मोसाद भी हैरान! पिकएक्स माउंटेन का रहस्य और अमेरिका-सऊदी की वो सीक्रेट न्यूक्लियर डील जिसने उड़ाई दुनिया की नींद

ईरान का माउंट कोलांग, जिसे रक्षा और खुफिया दुनिया में ‘पिकएक्स माउंटेन’ के रूप में जाना जाता है, आज वैश्विक सुरक्षा के लिए एक अबूझ पहेली बन चुका है। यह नतांज यूरेनियम संवर्धन संयंत्र के पास स्थित महज़ एक पहाड़ नहीं, बल्कि एक अभेद्य परमाणु किला है। इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद और अमेरिकी रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने अपने सबसे आधुनिक यूरेनियम सेंट्रीफ्यूज को इस पहाड़ के नीचे सैकड़ों मीटर गहरी सुरंगों में स्थानांतरित कर दिया है। अत्यधिक कंक्रीट और फौलादी सुरक्षा वाली ये सुरंगें इतनी गहराई में हैं कि इन्हें पारंपरिक बंकर-बस्टर बमों से नष्ट करना नामुमकिन माना जा रहा है। इंस्टीट्यूट फॉर साइंस एंड इंटरनेशनल सिक्योरिटी की रिपोर्टों का दावा है कि ईरान यहाँ वेपन्स-ग्रेड यूरेनियम के निर्माण का ढांचा तैयार कर चुका है, जिसने सैन्य विकल्पों को लगभग बेअसर कर दिया है।

मिडिल ईस्ट का नया शक्ति संतुलन और सऊदी अरब की चुनौती

ईरान की इस बढ़ती सैन्य और परमाणु ताकत ने मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) के पावर बैलेंस को पूरी तरह बदल दिया है। इसका सबसे बड़ा प्रभाव सऊदी अरब पर पड़ा है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने 2018 में ही स्पष्ट कर दिया था कि यदि ईरान ने परमाणु हथियार विकसित किए, तो सऊदी अरब भी देर नहीं करेगा। आज अमेरिका और रियाद के बीच चल रही ‘सिविल न्यूक्लियर डील’ की सुगबुगाहट इसी सामरिक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।

सऊदी अरब का ‘विजन 2030’ ऊपर से एक आर्थिक सुधार योजना लग सकती है, लेकिन इसके भीतर रणनीतिक महत्वाकांक्षाएं छिपी हैं। इस पूरी कूटनीति का सबसे जटिल बिंदु ‘यूरेनियम एनरिचमेंट’ यानी यूरेनियम संवर्धन की अनुमति प्राप्त करना है।

अमेरिका आमतौर पर ‘सेक्शन 123’ के कड़े नियमों का पालन करता है, जो दूसरे देशों को अपनी धरती पर यूरेनियम संवर्धन की अनुमति नहीं देता। हालांकि, सऊदी अरब ने शर्त रखी है कि इस डील के तहत उसे एनरिचमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर की पूरी आजादी मिलनी चाहिए।

चीन का दखल और गुप्त मिसाइल कार्यक्रम

अमेरिका के लिए यह स्थिति एक बड़ी चुनौती है। यूरेनियम संवर्धन एक ऐसी तकनीक है जो बिजली उत्पादन से लेकर परमाणु हथियार बनाने तक में इस्तेमाल की जा सकती है। यदि अमेरिका यह मांग पूरी नहीं करता, तो सऊदी अरब चीन या रूस की ओर रुख कर सकता है, जो वाशिंगटन के लिए एक रणनीतिक हार होगी।

अमेरिकी उपग्रहों ने पहले ही सऊदी के अल-उला क्षेत्र में संदेहास्पद गतिविधियां दर्ज की हैं, जहाँ चीन की मदद से ‘येलोकेक’ (प्राकृतिक यूरेनियम अयस्क) निकालने की सुविधा विकसित की गई है। इतना ही नहीं, सऊदी अरब ने चीन से DF-3 और DF-21 जैसी बैलिस्टिक मिसाइलें हासिल की हैं और अब वह ठोस-ईंधन मिसाइलों के निर्माण पर काम कर रहा है। इसे विशेषज्ञों ने ‘न्यूक्लियर लेटेंसी’ का नाम दिया है—यानी ऐसी स्थिति जहाँ जरूरत पड़ने पर कुछ ही हफ्तों में परमाणु हथियार तैयार किए जा सकें।

पाकिस्तान का परमाणु बैकअप और इजरायल की रणनीति

इस क्षेत्रीय तनाव में पाकिस्तान की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। 1999 के प्रतिबंधों के दौरान सऊदी अरब ने पाकिस्तान को बड़ी आर्थिक सहायता दी थी, जिसके बदले में परमाणु तकनीक या हथियारों के गुप्त आदान-प्रदान की अटकलें लगाई जाती रही हैं। हालांकि, वर्तमान में सऊदी अरब किसी बाहरी देश पर निर्भर रहने के बजाय खुद की तकनीकी क्षमता खड़ी करने पर ज्यादा जोर दे रहा है।

दूसरी तरफ, इजरायल अपनी ‘बिगिन डॉक्ट्रिन’ के तहत हमेशा से अपने पड़ोसियों को परमाणु क्षमता हासिल करने से रोकता आया है, जैसा उसने इराक और सीरिया के मामलों में किया। लेकिन अब ईरान के खतरे को देखते हुए, इजरायल अमेरिका की देखरेख में सऊदी के एक नियंत्रित परमाणु कार्यक्रम को स्वीकार करने के कठिन विकल्पों पर विचार कर रहा है।

भारत का दृष्टिकोण और ऊर्जा सुरक्षा पर प्रभाव

पश्चिम एशिया की यह अस्थिरता भारत के लिए चिंता का विषय है। भारत का कच्चा तेल आयात और वहां रहने वाले 90 लाख भारतीय प्रवासी सीधे तौर पर इस क्षेत्र की शांति पर निर्भर हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे समुद्री मार्गों में कोई भी रुकावट भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका दे सकती है।

भारत ने इस जटिल परिदृश्य में ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति अपनाई है। जहाँ भारत सऊदी अरब के साथ सुरक्षा और आर्थिक रिश्तों को नया विस्तार दे रहा है, वहीं ईरान के चाबहार बंदरगाह और इजरायल के साथ तकनीकी रक्षा संबंधों को भी संतुलित बनाए हुए है।

एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में, भारत इस क्षेत्र में शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा के विस्तार और सुरक्षा मानकों के पालन का पक्षधर है। भारत की विदेश नीति का मूल मंत्र क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना और अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

अंततः, मिडिल ईस्ट की यह परमाणु होड़ केवल क्षेत्रीय नहीं है, बल्कि यह भविष्य के वैश्विक शक्ति संतुलन को निर्धारित करने वाली एक बड़ी घटना है।

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