एशिया के भू-राजनीतिक शतरंज की बिसात पर कुछ चालें ऐसी होती हैं जो सदियों तक इतिहास का रुख तय करती हैं। 19वीं सदी में ब्रिटिश साम्राज्य और रूसी जारशाही के बीच मध्य एशिया पर कब्जे के लिए जो द ग्रेट गेम खेला गया था, 21वीं सदी में उसी खेल का एक नया और कहीं अधिक जटिल संस्करण खेला जा रहा है। इस नए ग्रेट गेम में एक ओर चीन का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी BRI है, तो दूसरी ओर पाकिस्तान की भौगोलिक नाकेबंदी, और इन सबके बीच एक उभरती हुई महाशक्ति के रूप में भारत का आक्रामक सामरिक संघर्ष। दशकों तक भारत एक भौगोलिक अभिशाप का शिकार रहा। अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरेशिया के ऊर्जा समृद्ध खजाने तक पहुँचने के लिए भारत के पास सीधा जमीनी रास्ता नहीं था, क्योंकि बीच में पाकिस्तान एक जहरीली दीवार बनकर खड़ा था। लेकिन अब, अरब सागर की लहरों और मकरान तट के सुनसान रेगिस्तानों के बीच एक ऐसा चमत्कार हुआ है जिसने दुनिया की महाशक्तियों का नक्शा और गुरूर दोनों बदल कर रख दिया है। ईरान ने आधिकारिक तौर पर ओमान की खाड़ी में स्थित रणनीतिक चाबहार बंदरगाह को सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत की राजधानी जाहिदान से जोड़ने वाली 730 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन का निर्माण पूरा कर लिया है।
पाकिस्तान और चीन का गेम ओवर
आगामी 3 से 4 महीनों के भीतर इस ट्रैक पर मालगाड़ियों और यात्री ट्रेनों की नियमित आवाजाही शुरू होने की घोषणा कर दी गई है। यह केवल लोहे की पटरियों का एक जाल नहीं है। यह भारत के लिए वह ऐतिहासिक लॉटरी है जो पाकिस्तान को स्थायी रूप से बाईपास कर देगी। यह वह संजीवनी है जो भारत के इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर यानी INSTC को सीधे मॉस्को तक पंख लगाएगी। एक ऐसे समय में जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव अपने चरम पर है, इजरायल और हमास-हिजबुल्लाह के बीच युद्ध की आग पूरे मध्य पूर्व को अपनी चपेट में ले चुकी है, तब ईरान के इस मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर का पूरा होना दुनिया की खुफिया एजेंसियों के लिए एक बहुत बड़ा अचरज है। चाबहार-जाहिदान रेलवे लाइन कोई सामान्य निर्माण परियोजना नहीं है। यह भौगोलिक और राजनीतिक दोनों ही दृष्टिकोण से दुनिया की सबसे खतरनाक और चुनौतीपूर्ण इंजीनियरिंग परियोजनाओं में से एक रही है। ईरान का दक्षिण-पूर्वी सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत एक बेहद कठोर, शुष्क और बंजर इलाका है, जहां गर्मियों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस को पार कर जाता है और रेतीले तूफान किसी भी निर्माण कार्य को हफ्तों तक रोक सकते हैं।
इस 730 किलोमीटर लंबे रेल कॉरिडोर को मूर्त रूप देने के लिए ईरानी इंजीनियरों ने धरती का सीना चीरकर 39 विशाल सुरंगें खोदी हैं। इसके अलावा ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों, खड्डों और सूखी नदियों को पार करने के लिए 201 से अधिक बड़े पुलों का निर्माण किया गया है। पूरे रूट पर 33 अत्याधुनिक रेलवे स्टेशन बनाए गए हैं, जो भविष्य में माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स के बड़े ग्लोबल हब के रूप में काम करेंगे। लेकिन