जब दुनिया भर के डिफेंस एनालिस्ट्स और थिंक टैंक्स की नजरें केवल इस बात पर टिकी थीं कि ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल, आकाश एयर डिफेंस और पिनाका रॉकेट सिस्टम अगला कौन सा देश खरीदेगा, ठीक उसी वक्त भारत के साउथ ब्लॉक ने दुनिया के दो बिल्कुल अलग छोरों पर एक ऐसा साइलेंट धमाका कर डाला है, जिसने दशकों पुराने ग्लोबल वेपन सिंडिकेट की चूलें हिला कर रख दी हैं।
सोचिए, लैटिन अमेरिका के खतरनाक नारको-आतंकवाद को खत्म करने के लिए कोलंबिया आखिर भारत की किस खास एंटी-ड्रोन शील्ड पर टूट पड़ा है? तीन अक्टूबर दो हजार छब्बीस को भारतीय फायरिंग रेंज में कंबोडिया के पच्चीस टॉप तोपची और सैन्य अधिकारी स्वदेशी ‘धनुष’ तोप से असल में किसका टारगेट लॉक करना सीख रहे थे? और सबसे बड़ा सवाल, जिस कंबोडिया के रीम नेवल बेस पर आज भी चीनी नौसेना बैठी है, उसी देश के सैन्य अफसर बीजिंग की सरकारी हथियार कंपनी नॉरिंको की तोपों को दरकिनार करके भारत के रेगिस्तानों में बारूद क्यों उड़ा रहे हैं? क्या इंडोनेशिया और मलेशिया की पाम ऑयल वाली मनमानी की हेकड़ी निकालने के लिए भारत ने लैटिन अमेरिका में सुरक्षा और खाद्य तेल का एक खतरनाक जियो-इकोनॉमिक चक्रव्यूह रच दिया है? आज की इस रिपोर्ट में हम इसी कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक का पूरा डिकोड करेंगे।
शुरुआत करते हैं दक्षिण अमेरिकी महाद्वीप के प्रमुख देश कोलंबिया से। कोलंबिया दशकों से नारको-आतंकवाद, हथियारबंद विद्रोही गुटों और कुख्यात ड्रग सिंडिकेट्स के लंबे हिंसक संघर्ष से जूझ रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में इस पूरे कॉन्फ्लिक्ट का डाइनैमिक्स पूरी तरह बदल चुका है। नेशनल लिबरेशन आर्मी, पूर्व फार्क के बागी गुट और कुख्यात क्लान डेल गोल्फो जैसे ड्रग सिंडिकेट्स ने अब पारंपरिक राइफलों और बारूदी सुरंगों को पीछे छोड़ दिया है। इन खतरनाक गिरोहों ने चीनी और पश्चिमी मार्केट्स से आसानी से मिलने वाले कमर्शियल ऑफ-द-शेल्फ ड्रोन्स को हवा में उड़ने वाले घातक हथियारों में तब्दील कर दिया है।
अब होता यह है कि हल्के क्वाडकॉप्टर्स और एफपीवी ड्रोन्स पर प्लास्टिक विस्फोटक, मोर्टार के गोले और इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस यानी आईईडी बांधकर घने वर्षावनों में गश्त कर रहे कोलंबियाई सुरक्षाबलों और सरकारी चौकियों पर बेहद सटीक हमले किए जा रहे हैं। घने जंगलों, गहरी घाटियों और दूरदराज के बीहड़ इलाकों में इन छोटे और बेहद नीचे उड़ने वाले ड्रोन्स को पकड़ने में अमेरिका और यूरोप के पारंपरिक एयर डिफेंस रडार पूरी तरह से नाकाम साबित हो रहे थे। जब बोगोटा की सरकार को अपने सुरक्षाबलों के अस्तित्व पर गहरा संकट नजर आने लगा, तब उनकी नजर भारत की स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक और रडार तकनीक पर पड़ी।
सत्ताईस मार्च दो हजार छब्बीस को कोलंबिया के रक्षा मंत्रालय का एक अत्यंत गोपनीय और हाई-लेवल डेलिगेशन भारत पहुंचा। इस ताकतवर डेलिगेशन का नेतृत्व कोलंबिया की रक्षा उप-मंत्री एंजेलिका वर्बेल लोपेज और एंजेलिका मारिन अगुडेलो खुद कर रही थीं। यह डेलिगेशन किसी आम औपचारिक मीटिंग के लिए नहीं, बल्कि सीधे उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद स्थित भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड यानी बीईएल के रिसर्च एंड डेवलपमेंट डिवीजन पहुंचा।
