सुबह के चार बजे जब पूरा देश गहरी नींद में सो रहा था, तब ज़मीन पर बने एक सीक्रेट टेस्ट-बेड से निकली नारंगी लपटों ने पूरे सन्नाटे को चीर कर रख दिया। बिना किसी को खबर लगे, रात के अंधेरे में नोएडा की एक प्राइवेट लैब ने ज़मीन से आसमान की तरफ कुछ ऐसा दागा, जिसने रक्षा गलियारों में भूचाल ला दिया है। सुबह जब दुनिया को इसकी भनक लगी, तब जाकर यह खुलासा हुआ कि भारत के ज्वाला एयर डिफेंस सिस्टम ने अपना काम कर दिया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ज्वाला महज़ चंद लाख रुपयों के प्लास्टिक ड्रोन्स को गिराने वाला एक सामान्य डिफेंस सिस्टम है? या फिर कामिकेजे ड्रोन के नाम की आड़ में भारतीय सेना के लिए एक बेहद क्लासिफाइड और किलर मिसाइल तैयार कर ली गई है? अगर इसका काम सिर्फ सस्ते क्वॉडकॉप्टर मारना है, तो इसे 65,000 फीट की उस स्ट्रैटोस्फेरिक ऊंचाई तक जाने की ताकत क्यों दी गई, जहां सिर्फ परमाणु बॉम्बर्स और महाशक्तियों के जासूसी विमान ही उड़ पाते हैं? क्या लद्दाख और एलएसी पर भारत को घेरने के लिए बीजिंग बारूद नहीं, बल्कि करोड़ों की मिसाइल बनाम चंद रुपयों के ड्रोन का ऐसा आर्थिक चक्रव्यूह रच चुका है जो भारत का खजाना खाली कर दे? और सबसे बड़ा सवाल, जिस डुअल-पल्स रॉकेट मोटर तकनीक को हासिल करने में दुनिया के बड़े-बड़े मुल्कों के पसीने छूट गए, वो सीक्रेट फॉर्मूला रातों-रात एक भारतीय प्राइवेट स्टार्टअप के टेस्ट-बेड तक कैसे पहुंच गया?
दोस्तो यह कोई साधारण हथियार परीक्षण बिल्कुल नहीं था। यह नोएडा स्थित प्राइवेट डिफेंस कंपनी आईजी डिफेंस द्वारा अपने ज्वाला शॉर्ट-रेंज एयर डिफेंस और सी-यूएएस प्रोग्राम के तहत दागी गई दो सॉलिड रॉकेट मोटर्स का एक बेहद सफल परीक्षण था। अब तक भारत में रॉकेट प्रोपल्शन, सॉलिड फ्यूल मोटर्स और मिसाइल तकनीक का दायरा केवल डीआरडीओ और बीडीएल जैसी सरकारी संस्थाओं तक ही सीमित माना जाता था। किसी प्राइवेट कंपनी का अपने दम पर डुअल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर फायर कर देना भारत के लिए एक बहुत बड़ा स्ट्रैटेजिक शिफ्ट है।
उत्तरी कमान के नॉर्थ टेक सिम्पोजियम 2026 के बंद कमरों में जब जनरलों के सामने ज्वाला को काल ड्रोन के साथ पेश किया गया, तो वहां मौजूद तमाम रणनीतिकारों के कान खड़े हो गए। यह हथियार पारंपरिक मिसाइल और वन-वे अटैक ड्रोन यानी कामिकेजे लॉइटरिंग म्यूनिशन का एक बेहद खतरनाक हाइब्रिड मॉडल है। इस सिस्टम ने सामने आते ही रावलपिंडी के जीएचक्यू और बीजिंग के वेस्टर्न थिएटर कमांड के वॉर-रूम्स में भयंकर हलचल पैदा कर दी है।
इस बेचैनी की सबसे बड़ी वजह इस सिस्टम का इंजन है। हालिया टेस्ट में जिस प्रोपल्शन तकनीक को परखा गया, वह एक एडवांस्ड डुअल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर है। पारंपरिक सॉलिड रॉकेट मोटर्स में जब ईंधन एक बार जलना शुरू होता है, तो पूरा खत्म होने तक लगातार जलता रहता है। मिसाइल शुरुआत में तो बहुत तेज़ भागती है, लेकिन अपने सफर के आखिरी हिस्से यानी टर्मिनल फेज़ में उसका इंजन बुझ जाता है। इंजन बंद होते ही मिसाइल सिर्फ अपने पुराने मोमेंटम पर ग्लाइड करती है। उस वक्त अगर दुश्मन का ड्रोन या क्रूज़ मिसाइल हवा में तेज़ी से दाएं-बाएं मुड़ जाए, तो मिसाइल उसे नहीं पकड़ पाती।