इसके पीछे एक डार्क सीक्रेट भी छिपा है। इस रेलवे लाइन के निर्माण की जिम्मेदारी जिस संस्था के पास थी, वह कोई सामान्य इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी नहीं थी। पर्दे के पीछे इस पूरे प्रोजेक्ट को ईरान के शक्तिशाली इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC से जुड़ी निर्माण शाखा खातम अल-अंबिया कंस्ट्रक्शन हेडक्वार्टर्स द्वारा अंजाम दिया गया है। चूंकि IRGC पर USA के बेहद सख्त प्रतिबंध हैं, इसलिए भारत ने इस रेलवे लाइन के निर्माण में सीधे तौर पर निवेश करने से खुद को रणनीतिक रूप से पीछे खींच लिया था, ताकि भारतीय कंपनियों जैसे IRCON पर USA ट्रेजरी विभाग के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल यानी OFAC की गाज न गिरे। यह भारत की शुद्ध चाणक्य नीति थी, क्योंकि रेलवे लाइन ईरान बनाएगा, लेकिन उसका सबसे बड़ा रणनीतिक और व्यापारिक इस्तेमाल नई दिल्ली के इशारे पर होगा।
चाबहार से लेकर तेहरान तक का विजन
चाबहार का सपना रातों-रात नहीं बुना गया। यह भारतीय विदेश नीति के उस विजन का बेहतरीन उदाहरण है जो दशकों से आकार ले रहा था और सरकारें बदलने के बावजूद अडिग रहा। इसकी शुरुआत 2003 में हुई जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ईरान के साथ नई दिल्ली घोषणा पर हस्ताक्षर किए थे। उद्देश्य साफ था, पाकिस्तान पर निर्भरता को जड़ से उखाड़ फेंकना। इसके बाद 2009 में भारत के बॉर्डर रोड्स आर्गेनाइजेशन यानी BRO ने अफगानिस्तान के भीतर 218 किलोमीटर लंबे जरंज-डेलाराम हाईवे, जिसे Route 606 कहा जाता है, का निर्माण पूरा किया। लगभग 134 मिलियन डॉलर की लागत से बने इस हाईवे को बनाते समय 6 भारतीयों ने तालिबान के आतंकी हमलों में अपनी जान गंवाई थी। यह हाईवे चाबहार की सफलता के लिए एक मास्टर-की था। लेकिन गेम चेंजर मोमेंट आया 23 May 2016 को, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान की राजधानी तेहरान का दौरा किया और ऐतिहासिक त्रिपक्षीय ट्रांजिट और व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसी दिन भारत ने चाबहार टर्मिनल को विकसित करने का मजबूत संकल्प लिया था।
दिसंबर 2018 में भारत की कंपनी इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड यानी IPGL ने आधिकारिक रूप से शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल का संचालन अपने हाथ में ले लिया। यह भारत के इतिहास में पहली बार था जब नई दिल्ली अपने देश की सीमा के बाहर किसी दूसरे देश के बंदरगाह का सीधा संचालन कर रही थी। इसके बाद बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच, 13 May 2024 को भारत के मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने तेहरान का दौरा किया और IPGL तथा ईरान के पोर्ट्स एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन के बीच 10 साल का लॉन्ग-टर्म बायलैटरल कॉन्ट्रैक्ट साइन किया गया। भारत ने 120 मिलियन डॉलर का सीधा निवेश और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 250 मिलियन डॉलर की अतिरिक्त क्रेडिट विंडो देने की प्रतिबद्धता जताई। और आज, 730 किलोमीटर लंबे चाबहार-जाहिदान रेल लिंक के पूरा होने की घोषणा ने पूरी दुनिया की भू-राजनीति में भूचाल ला दिया है।
कैसे टूटा पाकिस्तान का घमंड?