गाजियाबाद की इस अति-सुरक्षित लैबोरेटरी में भारतीय वैज्ञानिकों ने कोलंबियाई रक्षा नेतृत्व के सामने अपनी संपूर्ण काउंटर-ड्रोन और अनमैन्ड डिफेंस सिस्टम का लाइव टेक्नोलॉजिकल डेमोंस्ट्रेशन किया। इसमें केवल पुराने जमाने के रेडियो जैमर्स नहीं थे, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से चलने वाले एआई-पावर्ड ड्रोन स्वार्म्स, ड्रोन्स की साइबर सुरक्षा को पलक झपकते भेदने वाली स्पूफिंग तकनीक, अत्याधुनिक एंटीना मॉड्यूल्स, थ्री-डी एईएसए रडार और इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम शामिल था।
भारत की इस एंटी-ड्रोन शील्ड को आप एक मल्टी-लेयर सिक्योरिटी अम्ब्रेला समझ सकते हैं, जो सॉफ्ट-किल और हार्ड-किल दोनों रणनीतियों पर अचूक काम करती है। इसका थ्री-डी रडार बेहद कम रडार क्रॉस-सेक्शन वाले माइक्रो और मिनी ड्रोन्स को भी चार से पांच किलोमीटर दूर से ही डिटेक्ट कर लेता है। इसके साथ जुड़ा इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड सेंसर दिन के उजाले, घनी रात या धुंध में भी थर्मल सिग्नेचर के आधार पर पहचान लेता है कि आसमान में उड़ने वाला कोई पक्षी है या विस्फोटक से लैस कोई किलर ड्रोन। खतरे की पुष्टि होते ही इसके पावरफुल डायरेक्शनल जैमर्स एक्टिव हो जाते हैं। यह सिस्टम ड्रोन के जीपीएस, ग्लोनास या चीनी बाइडू नेविगेशन सिस्टम को स्पूफ करके बुरी तरह भ्रमित कर देता है। नतीजा यह होता है कि कार्टेल का ड्रोन या तो हवा में ही फ्रीज होकर जमीन पर गिर जाता है या अपने रिटर्न-टू-होम मोड में सीधे ऑपरेटर के गुप्त ठिकाने की तरफ मुड़ जाता है। इससे घने जंगल में छिपे ड्रग कार्टेल का पूरा बेस कैंप बेनकाब हो जाता है। फ्रांस और जर्मनी की महंगी कंपनियों के मुकाबले भारत का यह सिस्टम कोलंबियाई जंगलों की वास्तविक ग्राउंड रियलिटी के लिए एकदम परफेक्ट और किफायती साबित हुआ है।
अब बात करते हैं कूटनीति के उस दूसरे मास्टरस्ट्रोक की जिसने बीजिंग के रणनीतिक गलियारों में खतरे का लाल सायरन बजा दिया है। लैटिन अमेरिका की इस बड़ी हलचल के बीच साउथ-ईस्ट एशिया के दिल में एक बहुत बड़ा गेम हो गया। तीन अक्टूबर दो हजार छब्बीस को रॉयल कंबोडियन आर्मी के पच्चीस उच्च सैन्य अधिकारियों और आर्टिलरी एक्सपर्ट्स ने भारत की स्वदेशी 155mm 45-कैलिबर धनुष आर्टिलरी गन पर अपना चार हफ्तों का स्पेशल ऑपरेशनल ट्रेनिंग कोर्स सफलतापूर्वक पूरा कर लिया। मिलिट्री साइंस का यह एक स्थापित नियम है कि कोई भी संप्रभु देश अपने मुख्य तोपखाने के अफसरों और टेक्निकल इंजीनियर्स को किसी विदेशी तोप पर महीनों की कठिन लाइव-फायरिंग ट्रेनिंग के लिए यूं ही टाइम पास करने नहीं भेजता। लगातार दो महीनों के भीतर दो कंबोडियन सैन्य दलों का भारत आकर तोप के संचालन और डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम पर महारत हासिल करना इस बात की सौ प्रतिशत गारंटी है कि कंबोडिया और भारत के बीच धनुष होवित्जर की खरीद का बड़ा डिफेंस एग्रीमेंट अब फाइनल स्टेज में है।
इस डेवलपमेंट की ग्रैविटी को समझने के लिए कंबोडिया की जियो-पॉलिटिकल पृष्ठभूमि को जानना होगा। आसियान देशों के भीतर कंबोडिया पिछले तीन दशकों से चीन का सबसे अटूट और भरोसेमंद रणनीतिक साझीदार माना जाता रहा है। कंबोडियन आर्मी ऐतिहासिक रूप से चीनी हथियारों और चीनी सरकारी कंपनी नॉरिंको की तोपों पर पूरी तरह डिपेंडेंट रही है। यहां तक कि कंबोडिया के रीम नेवल बेस का आधुनिकीकरण भी चीनी नौसेना ने ही किया है। लेकिन उसी कंबोडिया ने अपनी नेशनल सिक्योरिटी के सबसे क्रिटिकल विंग के लिए चीनी कंपनी नॉरिंको की तोपों को रिजेक्ट करके भारत की स्वदेशी ‘धनुष’ तोप पर मुहर लगा दी है। साउथ चाइना सी में अपनी नेवी की दादागिरी दिखाने वाले चीन के लिए यह एक ऐसा रणनीतिक और साइकोलॉजिकल शॉक है, जिसकी गूंज बहुत दूर तक जाएगी।