यहीं पर ज्वाला की डुअल-पल्स मोटर ने युद्ध के नियमों को पूरी तरह बदल दिया है। इसके रॉकेट चैंबर में सॉलिड फ्यूल को दो अलग-अलग हिस्सों में बांटकर रखा जाता है। पहला पल्स लॉन्च होते ही जलता है और मिसाइल को कुछ ही सेकंड्स में सुपरसोनिक स्पीड पर पहुंचा देता है। इसके बाद मिसाइल हवा में तेजी से आगे बढ़ती है। जैसे ही मिसाइल अपने टारगेट के बिल्कुल करीब पहुंचती है, ऑनबोर्ड कंप्यूटर कमांड देकर दूसरे पल्स को तुरंत चालू कर देता है। इंजन का दूसरा हिस्सा जलते ही मिसाइल को आखिरी मोड़ पर ज़बरदस्त थ्रस्ट मिलता है और यह मिसाइल 9G से 12G तक का खतरनाक टर्न ले सकती है। हवा में कलाबाज़ी खा रहे लो-आरसीएस ड्रोन्स और ज़मीन से सटकर उड़ने वाली क्रूज़ मिसाइलों के लिए इस अंतिम प्रहार से बच निकलना अब बिल्कुल नामुमकिन हो जाता है।
ज्वाला का ऑपरेशनल दायरा 10 किलोमीटर से लेकर 100 किलोमीटर की दूरी तक फैला हुआ है। यह ज़मीन से मात्र 50 मीटर ऊपर उड़ते टारगेट से लेकर 20,000 मीटर यानी 65,000 फीट की अत्यधिक ऊंचाई तक किसी भी शिकारी को मार गिराने का पूरा दम रखता है। यही वह दायरा है जो इसे वेरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम और भारी-भरकम मीडियम रेंज सरफेस टू एयर मिसाइलों के बीच के सबसे संवेदनशील एयरस्पेस का रक्षक बनाता है।
सटीक निशाने के लिए इसमें टू-स्टेप गाइडेंस आर्किटेक्चर दिया गया है। उड़ान के बीच में यह ऑनबोर्ड इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम और ग्राउंड रडार के रेडियो कमांड पर चलता है। इससे मिसाइल की अपनी बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक सेंसर्स की भारी बचत होती है। जैसे ही यह टारगेट के अंतिम ज़ोन में पहुंचती है, इसका ऑनबोर्ड एक्टिव रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर जाग उठता है। यह सीकर केयू और एक्स-बैंड वाले अत्याधुनिक एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे यानी एईएसए तकनीक पर काम करता है। एईएसए सीकर एक साथ कई फ्रीक्वेंसी बीम्स फेंकता है। इसका सीधा मतलब यह है कि दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक जैमर्स और चैफ इसके लॉक-ऑन को कभी तोड़ नहीं सकते।
जब यह टारगेट से टकराता है, तो बचने का कोई रास्ता नहीं छोड़ता। इसके अंदर 55 से 60 किलोग्राम वज़न का प्री-फ्रैग्मेंटेड हाई-एक्सप्लोसिव वॉरहेड लगा है। इसमें इम्पैक्ट फ्यूज़ के साथ प्रॉक्सिमिटी लेज़र और रेडियो फ्यूज़ दोनों दिए गए हैं। छोटे प्लास्टिक ड्रोन्स से मिसाइल का सीधे टकराना हमेशा संभव नहीं होता। इसलिए इसका प्रॉक्सिमिटी फ्यूज़ टारगेट के 3 से 5 मीटर करीब आते ही पूरे वॉरहेड को हवा में ब्लास्ट कर देता है। ब्लास्ट होते ही टंगस्टन धातु के हज़ारों माइक्रो-श्रापनेल चारों दिशाओं में गोलियों की रफ्तार से फैलते हैं और दुश्मन ड्रोन के पंखों, रोटर्स और कैमरों को पलक झपकते छलनी कर देते हैं।