अब गहराई से समझिए कि पाकिस्तान का बाईपास कैसे हुआ। अफगानिस्तान एक लैंडलॉक्ड देश है। उसे दुनिया भर में अपना सामान भेजने या आयात करने के लिए पाकिस्तान के कराची बंदरगाह पर निर्भर रहना पड़ता था। पाकिस्तान ने हमेशा इस मजबूरी का फायदा उठाया और अफगान-पाकिस्तान ट्रांजिट ट्रेड एग्रीमेंट यानी APTTA के तहत अफगान ट्रकों को भारत की वाघा सीमा तक आने की अनुमति तो दी, लेकिन भारतीय माल को उन्हीं ट्रकों में वापस अफगानिस्तान जाने की अनुमति कभी नहीं दी। पाकिस्तान भारत को मध्य एशिया से काटकर रखना चाहता था ताकि भारत का आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव न बढ़ सके। लेकिन, चाबहार-जाहिदान रेल लिंक के पूरा होते ही इस्लामाबाद की इस ब्लैकमेलिंग कूटनीति का हमेशा के लिए अंत हो गया है। अब माल भारत के पश्चिमी तट जैसे मुंबई या कांडला से सीधे समुद्री रास्ते से चाबहार पहुंचेगा। वहां से सीधे इस नई 730 किलोमीटर रेलवे लाइन की मालगाड़ियों पर लोड होकर जाहिदान जाएगा, और फिर जरंज होते हुए Route 606 से काबुल पहुंच जाएगा। यही कारण है कि अफगानिस्तान का कट्टरपंथी तालिबान शासन भी आज चाबहार पोर्ट के लिए पाकिस्तान से किनारा करके भारत के साथ खड़ा होने को बेताब है।
जब हम चाबहार की बात करते हैं, तो सिर्फ 140 किलोमीटर पूर्व में पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित ग्वादर बंदरगाह की बात किए बिना यह कहानी अधूरी है। चीन ने चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर यानी CPEC के तहत ग्वादर को एक डीप-वाटर पोर्ट के रूप में विकसित किया है। यह चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स रणनीति का अहम हिस्सा है ताकि मलक्का जलडमरूमध्य को बाईपास किया जा सके। लेकिन भारत के लिए चाबहार, ग्वादर का रणनीतिक एंटी-डोट है। चाबहार में भारत की मौजूदगी सिर्फ व्यापारिक नहीं है। यह अरब सागर और ओमान की खाड़ी के मुहाने पर भारत को एक शक्तिशाली लिस्निंग पोस्ट प्रदान करता है। यहां से भारतीय खुफिया एजेंसी यानी RAW और भारतीय नौसेना आसानी से ग्वादर में चीनी पनडुब्बियों यानी PLAN और पाकिस्तानी नौसेना की गतिविधियों पर इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस रख सकती हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया का 20 प्रतिशत से ज्यादा तेल गुजरता है, वहां भी भारत की सामरिक पकड़ लोहे जैसी मजबूत हो गई है। बलूच लिबरेशन आर्मी यानी BLA के लगातार हमलों के कारण ग्वादर आज भी एक घोस्ट पोर्ट जैसा दिखता है, जबकि चाबहार एक जीवंत कमर्शियल पावरहाउस बन चुका है। भारत ने मलक्का डिलेमा की तर्ज पर चीन और पाकिस्तान के लिए मकरान डिलेमा पैदा कर दिया है।
रूस और यूरोप तक नया खुफिया बाईपास रूट
जाहिदान तक रेल लाइन का पहुंचना सिर्फ अफगानिस्तान तक सीमित नहीं है। इसका असली गेम-चेंजिंग पहलू रूस और यूरोप तक भारत की नई छलांग है। भारत, रूस और ईरान ने इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर यानी INSTC की आधारशिला रखी थी। यह 7200 किलोमीटर लंबा मल्टी-मोडल नेटवर्क है। वर्तमान में, भारत को रूस के सेंट पीटर्सबर्ग तक माल भेजने के लिए स्वेज नहर से होकर 45 से 60 दिन का समय लगता है। हूती विद्रोहियों के लाल सागर में वाणिज्यिक जहाजों पर हालिया मिसाइल हमलों के कारण यह रूट और भी खतरनाक