अरुणाचल प्रदेश की बर्फीली चोटियों पर इस वक्त भारत और चीन के बीच जबरदस्त माहौल गर्म है और इसी माहौल के जब चीनी सेना अपने हथियारों की नुमाइश कर रही थी, तब नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में एक ऐसा सीक्रेट गेम प्लान तैयार हो चुका था जिसने बंगाल की खाड़ी में चीन के 10 billion dollar एक झटके में खाक कर दिए। भारत ने अरुणाचल प्रदेश में जंगी माहौल बनने से पहले ही चीन की इकोनॉमी को बर्बाद कर डाला है।
25 October 2026 की दोपहर को ढाका के एयरपोर्ट से उड़ीं वो दो रहस्यमयी फ्लाइट्स कौन सी थीं, जिनमें से एक बीजिंग की आंखों में धूल झोंकने गई और दूसरी सीधे दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पर लैंड हुई? बांग्लादेश की सबसे ताकतवर खुफिया एजेंसी NSI का चीफ बिना किसी प्रोटोकॉल और बिना किसी मीडिया कवरेज के आधी रात को दिल्ली के बंद कमरों में क्या कर रहा था? आखिर उस लाल सीक्रेट फाइल में ऐसा क्या था जिसने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पूरे स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स प्लान के गले में फंदा डाल दिया? और क्या 22 km के सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी चिकन्स नेक को काटने का ख्वाब देखने वाला चीन, खुद बंगाल की खाड़ी के चक्रव्यूह में ऐसा फंसा है कि अब उसके पास बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा?
यह खेल उस महायुद्ध का है जो बिना एक भी गोली चलाए लड़ा गया। बीजिंग को लग रहा था कि वह लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक भारतीय सेना को उलझा कर रखेगा। चीनी PLA की चाल थी कि भारत का पूरा ध्यान हिमालय की ऊंची चोटियों पर रहे। चीनी रणनीतिकार समझ रहे थे कि जब तक भारत अपनी सीमाओं पर बंकर बनाएगा, तब तक चीन चुपचाप बांग्लादेश के समुद्री रास्तों पर अपना कब्जा जमा लेगा। लेकिन नई दिल्ली के रणनीतिकारों ने ड्रैगन की इस चाल को उसी के अंदाज में पलट कर रख दिया।
तारीख नोट कर लीजिए—25 October 2026। दोपहर के ठीक 1:07 PM बजे ढाका के हजरत शाहजलाल इंटरनेशनल एयरपोर्ट से एक फ्लाइट उड़ान भरती है। मंजिल थी चीन का औद्योगिक शहर ग्वांगझू। उस फ्लाइट में बांग्लादेश की खुफिया एजेंसी NSI के 4 टेक्निकल ऑफिसर्स सवार थे। चीन के अफसरों को लगा कि बांग्लादेश की खुफिया एजेंसी उनके पाले में आ रही है। बीजिंग के हुक्मरान जश्न मनाने लगे। उन्हें लगा कि बांग्लादेश उनकी निगरानी तकनीक और सर्विलांस सिस्टम खरीदने जा रहा है। लेकिन यह सिर्फ एक पर्दा था। यह बीजिंग की आंखों में धूल झोंकने के लिए बिछाया गया एक क्लासिक स्मोकस्क्रीन था।
क्योंकि इस पहली फ्लाइट के ठीक 3 घंटे 15 मिनट बाद, यानी शाम के 4:22 PM बजे, ढाका से एक दूसरी स्पेशल फ्लाइट ने आसमान में उड़ान भरी। इस फ्लाइट की मंजिल चीन नहीं, बल्कि सीधे भारत की राजधानी नई दिल्ली थी। इस दूसरे सीक्रेट विमान में कोई आम अधिकारी नहीं था। इसमें सवार थे बांग्लादेश की सबसे शक्तिशाली आंतरिक खुफिया एजेंसी NSI के डायरेक्टर जनरल, मेजर जनरल अबू मोहम्मद सरवर फरीद। उनके साथ उनका सबसे भरोसेमंद सीक्रेट सहयोगी भी मौजूद था। इस पूरे मिशन को इतनी खामोशी से अंजाम दिया गया कि दुनिया भर के मीडिया को इसकी कानों-कान खबर नहीं लगी। न कोई प्रेस रिलीज जारी हुई, न कोई कैमरे चमके और न ही कोई औपचारिक स्वागत हुआ। आधी रात को मेजर जनरल फरीद का विमान दिल्ली के पालम टेक्निकल एरिया में उतरा। वहां से उनका काफिला सीधे रायसीना हिल्स के लिए रवाना हुआ।