ज़मीन पर इसे संभालने के लिए एक 360-डिग्री एईएसए रडार तैनात किया गया है। यह रडार 120 से 150 किलोमीटर दूर से ही किसी भी संदिग्ध हरकत को ट्रैक कर लेता है। ख़तरे की पहचान होने से लेकर ट्यूब से मिसाइल निकलने तक का रिएक्शन टाइम 15 सेकंड से भी कम है। पहाड़ी मोर्चों पर, जहां घाटियों के पीछे से अचानक ड्रोन नमूदार होते हैं, यह 15 सेकंड का रिएक्शन टाइम ही तय करता है कि सैनिकों का बंकर बचेगा या तबाह होगा।
लेकिन इस पूरी तकनीक के पीछे का सबसे बड़ा खेल सिर्फ साइंस नहीं है, बल्कि अर्थशास्त्र है। आधुनिक युद्धक्षेत्र में इसे कॉस्ट-एक्सचेंज रेशियो कहा जाता है। यूक्रेन के मैदानों और लाल सागर में इस आर्थिक जाल की हकीकत दुनिया देख चुकी है। ईरान के शाहेद-136 कामिकेजे ड्रोन की लागत महज़ 17 से 25 लाख रुपये बैठती है। चीन थोक के भाव में जो सुसाइड ड्रोन्स बना रहा है, उनकी कीमत मात्र 40 हज़ार से 80 हज़ार रुपये है। जब इन बेहद सस्ते ड्रोन्स को गिराने के लिए अमेरिका या पश्चिमी देशों को 16 करोड़ से 33 करोड़ रुपये की पैट्रियट मिसाइलें दागनी पड़ती हैं, तो हमलावर ड्रोन गंवाकर भी जंग जीत रहा होता है।
लद्दाख, सियाचिन और थार के मोर्चे पर ठीक यही आर्थिक जाल भारत के सामने बिछाया जा रहा है। अगर चीन या पाकिस्तान सीमा पर 100 सस्ते ड्रोन्स का झुंड छोड़ दें, तो क्या भारत हर 50 हज़ार रुपये के ड्रोन पर अपनी 20 करोड़ रुपये की मिसाइल या 50 करोड़ रुपये की एस-400 दागेगा? ऐसा करना देश के गोला-बारूद के रिज़र्व और खज़ाने दोनों को कुछ ही हफ़्तों में पूरी तरह खाली कर देगा।
यहीं पर ज्वाला जैसी स्वदेशी माइक्रो-मिसाइलें खेल के सारे नियम बदल देती हैं। इनका उत्पादन कमर्शियल और मिलिट्री-ग्रेड कंपोनेंट्स के स्मार्ट फ्यूजन से होता है। इनकी लागत भारी सरफेस-टू-एयर मिसाइलों के मुकाबले 90 प्रतिशत तक कम बैठती है। एक ही हेवी ट्रक पर 24 से 48 मिसाइल कैनिस्टर्स लोड किए जा सकते हैं। चंद सेकंड्स में पूरी साल्वो दागकर यह सिस्टम 40 से 50 ड्रोन्स के झुंड को हवा में ही भस्म कर सकता है। 5 से 10 लाख रुपये का एक इंटरसेप्टर 20 लाख रुपये के आत्मघाती हथियार को नेस्तनाबूद करता है और आर्थिक पलड़ा पूरी तरह भारत के पक्ष में झुक जाता है।
यह तैयारी इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि भारत के दोनों पड़ोसियों ने अपनी सैन्य डॉक्ट्रिन में ड्रोन्स को पहली कतार का हथियार बना लिया है। तिब्बत और शिनजियांग के ऊंचे पठारों पर चीनी सेना पीएलए ने ड्रोन्स का बहुत बड़ा जाल बिछाया है। चीन की रणनीति तीन स्तरों पर काम करती है। पहला स्तर है 60,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ने वाला सोअरिंग ड्रैगन। यह हाई-एल्टीट्यूड ड्रोन भारतीय सीमा के सैकड़ों किलोमीटर भीतर तक जासूसी करता है। इसके साथ मैक 3 की गति से उड़ने वाला सुपरसोनिक रॉकेट ड्रोन मौजूद है। दूसरे स्तर पर चीन के हथियारबंद हमलावर ड्रोन आते हैं जिनमें विंग लोंग और स्टील्थ तकनीक से लैस शार्प स्वॉर्ड शामिल हैं। और तीसरा सबसे घातक स्तर है चीन का ऑटोनॉमस स्वार्म नेटवर्क जो एक बार में 200 लॉइटरिंग म्यूनिशन्स हवा में छोड़ सकता है। ये ड्रोन्स हवा में आपस में बात करते हैं और झुंड बनाकर रडार साइट्स पर एक साथ झपटते हैं।