और महंगा हो गया है, जिससे शिपिंग इंश्योरेंस प्रीमियम आसमान छू रहे हैं। लेकिन, चाबहार-जाहिदान रेल लिंक के पूरी तरह से INSTC के साथ इंटीग्रेट होने के बाद, माल मुंबई से चाबहार जाएगा, वहां से ट्रेन के जरिए ईरान के उत्तरी बंदरगाह अमीरबाद पहुंचेगा, फिर कैस्पियन सागर पार करके रूस के अस्त्रखान और वहां से सीधे मॉस्को। इस खुफिया बाईपास रूट से रूस तक माल पहुंचाने में समय की 40 प्रतिशत भारी बचत होगी, यानी 45 दिन की जगह सिर्फ 25 दिन लगेंगे, और फ्रेट कॉस्ट में 30 प्रतिशत तक की कमी आएगी।
सेंट्रल एशिया के देशों की बात करें तो कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे देश यूरेनियम, तेल और प्राकृतिक गैस के असीम भंडार पर बैठे हैं। लेकिन लैंडलॉक्ड होने के कारण अब तक ये देश अपना कच्चा माल बेचने और तैयार माल खरीदने के लिए पूरी तरह से चीन के रहमोकरम पर निर्भर थे। चीन का घटिया और महंगा सामान इन बाजारों पर कब्जा जमाए हुए था। लेकिन चाबहार-जाहिदान लिंक के शुरू होते ही भारत का उच्च गुणवत्ता वाला मैन्युफैक्चरिंग एक्सपोर्ट सीधे इन बाजारों में डंप होगा। चीन के व्यापारियों में इस बात को लेकर भारी दहशत है कि भारतीय फार्मास्यूटिकल्स, कृषि उपकरण, आईटी उत्पाद और टेक्सटाइल बहुत कम फ्रेट कॉस्ट पर सीधे ताशकंद और अस्ताना तक पहुंच जाएंगे। यह चीन के व्यापारिक एकाधिकार पर एक ऐसा सर्जिकल स्ट्राइक है जिसकी भनक बीजिंग को तब लगी जब पटरियां बिछ चुकी थीं। ताजिकिस्तान में मौजूद भारत के मिलिट्री एयरबेस फरकौर की रणनीतिक ताकत भी अब चरम पर पहुंच जाएगी, जिससे मध्य एशिया में भारत का दबदबा चीन को सीधी टक्कर देगा।
कूटनीति की एक दुर्लभ और ऐतिहासिक जीत
इस महाप्रोजेक्ट की राह में USA के वाशिंगटन के प्रतिबंधों की तलवार हमेशा लटकती रही है। जब USA ने ईरान पर काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट यानी CAATSA के तहत कठोर प्रतिबंध लगाए थे, तो पश्चिमी देश डर कर पीछे हट गए थे। लेकिन भारत ने अपनी स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी का शानदार प्रदर्शन किया। भारतीय राजनयिकों ने पेंटागन में आक्रामक लॉबिंग की और साफ समझाया कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान के आतंकवाद को खत्म करने का इकलौता रास्ता चाबहार ही है। वर्तमान में USA में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन सत्ता में है और उनकी अधिकतम दबाव की नीति के बावजूद, भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर की एग्रेसिव कूटनीति ने यह सुनिश्चित किया कि चाबहार परियोजना पर कोई आंच न आए। भारत और अमेरिका के बीच बैक-चैनल वार्ताएं लगातार चल रही हैं और एक कानूनी लूपहोल निकाला गया है, जहां ईरान की लोकल पोर्ट अथॉरिटी रेल ऑपरेशंस हैंडल करेगी और भारतीय अधिकारी कमर्शियल ऑपरेशंस देखेंगे। यह कूटनीति की एक दुर्लभ और ऐतिहासिक जीत है।