सवाल उठता है कि आखिर बांग्लादेश की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी का प्रमुख इतने गोपनीय तरीके से दिल्ली क्यों पहुंचा? दरअसल, यह कोई अचानक हुआ दौरा नहीं था। इसकी मजबूत जमीन इसी साल 1 से 3 March 2026 के बीच ही तैयार कर ली गई थी। उस वक्त बांग्लादेश की मिलिट्री इंटेलिजेंस एजेंसी DGFI के प्रमुख मेजर जनरल कैसर राशिद चौधरी ने दिल्ली का 3 दिनों का बेहद गोपनीय दौरा किया था।
Bangladesh में February 2026 में चुनी गई नई सरकार के मुखिया तारिक रहमान के सत्ता में आने के बाद, बीजिंग में यह ढोल पीटा जा रहा था कि अब ढाका भारत से दूर हो जाएगा। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी सोच रही थी कि BNP के दौर में वह बांग्लादेश को भारत के खिलाफ एक लॉन्चपैड बना लेगी। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ख्वाब अलग होते हैं और जमीन की सच्चाई बिल्कुल अलग होती है। बांग्लादेश की 4156 km लंबी सरहद भारत से लगती है। बांग्लादेश को अपनी आंतरिक सुरक्षा, अपनी बिजली, अपने अनाज और अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए भारत की जरूरत है, चीन के महंगे कर्जों की नहीं।
साउथ ब्लॉक और CGO कॉम्प्लेक्स में भारत की एक्सटर्नल इंटेलिजेंस एजेंसी RAW और नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल सेक्रेटेरिएट यानी NSCS के टॉप अफसरों के साथ NSI चीफ की कई राउंड की लंबी बैठकें हुईं। इस सीक्रेट बैठक के एजेंडे में 4 सबसे बड़े मुद्दे थे। पहला मुद्दा था पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा। ULFA-I और नगा विद्रोही गुटों के बचे हुए कैडरों को बांग्लादेश की जमीन पर किसी भी कीमत पर पनाह न मिले और न ही उन्हें चीनी खुफिया तंत्र से कोई मदद मिले। दूसरा मुद्दा था बंगाल की खाड़ी की हिफाजत। चीन के जासूसी जहाज, जैसे युआन वांग और शियांग यांग होंग, जो समंदर के नीचे का डेटा चुराने आते हैं, उन्हें बांग्लादेश के समुद्री इलाके से पूरी तरह बाहर खदेड़ा जाए। तीसरा मुद्दा था चीनी सर्विलांस सिस्टम की जासूसी। बांग्लादेश के रडार और टेलीकॉम में चीन के जो बैकडोर छिपे थे, उन्हें हमेशा के लिए उखाड़ फेंकना। और चौथा सबसे बड़ा मिशन था प्रधानमंत्री तारिक रहमान की December 2026 में होने वाली ऐतिहासिक भारत यात्रा का पूरा रोडमैप तैयार करना।
ग्वांगझू में मौजूद 4 टेक्निकल ऑफिसर्स की टीम सिर्फ एक कवर थी। असली फैसला नई दिल्ली के बंद कमरों में हो रहा था।
अब जरा इस टाइमिंग को समझिए। चीन की सेना ‘द आर्ट ऑफ वॉर’ के सिद्धांतों पर चलती है। उनका पुराना फॉर्मूला है—पूर्व में शोर मचाओ और पश्चिम में वार करो। पिछले कुछ महीनों से चीन अरुणाचल प्रदेश के तवांग, यांग्त्से और किबिथू सेक्टर में लगातार अपनी PLA की टुकड़ियां भेज रहा था। तिब्बत में नए-नए हेलिपैड बना रहा था। LAC के पार शियाओकांग यानी बॉर्डर विलेज बसा रहा था। चीन का मकसद एकदम साफ था। वह चाहता था कि भारतीय सेना की 33 कोर, 4 कोर और 3 कोर पूरी तरह से हिमालय की बर्फबारी में उलझी रहें। ताकि भारत अपनी नजरें समंदर से हटा ले।