दूसरी तरफ पाकिस्तान भी बिल्कुल पीछे नहीं है। उसने तुर्किये से बायरक्तार ड्रोन हासिल किए हैं। चीन से विंग लोंग के बेड़े तैनात किए हैं। इसके अलावा पंजाब और जम्मू सेक्टर में आईएसआई लगातार हथियारों की स्मगलिंग के लिए कमर्शियल ड्रोन्स का इस्तेमाल कर रही है, जो पेड़ों के ठीक ऊपर उड़ते हैं जिन्हें भारी रडार आसानी से नहीं पकड़ पाते।
चीन और पाकिस्तान के इस संयुक्त ड्रोन घेरे को तोड़ने के लिए भारत ने एक बहुस्तरीय स्वदेशी एंटी-ड्रोन ग्रिड खड़ा किया है। इस ग्रिड का पहला बड़ा सिपाही है डीआरडीओ का वैरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम। इसमें अनकूल्ड इमेजिंग इन्फ्रारेड सीकर लगा है जो तुरंत फायर करने की छूट देता है और लद्दाख की 15,000 फीट ऊंची पतली हवा में भी मिसाइल को बिजली जैसी चपलता देता है। दूसरा प्रहार है सोलर इंडस्ट्रीज की सहयोगी कंपनी का भार्गवास्त्र। यह भारत का पहला हार्ड-किल माइक्रो-रॉकेट काउंटर-ड्रोन सिस्टम है, जो रडार से सिग्नल मिलते ही दर्जनों रॉकेट्स की बौछार कर देता है। तीसरा सिस्टम जेन टेक्नोलॉजीज का ज़ेन एंटी-ड्रोन सिस्टम है जो ड्रोन के नेविगेशन और रेडियो सिग्नल को पूरी तरह जाम कर देता है। चौथी ढाल भारत इलेक्ट्रॉनिक्स और डीआरडीओ का लेज़र वेपन सिस्टम है जो ड्रोन के प्लास्टिक ढांचे को 3 सेकंड में पिघलाकर आग का गोला बना देता है। पांचवां नवाचार भारतीय वायुसेना ने किया है जिसका नाम समर एयर डिफेंस सिस्टम है, जिसमें पुरानी रूसी मिसाइलों को ट्रक्स पर लगाकर नया जीवन दिया गया है। और छठी गुप्त परियोजना है प्रोजेक्ट दुर्गा टू, जो 100 किलोवाट क्लास का शक्तिशाली लेज़र वेपन है जिसका काम दुश्मन की बैलिस्टिक मिसाइलों और अंतरिक्ष में घूम रहे जासूसी सैटेलाइट्स को अंधा करना है।
जब सॉफ्ट-किल यानी इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग फेल हो जाती है, तब हार्ड-किल यानी मिसाइल मारकर टुकड़े कर देना ही अंतिम उपाय बचता है। आधुनिक स्वायत्त ड्रोन्स बाहर से कोई रेडियो सिग्नल नहीं लेते, वे अपने कैमरे और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से उड़ते हैं। इन्हें कोई जैमर नहीं रोक सकता। फाइबर-ऑप्टिक केबल से जुड़े ड्रोन्स को भी दुनिया का कोई जैमर जाम नहीं कर सकता। यहीं पर ज्वाला मिसाइल अनिवार्य हो जाती है, जो अपने एईएसए रडार से टारगेट को खोजती है और प्रहार करके उसे खाक कर देती है।
मैदान में कोई भी मिसाइल अकेले काम नहीं करती। भारतीय वायुसेना ने पूरे देश के हवाई क्षेत्र को बांधने के लिए इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम तैयार किया है। यह भारत का केंद्रीय नर्वस सिस्टम है जो देश के तमाम रडार, अवाक्स टोही विमान और नेवी वॉरशिप्स को एक साथ जोड़ता है। जैसे ही कोई संदिग्ध ड्रोन सीमा पार करता है, यह नेटवर्क सेकंड के हज़ारवें हिस्से में तय करता है कि उस पर एस-400 से हमला करना है, मीडियम रेंज मिसाइल दागनी है या फिर ज्वाला से उसे भूनना है।