कंबोडियन जनरलों ने चीनी दबाव को ठुकराकर धनुष को इसलिए चुना क्योंकि इसके टेक्निकल स्पेसिफिकेशन्स दुनिया की बेस्ट तोपों को टक्कर देते हैं। इसे डीआरडीओ और एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड ने पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से बनाया है। यह अस्सी के दशक की मशहूर स्वीडिश बोफोर्स तोप का एकदम फ्यूचरिस्टिक और डिजिटल अवतार है। जहां पुरानी बोफोर्स तोप 39-कैलिबर की थी और उसकी रेंज चौबीस किलोमीटर थी, वहीं भारतीय धनुष 45-कैलिबर की लॉन्ग बैरल के साथ आती है। एक्सटेंडेड रेंज बेस-ब्लीड गोला दागने पर यह तोप 38.4 किलोमीटर की भारी दूरी तक दुश्मन के बेस कैंप्स को खाक कर सकती है। दुनिया भर में मशहूर अमेरिकी एम-777 होवित्जर भी इसके आगे पानी भरती है, क्योंकि वह भी अधिकतम तीस किलोमीटर तक ही मार कर पाती है।
अब आते हैं इस पूरी कहानी के सबसे इंट्रेस्टिंग जियो-इकोनॉमिक एंगल पर। भारत ने कोलंबिया के साथ डिफेंस डील और अपनी खाद्य सुरक्षा के बीच जो समीकरण सेट किया है, वो मॉडर्न डिप्लोमेसी का एक शानदार उदाहरण है। भारत अपनी पाम ऑयल की पच्चासी प्रतिशत जरूरत के लिए हमेशा से इंडोनेशिया और मलेशिया पर निर्भर रहा है। लेकिन इन दोनों देशों ने हाल ही में अपने बायोडीजल प्रोग्राम के चलते पाम ऑयल के एक्सपोर्ट में कटौती शुरू कर दी, जिससे भारत की सवा सौ करोड़ से ज्यादा की आबादी के लिए कुकिंग ऑयल का संकट और महंगाई का खतरा पैदा हो गया।
इस मोनोपॉली को तोड़ने के लिए साउथ ब्लॉक ने अपनी सप्लाई चेन को सीधे लैटिन अमेरिका की ओर मोड़ दिया। कोलंबिया आज दुनिया का चौथा सबसे बड़ा पाम ऑयल प्रोड्यूसर है। भारत ने हाल ही में कोलंबियन फेडरेशन के साथ एक बड़ा मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग साइन किया है। रणनीति एकदम साफ है। भारत कोलंबिया का सबसे बड़ा एग्रीकल्चरल एक्सपोर्ट यानी पाम ऑयल भारी मात्रा में खरीदेगा, जिससे कोलंबिया की अर्थव्यवस्था को बड़ा बूस्ट मिलेगा। और ठीक इसके बदले में, कोलंबिया अपनी नेशनल सिक्योरिटी को अभेद्य बनाने के लिए भारत के बीईएल से एंटी-ड्रोन शील्ड और रडार्स खरीदेगा।
इस एक सिंगल मूव ने मलेशिया और इंडोनेशिया की पाम ऑयल कार्टेल लॉबी के पसीने छुड़ा दिए हैं। वहीं दूसरी तरफ, कंबोडिया जैसे चीनी प्रभाव वाले देश के साथ मिलिट्री टाइज मजबूत करके भारत ने साउथ-ईस्ट एशिया के अंदर अपनी इंडिपेंडेंट सामरिक पैठ बना ली है। दशकों तक चीनी थिंक टैंक्स ने भारत को घेरने के लिए ग्वादर से लेकर हंबनटोटा तक ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ की रणनीति का ढोल पीटा था। लेकिन आज भारत की कूटनीति डिफेंस हार्डवेयर के दम पर एक ‘नेकलेस ऑफ डायमंड्स’ तैयार कर रही है, जो बीजिंग के बनाए हर ट्रैप को उसी के बैकयार्ड में जाकर न्यूट्रलाइज कर रहा है।
लैटिन अमेरिका के जंगलों से लेकर साउथ चाइना सी के मुहाने तक, भारत अब सिर्फ एक बायर नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ का एक मजबूत नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर बन चुका है। भारत के इस शानदार कूटनीतिक और सामरिक चक्रव्यूह पर आपकी क्या राय है, कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताइएगा।