लेकिन इस बार भारत ने चीन के इस चक्रव्यूह को ऐसा तोड़ा कि ड्रैगन दंग रह गया। भारतीय सेना और ITBP ने वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम, सेला टनल और नेचिफू टनल के जरिए बॉर्डर पर अपनी ताकत को इतना मजबूत कर दिया कि चीन वहां 1 इंच भी आगे नहीं बढ़ सका। और जब चीन के जासूसी सेटेलाइट्स अरुणाचल के कामेंग और सुबनसिरी में भारतीय चौकियों को घूर रहे थे, उसी वक्त नई दिल्ली ने बंगाल की खाड़ी में चीन की पूरी बिसात को हमेशा के लिए पलट दिया।
चीन की सबसे कमजोर नस क्या है? वह है ‘मलक्का डिलेमा’। चीन का 80 percent कच्चा तेल मलक्का के संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। युद्ध की हालत में अंडमान और निकोबार कमान पर बैठी भारतीय नौसेना उस रास्ते को मिनटों में चोक कर सकती है। इसी डर से चीन बंगाल की खाड़ी में कोई ऐसा पोर्ट तलाश रहा था जहां वह अपनी नौसेना का परमानेंट बेस बना सके। म्यांमार का क्याउकप्यू बंदरगाह वहां के गृहयुद्ध के कारण बर्बाद हो चुका है। श्रीलंका का हंबनटोटा पहले ही दुनिया भर की नजरों में बदनाम है। पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट बलूच विद्रोहियों के हमलों की वजह से लगभग बंद पड़ा है। चीन के पास सिर्फ एक उम्मीद बची थी—बांग्लादेश के बंदरगाह। और चीन ने सोचा था कि वह सोनादिया, चटगांव और मोंगला पर कब्जा करके भारत को बंगाल की खाड़ी से पूरी तरह घेर लेगा।
लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह बीजिंग के लिए किसी बुरे सपने जैसा था।
सबसे पहला झटका चीन को लगा सोनादिया डीप सी पोर्ट पर। चीन की सरकारी कंपनी चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी यानी CHEC ने कॉक्स बाजार के पास सोनादिया द्वीप पर 8 billion dollar का डीप सी पोर्ट बनाने का पूरा जाल बिछा दिया था। यह कोई मामूली बंदरगाह नहीं था। इसका पानी इतना गहरा था कि वहां चीन की परमाणु पनडुब्बियां और भारी युद्धपोत आसानी से लंगर डाल सकते थे। अगर यह बन जाता, तो विशाखापट्टनम में भारतीय नौसेना की ईस्टर्न नेवल कमान और INS वर्षा का सीक्रेट सबमरीन बेस सीधे चीनी मिसाइलों की जद में आ जाता। भारत और अमेरिका ने ढाका को ऐसे पुख्ता इनपुट्स दिए कि बांग्लादेश की सरकार ने इस पूरे प्रोजेक्ट को पहले ठंडे बस्ते में डाला और फिर हमेशा के लिए कैंसिल कर दिया। 8 billion dollar का चीनी सपना पहली ही चोट में चकनाचूर हो गया।
सोनादिया के रद्द होते ही चीन को लगा कि बांग्लादेश के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं होगा। लेकिन यहीं पर भारत और उसके सबसे मजबूत रणनीतिक साझेदार जापान ने ऐतिहासिक दांव चला। इसे क्वाड मॉडल की सबसे बड़ी जीत कहा जाता है। जापान की एजेंसी JICA यानी जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी ने कॉक्स बाजार के ही मातारबाड़ी में 18.5 meter गहरे पानी वाला शानदार डीप सी पोर्ट बनाने की जिम्मेदारी उठा ली। जापान ने 0.1 percent के बेहद मामूली ब्याज दर और 40 साल के आसान रीपेमेंट पीरियड के साथ 3.7 billion dollar से ज्यादा का सॉफ्ट लोन दिया।
2025 में इस प्रोजेक्ट के दूसरे फेज को पूरी तरह लॉक कर दिया गया। और 2026 के इस दौर में मातारबाड़ी पोर्ट का काम उस मुकाम पर पहुंच चुका है जहां 8000 TEU क्षमता वाले भारी-भरकम पोस्ट-पैनामैक्स जहाज सीधे आकर खड़े हो सकते हैं। सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक क्या था? मातारबाड़ी के पूरे सिस्टम में, उसके पूरे फाइनेंस में और उसके ऑपरेशन में चीन का 1 percent भी हिस्सा नहीं है। यह क्वाड मॉडल की वह सबसे बड़ी कामयाबी है जिसने बंगाल की खाड़ी को एक ओपन और फ्री इंडो-पैसिफिक जोन में बदल दिया।
