्तानों में महज आठ लाख रुपये के मामूली रॉकेट से टकराकर खाक हो गया। दुनिया का सबसे आधुनिक फिफ्थ जनरेशन फाइटर जेट F-35, भारत के केरल में बारिश के सामने लाचार नजर आता है और हफ्तों तक रनवे पर खड़ा रहता है। रूस के अजेय कहे जाने वाले S-400 सिस्टम हवा में धुआं हो रहे हैं और अमेरिका की महंगी मिसाइलें चूक रही हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि भारत 32,000 करोड़ रुपये खर्च करके अमेरिका से वही ड्रोन क्यों ले रहा है, जो ईरान और हूतियों के सामने बेअसर साबित हो रहे हैं? क्या भारत के स्वदेशी फाइटर जेट तेजस की राह रोकने के लिए अमेरिका ने जानबूझकर इंजनों की सप्लाई रोक दी है? या फिर पर्दे के पीछे कोई ‘किल स्विच’ वाली चाल है, जिससे अमेरिका युद्ध के बीच भारत के हथियारों को बेकार कर सकता है? यह आज के आधुनिक युद्ध और वैश्विक हथियार बाज़ारों की वो कड़वी सच्चाई है, जिसे समझना भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के लिए अनिवार्य है।
300 करोड़ का अमेरिकी शिकारी और 8 लाख का रॉकेट
जब भारत ने 31 MQ-9B ड्रोन्स के लिए अमेरिका के साथ 32,000 करोड़ रुपये का सौदा किया, तो इसे बड़ा रक्षा सुधार बताया गया। लेकिन युद्ध क्षेत्रों से आ रही खबरें कुछ और ही कह रही हैं। जिस MQ-9 रीपर को ‘अजेय शिकारी’ कहा जाता था, वह अब आसान शिकार बन गया है। असल में, यह ड्रोन उन इलाकों के लिए बना था जहाँ दुश्मन के पास रडार या एयर डिफेंस नहीं थे, जैसे अफगानिस्तान या इराक में तालिबान के खिलाफ। वहां यह 40 हजार फीट की ऊंचाई से मिसाइल दागकर सुरक्षित लौट आता था। लेकिन जैसे ही इसका सामना आधुनिक रडार और एयर डिफेंस सिस्टम से हुआ, इसकी तकनीक विफल होने लगी।
यमन में हूती विद्रोहियों ने ईरान की मदद से मिलने वाली महज 8 लाख रुपये की मिसाइलों से अमेरिका के कई MQ-9 ड्रोन्स को मार गिराया है। जरा सोचिए, 250 करोड़ का ड्रोन और 8 लाख का रॉकेट—यह मॉडर्न वॉरफेयर का सबसे बड़ा आर्थिक और रणनीतिक नुकसान है। जब एक सस्ता हथियार आपके सबसे महंगे एसेट को तबाह कर दे, तो वह तकनीक पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
ब्लैक सी में रूस के एक Su-27 जेट ने बिना मिसाइल चलाए सिर्फ फ्यूल डंप करके इस ड्रोन को समंदर में गिरा दिया था। MQ-9 की सबसे बड़ी कमजोरी इसका बड़ा आकार (रडार क्रॉस सेक्शन) और धीमी गति है। यह 400-480 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ता है, जो आज की सुपरसोनिक मिसाइलों के सामने एक ‘सिटिंग डक’ जैसा है। इसके अलावा, यह पूरी तरह GPS और सैटेलाइट लिंक पर निर्भर है, जिसे रूस और चीन जैसे देश आसानी से जैम कर सकते हैं।
आखिर भारत क्यों खरीद रहा है ये ड्रोन्स?
