सोनम वांगचुक और सीजेपी का जंतर-मंतर पर बड़ा यू-टर्न: धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग से पीछे हटे

रात के ढाई बजे दिल्ली के जंतर-मंतर से एक ऐसा बयान सामने आया है, जिसने पिछले कई दिनों से चल रही राजनीतिक हलचल की दिशा ही बदल दी। 20 जुलाई 2026 की सुबह, जब पूरा देश संसद मार्च को लेकर एक बड़े टकराव की संभावना देख रहा था, ठीक उससे पहले कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और 23 दिनों से अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक ने अचानक एक बड़ा यू-टर्न ले लिया। जो लोग पिछले एक महीने से शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे और प्रधानमंत्री तक को घेर रहे थे, वे अब पूरी तरह बैकफुट पर नजर आ रहे हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि इस्तीफे की जिद को छोड़कर अब केवल जवाबदेही की बात की जा रही है? क्या यह किसी गुप्त समझौते का हिस्सा है या आंदोलन की ताकत खत्म हो चुकी है? आइए इस पूरी इनसाइड स्टोरी का विश्लेषण करते हैं।

इस्तीफे की जिद से जवाबदेही तक का बदलाव

राजनीति में कब कौन सा पासा पलट जाए, इसका अंदाजा लगाना कठिन है। सीजेपी का यह आंदोलन शिक्षा व्यवस्था और पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दों को लेकर शुरू हुआ था। छात्रों की आत्महत्याओं की दुखद घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया था। लेकिन इस संवेदनशीलता की आड़ में जो राजनीतिक विमर्श गढ़ा जा रहा था, वह अब बिखरता दिख रहा है। आंदोलन की शुरुआत में यह स्पष्ट मांग थी कि शिक्षा मंत्री को पद छोड़ना होगा। जब सोनम वांगचुक की सेहत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल भेजा गया, तो सीजेपी प्रमुख अभिजीत दिपके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग तक उठा दी थी।

लेकिन सोमवार तड़के सीजेपी ने जो नया स्टैंड लिया, वह बहुत ही नरम है। अब उन्हें इस्तीफा नहीं, बल्कि सरकार से जवाबदेही और पीड़ित परिवारों के लिए 1-1 करोड़ रुपये का मुआवजा चाहिए। सीजेपी का कहना है कि जब तक न्याय नहीं मिलता आंदोलन जारी रहेगा, लेकिन सबसे बड़ी मांग से पीछे हटना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

सोनम वांगचुक की नई शर्तें और एग्जिट प्लान

23 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक का रुख भी अचानक बदल गया है। रविवार सुबह सफदरजंग अस्पताल से उन्होंने एक हस्तलिखित पत्र जारी किया, जिसमें 20 जुलाई को अनशन समाप्त करने का संकेत दिया गया है। लेकिन उनकी शर्तों में अब शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का जिक्र तक नहीं है।

उनकी पहली शर्त यह है कि सरकार पेपर लीक और शिक्षा प्रणाली की विफलता की जिम्मेदारी स्वीकार करे। दूसरी शर्त के अनुसार, यदि संसद के द्वार पर विभिन्न दलों के सांसद उन्हें यह आश्वासन दें कि वे इस मुद्दे को सदन के भीतर उठाएंगे, तो वे अनशन तोड़ देंगे। यदि उनकी सेहत अनुमति नहीं देती, तो सांसद अस्पताल आकर यह भरोसा दिला सकते हैं। इन शर्तों से स्पष्ट है कि जो आंदोलन आर-पार की लड़ाई का दावा कर रहा था, वह अब सम्मानजनक तरीके से पीछे हटने का रास्ता ढूंढ रहा है।

राजनीतिक रोटियां और विपक्ष की भूमिका

इस पूरे विरोध प्रदर्शन में जमकर राजनीति भी हुई। समाजवादी पार्टी की सांसद प्रिया सरोज ने जंतर-मंतर पर आकर खुले तौर पर अपना समर्थन दिया। विपक्ष को उम्मीद थी कि इस आंदोलन के जरिए सरकार को घेरा जा सकता है। लेकिन सरकार किसी भी राजनीतिक दबाव के आगे नहीं झुकी। सरकार अपने स्टैंड पर अडिग रही और अंततः प्रदर्शनकारियों को ही समझौता करना पड़ा।

सरकार के साथ संपर्क का रहस्य

सीजेपी ने दावा किया है कि संसद मार्च से ठीक पहले पहली बार सरकार ने उनसे संपर्क किया। हालांकि, इस बातचीत में क्या हुआ, इसे पूरी तरह गुप्त रखा गया है। लेकिन इस गोपनीय संपर्क के तुरंत बाद सीजेपी और वांगचुक का सरेंडर मोड में आना यह दर्शाता है कि सरकार ने अपना संदेश स्पष्ट रूप से उन तक पहुंचा दिया है।

अस्पताल की राजनीति और वीआईपी सुविधाओं की मांग

इस घटनाक्रम में एक मोड़ सफदरजंग अस्पताल में भी आया। दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर वांगचुक को वहां भर्ती कराया गया था। लेकिन उनकी पत्नी डॉक्टर गीतांजलि जे आंग्मो ने कोर्ट से मांग की कि उन्हें किसी प्राइवेट अस्पताल में शिफ्ट किया जाए। कोर्ट ने इस मांग को खारिज कर दिया। सरकारी शिक्षा व्यवस्था सुधारने की बात करने वाले आंदोलनकारियों का सरकारी अस्पताल पर अविश्वास जताना जनता के बीच चर्चा का विषय बन गया है।

आगे की राह क्या होगी?

बड़ा सवाल यह है कि क्या यह यू-टर्न केवल एक रणनीति है? देश के छात्र समझ रहे हैं कि पेपर लीक जैसी समस्याओं पर सरकार कड़े कानून और गिरफ्तारियों के जरिए एक्शन ले रही है। ऐसे में राजनीतिक एजेंडे के लिए मुद्दों को हाईजैक करने की कोशिशों को जनता बारीकी से देख रही है।

सीजेपी का रुख अब आक्रामक से रक्षात्मक हो गया है। छात्रों की मौत एक संवेदनशील विषय है, जिस पर राजनीति के बजाय समाधान की आवश्यकता है। सरकार का रुख स्पष्ट है कि सुधार किए जाएंगे, लेकिन दबाव में मंत्रियों के इस्तीफे का चलन शुरू नहीं किया जाएगा।

आज 20 जुलाई का दिन महत्वपूर्ण है क्योंकि संसद मार्च प्रस्तावित है। हालांकि, बदली हुई शर्तों को देखकर लगता है कि यह अब केवल एक प्रतीकात्मक विरोध बनकर रह जाएगा। कुल मिलाकर, जो आंदोलन एक बड़े तूफान की तरह उठा था, वह अब धीरे-धीरे शांत होने की दिशा में बढ़ रहा है।

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