लेकिन खेल यहीं खत्म नहीं हुआ। चीन की नजर बांग्लादेश की आर्थिक धड़कन यानी चटगांव पोर्ट पर थी। चटगांव पोर्ट पूरे बांग्लादेश का 90 percent से ज्यादा समुद्री व्यापार संभालता है। देश का 80 billion dollar से ज्यादा का गारमेंट एक्सपोर्ट इसी रास्ते दुनिया भर में जाता है। चीन यहां अपना कंटेनर टर्मिनल बनाने के लिए अपनी तिजोरी खोलने को तैयार बैठा था। लेकिन ढाका ने नई दिल्ली और पश्चिमी देशों के साथ मिलकर ऐसा खेल किया कि बीजिंग के होश उड़ गए।
बांग्लादेश ने चटगांव पोर्ट के तहत बनने वाले लालदिया कंटेनर टर्मिनल का 30 साल का कॉन्ट्रैक्ट डेनमार्क के मशहूर मार्स्क ग्रुप यानी APM टर्मिनल्स को सौंप दिया। पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप यानी PPP मॉडल के तहत 400 million dollar से ज्यादा के इस सीधे विदेशी निवेश ने चटगांव में सीधे नाटो और यूरोपीय यूनियन की मौजूदगी दर्ज करा दी। जब दुनिया की सबसे बड़ी शिपिंग कंपनी खुद वहां टर्मिनल चलाएगी, तो चीन वहां अपनी जासूसी नौकाएं लाने की हिम्मत भी नहीं कर सकता।
इसके तुरंत बाद चीन को दूसरा थप्पड़ पड़ा पतेंगा कंटेनर टर्मिनल पर। चटगांव के इसी पतेंगा टर्मिनल को हथियाने के लिए चीनी कंपनियां हर तरह के हथकंडे अपना रही थीं। लेकिन बांग्लादेश ने इस टर्मिनल का पूरा ऑपरेशन सऊदी अरब की दिग्गज पोर्ट ऑपरेटर कंपनी RSGT यानी रेड सी गेटवे टर्मिनल को दे दिया। सऊदी अरब की इस एंट्री ने एक ऐसा जियोपॉलिटिकल शील्ड तैयार कर दिया जिसे भेदना चीन के लिए नामुमकिन हो गया। अरब मुल्कों की भारी पूंजी और रणनीतिक पहुंच ने बांग्लादेश के समंदर पर एक नया अंतरराष्ट्रीय पहरा बैठा दिया।
अब चीन के लिए बचता था सिर्फ एक बंदरगाह—मोंगला पोर्ट। June 2026 में जब बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान बीजिंग के दौरे पर गए थे, तब चीन ने दुनिया को दिखाया कि वह मोंगला पोर्ट को मॉडर्नाइज करने के लिए अरबों रुपये लुटाने जा रहा है। लेकिन जब इस डील के असली पेपर्स सामने आए, तो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का चेहरा उतर गया। बांग्लादेश ने चीन को मोंगला पोर्ट में सिर्फ एक EPC कॉन्ट्रैक्टर यानी कंस्ट्रक्शन वर्कर और क्रेन सप्लायर बना कर छोड़ दिया। बांग्लादेश ने साफ कर दिया कि पोर्ट का मैनेजमेंट, पोर्ट की सिक्योरिटी और नेविगेशन चैनल का पूरा कंट्रोल सिर्फ और सिर्फ बांग्लादेश के हाथों में रहेगा। और मोंगला का असली भूगोल क्या है? मोंगला का पानी सिर्फ 7 से 8 meter गहरा है। इतने कम पानी में चीन का कोई भी युद्धपोत या बड़ा विध्वंसक जहाज घुस ही नहीं सकता। चीन जिस पोर्ट को अपना मिलिट्री बेस बनाना चाहता था, वहां उसे सिर्फ मजदूरी और मशीनें लगाने का काम मिला।
इस पूरी पराजय के पीछे चीन की जासूसी एजेंसी MSS यानी मिनिस्ट्री ऑफ स्टेट सिक्योरिटी की सबसे बड़ी नाकामी छिपी है। चीन की खुफिया एजेंसी ने ढाका में अपने डिप्लोमैट्स, टेलीकॉम वेंडर्स और यूनिवर्सिटीज के जरिए सैकड़ों जासूस तैनात कर रखे थे। चीन का प्लान था कि बांग्लादेश के टेलीकॉम और रडार सिस्टम में अपने हार्डवेयर फिट कर दिए जाएं, ताकि बंगाल की खाड़ी के हर डिजिटल सिग्नल और SIGINT यानी सिग्नल इंटेलिजेंस को बीजिंग के सर्वर्स में लाइव देखा जा सके। लेकिन भारतीय खुफिया एजेंसियों ने इस पूरे चीनी नेटवर्क को बेनकाब कर दिया।