आज जब इजरायल और ईरान के बीच महायुद्ध का तनाव चरम पर है, तो हर कोई हैरान है कि मोसाद और CIA जैसी खूंखार खुफिया एजेंसियां भारत के इस प्रोजेक्ट पर रहस्यमयी चुप्पी क्यों साधे हुए हैं। इसका सीधा सा रणनीतिक डिकोडिंग यह है कि बैक-चैनल पर यह सुपर-सीक्रेट समझ बनी हुई है कि इस प्रोजेक्ट का सलामत रहना मध्य एशिया में चीन के वर्चस्व को रोकने के लिए बेहद जरूरी है। कोई भी पश्चिमी ताकत नहीं चाहती कि सेंट्रल एशिया पूरी तरह से चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का गुलाम बन जाए। हालांकि, कुछ जमीनी चुनौतियां अभी भी बाकी हैं। ईरान SWIFT इंटरनेशनल बैंकिंग प्रणाली से बाहर है, इसलिए भारत ने माल ढुलाई और व्यापार के भुगतान के लिए रुपये-रियाल मैकेनिज्म को UCO Bank के जरिए इतना मजबूत किया है कि डॉलर की कोई जरूरत ही न पड़े। कस्टम क्लीयरेंस के लिए TIR कन्वेंशन और डिजिटल सीलिंग पर युद्ध स्तर पर काम चल रहा है ताकि सीमा पर कागजी कार्रवाई में वक्त बर्बाद न हो।
दूसरी ओर, रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चाबहार केवल एक कमर्शियल पोर्ट नहीं है, बल्कि यह इंडियन नेवी के लिए एक फारवर्ड ऑपरेटिंग फैसिलिटी की तरह काम कर सकता है। जब भारतीय नौसेना के जहाज गल्फ ऑफ ओमान में गश्त करते हैं, तो चाबहार उनके लिए एक रणनीतिक हॉल्ट बन सकता है। चीन की PLAN लगातार हिंद महासागर में अपना दबदबा बढ़ाने की कोशिश कर रही है, और जिबूती से लेकर ग्वादर तक अपने नेवल बेस तैयार कर रही है। ऐसे में चाबहार में भारत का यह विशाल लॉजिस्टिक्स हब चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स को उसी के घर में घेरने की एक आक्रामक तैयारी है। अगर भविष्य में कभी भी चीन या पाकिस्तान की तरफ से कोई समुद्री नाकेबंदी की कोशिश की जाती है, तो भारत चाबहार के रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम्स का इस्तेमाल करके उनके पूरे कम्युनिकेशन ग्रिड को जाम करने की क्षमता विकसित कर सकता है। यह प्रोजेक्ट इस बात का भी प्रमाण है कि भारत की मौजूदा सरकार ने विदेश नीति को शॉर्ट टर्म फायदों से निकालकर लॉन्ग टर्म नेशनल इंटरेस्ट के मजबूत ढांचे में ढाल दिया है।
निष्कर्ष के तौर पर देखें, तो रूस के कज़ान में हुए BRICS शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की मुलाकात ने जो कूटनीतिक आधार तैयार किया था, वह अब पूरी तरह फलीभूत हो चुका है। ईरान के लिए यह दुनिया को संदेश है कि वह झुका नहीं है, और भारत के लिए यह रेल लिंक नई दिल्ली का वह अचूक भू-राजनीतिक अस्त्र है जिसने एक ही झटके में पाकिस्तान के उस घमंड को चूर-चूर कर दिया है कि उसके बिना भारत पश्चिम की ओर देख भी नहीं सकता। यह 730 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन वास्तव में 730 किलोमीटर लंबी एक सामरिक विजय है। यह भारत की लुक वेस्ट और कनेक्ट सेंट्रल एशिया नीतियों के बीच की वह मिसिंग लिंक थी, जिसकी तलाश भारत पिछले 20 वर्षों से कर रहा था। अगले कुछ ही महीनों में जब भारतीय माल से लदी पहली ट्रेन चाबहार के शाहिद बेहेश्ती पोर्ट से रवाना होकर मकरान के मौत के रेगिस्तान का सीना चीरते हुए जाहिदान की तरफ बढ़ेगी, तो उसका बजता हुआ हॉर्न न केवल अफगानिस्तान और यूरोप के बाजारों में एक नई उम्मीद जगाएगा, बल्कि उसकी गूंज इस्लामाबाद के GHQ और बीजिंग के झुंगनान्हाई तक एक भयानक चेतावनी के रूप में सुनाई देगी। अरब सागर के इस किनारे पर बाजी अब भारत पलट चुका है, और भारतीय कूटनीति की यह जबरदस्त लॉटरी आने वाले दशकों तक ग्लोबल इकॉनमी और यूरेशिया की धुरी बनने जा रही है। भारत ने सिर्फ एक रेल लाइन नहीं बिछाई है, बल्कि दुनिया की महाशक्तियों के गुरूर को तोड़ते हुए एक नए और शक्तिशाली युग का सूर्योदय किया है।





