माओ का ‘फाइव फिंगर प्लान’ हुआ फेल: अरुणाचल में भारत की ‘मैप स्ट्राइक’ से डरा चीन, हिल गई बीजिंग की अर्थव्यवस्था

7 अगस्त को भारत ने एक ऐसा ऐतिहासिक और साहसिक कदम उठाया है, जिसने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की रातों की नींद हराम कर दी है। चीन लंबे समय से जिस अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताने का झूठा प्रोपेगेंडा चला रहा था, भारत ने एक झटके में वहां की 27 जगहों के नाम बदलकर बीजिंग को उसकी औकात दिखा दी है। आखिर इन 27 नामों के पीछे का वो क्या राज है, जिसे चीनी मीडिया दुनिया से छिपाना चाहती है? 13 हजार फीट की ऊंचाई पर बना वो ‘मौत का कुआं’ कौन सा है जिससे ड्रैगन सबसे ज्यादा खौफजदा है? सेला टनल से गुजरते भारत के साइलेंट हथियार किस तरह चीन में दहशत पैदा कर रहे हैं, आइए जानते हैं।

1962 की गलतियों से सीख लेते हुए आज का भारत रक्षात्मक (Defensive) नहीं, बल्कि आक्रामक (Offensive) रुख अपना चुका है। भारत ने अंडमान निकोबार के पास चीन की उस ‘दुखती नस’ को पकड़ लिया है, जिससे युद्ध की स्थिति में भारतीय नौसेना महज 7 दिनों में चीन की पूरी इकोनॉमी को तबाह कर सकती है। भारतीय गृह मंत्रालय का यह फैसला कि अरुणाचल की 27 जगहों के नाम आधिकारिक तौर पर बदले जाएंगे, चीन के मंदारिन नामकरण की कोशिशों पर कूटनीतिक तमाचा है। चीन इसे ‘जांगनान’ कहकर जो नैरेटिव बना रहा था, भारत की ‘मैप स्ट्राइक’ ने उसे जड़ से उखाड़ फेंका है। इन नामों में जसवंत गढ़ जैसे गौरवशाली स्थलों को आधिकारिक मान्यता देना चीन को यह संदेश है कि भारत अपनी एक इंच जमीन और इतिहास से समझौता नहीं करेगा।

बात सिर्फ नक्शों की नहीं है, ग्राउंड जीरो पर भी भारत ने ‘मौत का जाल’ बिछा दिया है। सेला टनल के चालू होने से भारतीय सेना को अब तवांग और LAC तक ऑल-वेदर कनेक्टिविटी मिल गई है। अब भारी तोपें और टैंक किसी भी मौसम में सीमा तक पहुंच सकते हैं। वहीं लद्दाख में ‘दरबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी’ रोड ने चीन के रणनीतिकारों के पसीने छुड़ा दिए हैं। वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम के तहत सीमावर्ती गांवों को भारत का ‘पहला गांव’ घोषित कर वहां वर्ल्ड क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है, जो चीन के मनोवैज्ञानिक युद्ध का करारा जवाब है।

पर्वतीय युद्ध (Mountain Warfare) में भारतीय सेना की वैश्विक सर्वोच्चता से चीन अच्छी तरह वाकिफ है। चीन की पीएलए (PLA) एक ऐसी सेना है जिसके सैनिकों के पास युद्ध का कोई वास्तविक अनुभव नहीं है, जबकि भारतीय सेना के जवान सियाचिन और कारगिल जैसी दुर्गम चोटियों पर लोहा लेने में माहिर हैं। हवा में भी भूगोल भारत के साथ है; तिब्बत की अधिक ऊंचाई के कारण चीनी लड़ाकू विमान अपनी पूरी क्षमता के साथ उड़ान नहीं भर सकते, जबकि भारतीय राफेल और सुखोई मैदानी इलाकों से उड़ान भरकर चीन के अंदर तक तबाही मचाने में सक्षम हैं।

जियो-पॉलिटिकल मोर्चे पर भी भारत अब अकेला नहीं है। क्वाड (QUAD) और अमेरिका के साथ रियल-टाइम इंटेलिजेंस शेयरिंग ने चीन के हर मूवमेंट को भारत के रडार पर ला दिया है। इसके अलावा, ‘मलाक्का डिलेमा’ चीन की सबसे बड़ी कमजोरी है। भारत मलाक्का जलडमरूमध्य को ब्लॉक कर चीन की 80% तेल आपूर्ति रोक सकता है, जिससे उसकी पूरी अर्थव्यवस्था घुटनों पर आ जाएगी। माओ त्से तुंग का ‘फाइव फिंगर प्लान’ आज उसी चीन के लिए दुःस्वप्न बन गया है। भारत अब अपनी शर्तों पर ग्लोबल पावर गेम खेल रहा है, और बीजिंग को यह समझ लेना चाहिए कि यह 1962 वाला भारत नहीं, बल्कि 2024 का नया और शक्तिशाली भारत है।

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