भारतीय टेक्निकल एक्सपर्ट्स ने बांग्लादेशी अधिकारियों को डिजिटल फॉरेंसिक के ऐसे ठोस सबूत दिखाए, जिनसे साबित हो गया कि चीनी उपकरणों में हिडन बैकडोर और किल-स्विच मौजूद थे। यही वजह थी कि NSI के 4 टेक्निकल ऑफिसर्स को ग्वांगझू सिर्फ इसलिए भेजा गया ताकि वे चीनी उपकरणों की तकनीकी कमियों को नोट कर सकें, न कि उन्हें अपने देश में लगाने के लिए। भारतीय खुफिया तंत्र की इस खामोश स्ट्राइक ने चीनी जासूसी एजेंसी के पूरे बजट को कूड़ेदान में फेंक दिया।
अब समझिए कि बांग्लादेश की नई सरकार ने यह रणनीतिक कदम क्यों उठाया। February 2026 में सत्ता संभालने के बाद तारिक रहमान को इस बात का बहुत अच्छे से अहसास हो चुका था कि अगर बांग्लादेश को जिंदा रहना है, तो उसे हकीकत को पहचानना होगा। बांग्लादेश का 80 billion dollar से ज्यादा का कपड़ा उद्योग उसकी लाइफलाइन है। और इस कपड़े का 70 percent से ज्यादा हिस्सा अमेरिका और यूरोप के बाजारों में बिकता है। यूरोपीय यूनियन ने अपनी GSP+ प्राथमिकताओं को स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों से जोड़ रखा है। अगर बांग्लादेश चीन की गोद में बैठता, तो वाशिंगटन और ब्रुसेल्स उसके व्यापार पर कड़े प्रतिबंध लगा देते।
दूसरी तरफ भारत है। भारत के बिना बांग्लादेश का एक दिन भी चलना नामुमकिन है। झारखंड के गोड्डा पावर प्लांट से बांग्लादेश को 1500 MW से ज्यादा बिजली मिलती है। असम के नुमालीगढ़ से भारत-बांग्लादेश फ्रेंडशिप पाइपलाइन यानी IBFP के जरिए हाई-स्पीड डीजल सीधे बांग्लादेश के खेतों और कारखानों तक पहुंचता है। भारत से गेहूं, प्याज, कपास और जरूरी दवाइयों की सप्लाई होती है। तारिक रहमान ने देखा कि कैसे पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट बंजर पड़ा है और कैसे श्रीलंका को अपना हंबनटोटा बंदरगाह 99 साल के लिए चीन को गिरवी रखना पड़ा था। बांग्लादेश ने तय कर लिया कि वह ड्रैगन के इस कर्ज के जाल में कभी पैर नहीं रखेगा।
भारत ने ढाका के साथ इस पूरे खेल में कभी कोई आक्रामकता नहीं दिखाई। इसे कहते हैं साइलेंट स्टेटक्राफ्ट यानी मौन कूटनीति। भारत ने बांग्लादेश को 8 billion dollar की रियायती लोन सहायता यानी LoC दी, जिसकी शर्तें चीनी वाणिज्यिक कर्जों के मुकाबले कहीं ज्यादा पारदर्शी और सस्ती हैं। भारत ने साफ कर दिया कि पड़ोस पहले है, लेकिन संप्रभुता के साथ कोई समझौता नहीं होगा।
भारत के लिए इस पूरी कूटनीति का सबसे बड़ा सामरिक फायदा क्या है? वह फायदा है 22 km चौड़ा सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे दुनिया चिकन्स नेक कहती है। यह संकरा गलियारा भारत के मुख्य भूभाग को हमारे 8 नॉर्थ ईस्ट राज्यों से जोड़ता है। चीन की हमेशा यह नापाक नजर रही है कि किसी तरह डोकलाम या बांग्लादेश के जरिए इस चिकन्स नेक पर दबाव बनाया जाए। चीन सोचता था कि किसी संघर्ष की स्थिति में वह पूर्वोत्तर को बाकी भारत से काट देगा। लेकिन आज भारत ने उस पूरे समीकरण को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया है।