सवाल उठता है कि अगर यह इतना असुरक्षित है, तो भारत इसे क्यों ले रहा है? दरअसल, भारत की रणनीति अलग है। भारत इन ड्रोन्स का उपयोग हिंद महासागर में चीनी जहाजों और पनडुब्बियों पर नजर रखने के लिए करेगा। समंदर के खुले आसमान में, जहाँ जमीन आधारित एयर डिफेंस का खतरा कम है, वहां यह सर्विलांस के लिए बेहतरीन है। सेना इसका उपयोग LAC पर सीमा के भीतर रहकर दुश्मन के इलाके में 200-300 किमी अंदर झांकने के लिए करेगी। यानी, इसे सीधे युद्ध में उतारने के बजाय निगरानी का मुख्य जरिया बनाया जाएगा।
F-35 की विफलता और तकनीकी गुलामी का डर
अमेरिका ने भारत पर F-35 खरीदने का काफी दबाव बनाया, लेकिन भारत ने अपने स्वदेशी AMCA प्रोग्राम को चुना। भारत का फैसला सही था, जिसका सबूत तिरुवनंतपुरम एयरपोर्ट पर मिला। ब्रिटेन का एक F-35B तकनीकी खराबी के कारण वहां इमरजेंसी लैंडिंग करता है और कई दिनों तक खड़ा रहता है। पता चला कि जब तक यह विमान अमेरिका के सर्वर (ODIN सॉफ्टवेयर) से कनेक्ट नहीं हुआ, इसे ठीक करना या उड़ाना मुमकिन नहीं था।
सोचिए, अगर युद्ध के दौरान अमेरिका से कूटनीतिक तनाव हो जाए, तो वह वाशिंगटन में बैठकर एक बटन दबाकर भारत के पूरे बेड़े को ‘लॉक’ कर सकता है। भारत की भौगोलिक स्थितियां ऐसी हैं कि हमें राजस्थान की गर्मी से लद्दाख की ठंड तक काम करने वाले स्वतंत्र विमान चाहिए, न कि विदेशी सर्वर पर निर्भर खिलौने।
तेजस के इंजनों पर अमेरिकी ब्रेक: एक सोची-समझी साजिश?
जब अमेरिका भारत को अपना फाइटर जेट नहीं बेच पाया, तो उसने भारत के स्वदेशी कार्यक्रम में अड़ंगा लगाना शुरू कर दिया। तेजस Mk-1A के लिए अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक (GE) ने इंजनों की डिलीवरी में दो साल की देरी कर दी है। बहाना ‘सप्लाई चेन’ का बनाया जा रहा है, लेकिन हकीकत कुछ और है।
वही GE कंपनी दक्षिण कोरिया के जेट्स और खुद के अमेरिकी विमानों के लिए इंजन दे रही है, तो सिर्फ भारत का ऑर्डर ही पीछे क्यों? विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका नहीं चाहता कि तेजस ग्लोबल मार्केट में उसके F-16 का प्रतिस्पर्धी बने। इंजन रोककर अमेरिका HAL की उत्पादन क्षमता पर चोट कर रहा है ताकि अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों का भरोसा कम हो और भारत अपनी वायुसेना की कमी पूरी करने के लिए अमेरिकी जेट्स खरीदने को मजबूर हो जाए।
इतिहास और ‘किल स्विच’ का खतरा
1998 में पोखरण परीक्षण के बाद भी अमेरिका ने तेजस के लिए तकनीकी मदद रोक दी थी। आज भी, अमेरिका से खरीदे गए हर हथियार (अपाचे, चिनूक, P-8I) के साथ ‘एंड-यूजर मॉनिटरिंग’ की शर्तें जुड़ी होती हैं। अमेरिका इनके सोर्स कोड साझा नहीं करता। बिना उनकी इजाजत के हम इनमें अपनी स्वदेशी मिसाइलें भी नहीं जोड़ सकते। यह एक ऐसी डिजिटल बेड़ी है जो युद्ध के समय भारत के हाथ बांध सकती है।
भारत का आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता कदम
आज भारत का रक्षा निर्यात 39,000 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है। फिलीपींस ब्रह्मोस ले रहा है और आर्मेनिया पिनाका रॉकेट। भारत समझ चुका है कि ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ किराए के हथियारों से नहीं मिल सकती। इसीलिए भारत अब कावेरी इंजन पर फिर से काम कर रहा है और फ्रांस की ‘साफरान’ कंपनी के साथ मिलकर AMCA के लिए इंजन विकसित करने की तैयारी में है।
विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम करना ही भारत के राष्ट्रीय अस्तित्व की गारंटी है। भारत अब केवल खरीदार नहीं, बल्कि एक बड़ा निर्यातक बनने की राह पर है, जो वैश्विक पावर बैलेंस को बदल कर रख देगा।