भारत ने बांग्लादेश के समुद्री तटों पर 20 से ज्यादा अत्याधुनिक कोस्टल सर्विलांस रडार सिस्टम यानी CSRS लगाए हैं। इस पूरे रडार नेटवर्क का लाइव डेटा सीधे भारत के गुरुग्राम स्थित IFC-IOR यानी इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर में 24 घंटे स्ट्रीम होता है। बंगाल की खाड़ी में एक छोटी सी बोट भी हिले, तो उसकी खबर सीधे भारतीय नौसेना को लग जाती है। और सबसे बड़ी बात, भारत ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर के विकल्प खड़े कर दिए हैं। कोलकाता से चटगांव होकर अगरतला जाने वाला मल्टी-मॉडल रूट पूरी तरह चालू हो चुका है। इससे हमारे पूर्वोत्तर की दूरी 1650 km से घटकर मात्र 500 km रह गई है। अखौरा-अगरतला रेल लिंक चालू हो चुका है, जिसने त्रिपुरा को सीधे बांग्लादेश के नेटवर्क से जोड़ दिया है। खुलना-मोंगला रेल लाइन मोंगला पोर्ट को सीधे भारत के बॉर्डर से जोड़ती है।
इसका सीधा मतलब यह है कि अगर कल को चीन हिमालय में कोई हिमाकत करता भी है, तो नॉर्थ ईस्ट की सप्लाई लाइन काटने का उसका ख्वाब कभी पूरा नहीं हो सकता। बांग्लादेश का पूरा ट्रांसपोर्ट सिस्टम अब भारत की सुरक्षा का नया रक्षा कवच बन चुका है।
अब सारी निगाहें December 2026 में होने वाली प्रधानमंत्री तारिक रहमान की नई दिल्ली यात्रा पर टिकी हैं। यह कोई साधारण राजनयिक दौरा नहीं होगा। इस दौरे में भारत और बांग्लादेश के बीच कॉम्प्रीहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट यानी CEPA पर मुहर लगने जा रही है, जो दोनों देशों के व्यापार को 25 billion dollar के ऐतिहासिक आंकड़े के पार ले जाएगा। और सबसे बड़ा धमाका डिफेंस के मोर्चे पर होने वाला है। भारत ने बांग्लादेश को जो 500 million dollar की डिफेंस लाइन ऑफ क्रेडिट दी है, उसके तहत बांग्लादेश की सेना को BEL और HAL जैसी भारतीय कंपनियों के आधुनिक हथियार, गश्ती बोट्स, बख्तरबंद वाहन और रडार दिए जाएंगे। बांग्लादेश की सेना आज भी 70 percent चीनी हथियारों पर निर्भर है, और भारत इस निर्भरता को हमेशा के लिए खत्म करने जा रहा है। साथ ही, BSF और BGB के बीच बॉर्डर पर जीरो कैजुअल्टी पॉलिसी और आतंकवाद के खिलाफ NSI और भारतीय एजेंसियों का एक जॉइंट डिजिटल डेटाबेस तैयार किया जा रहा है।
चीन की यह बहुत बड़ी रणनीतिक भूल रही कि उसने भारत को केवल जमीन पर लड़ने वाला प्रतिद्वंद्वी समझा। बीजिंग अपनी पूरी ताकत लद्दाख और अरुणाचल के पहाड़ों पर झोंकता रहा। वह भूल गया कि 21वीं सदी का भारत समंदर से लेकर आसमान तक हर मोर्चे पर अपनी स्वायत्तता की रक्षा करना जानता है। भारत ने क्वाड पार्टनर्स यानी जापान और अमेरिका के साथ मिलकर, और खाड़ी देशों को साथ लेकर ऐसा चक्रव्यूह रचा कि बांग्लादेश में चीन के लिए कोई खाली कोना बचा ही नहीं।
25 October 2026 की उस शाम जब NSI चीफ का प्लेन दिल्ली में उतरा था, तो उसने बीजिंग को यह कड़ा संदेश दे दिया था कि नया भारत सरहदों पर सिर्फ रक्षात्मक खेल नहीं खेलता, बल्कि दुश्मन की चाल को भांपकर पूरे खेल का पासा पलटना जानता है। अरुणाचल में भारतीय सेना डटी रही, और समंदर में भारत की कूटनीति ने चीन के 10 billion dollar डुबो दिए। ड्रैगन की मोतियों की माला यानी स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स अब पूरी तरह बिखर चुकी है। और बंगाल की खाड़ी में भारत की रणनीतिक बढ़त ने यह साबित कर दिया है कि इस पूरे क्षेत्र का असली बॉस कौन है।





