हाइफा पोर्ट पर भारत के अरबों रुपये दांव पर: क्या सऊदी के एक फैसले से बदलेगी मिडिल ईस्ट की पूरी तस्वीर?

वैश्विक राजनीति की बिसात पर एक चाल पूरी रणनीतिक तस्वीर बदल सकती है। जब सितंबर 2023 में नई दिल्ली में G20 का भव्य शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ, तो दुनिया की नजरें एक मेगा प्रोजेक्ट पर टिकी थीं। भारत, अमेरिका, सऊदी अरब और यूरोप ने मिलकर एक ऐसे प्रोजेक्ट की नींव रखी थी, जिसने चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) की चिंता बढ़ा दी थी। इस गेम चेंजर प्रोजेक्ट का नाम था ‘इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर’ (IMEC)। यह सिर्फ एक व्यापारिक मार्ग नहीं था, बल्कि भारत की उभरती ग्लोबल पावर का प्रमाण था। लेकिन अब, इस मेगा प्रोजेक्ट में एक ऐसा भू-राजनीतिक भूचाल आने वाला है जिसकी कल्पना कम ही लोगों ने की थी। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) एक ऐसा दांव चलने की तैयारी में हैं जो इजरायल के साथ-साथ भारत के लिए भी बड़ी टेंशन की वजह बन सकता है।

मिडिल ईस्ट की इस नई कूटनीतिक बिसात को समझने के लिए IMEC के मूल प्लान को देखना जरूरी है। इस महत्वाकांक्षी योजना का मुख्य लक्ष्य भारत को अरब देशों के जरिए सीधे यूरोप से जोड़ना था। प्लान के अनुसार, भारतीय बंदरगाहों से माल जहाजों द्वारा संयुक्त अरब अमीरात (UAE) पहुंचता। वहां से हाई-स्पीड रेलवे नेटवर्क के जरिए सऊदी अरब और जॉर्डन होते हुए माल सीधे इजरायल पहुंचता। इजरायल का हाइफा पोर्ट इस रूट का सबसे रणनीतिक प्रवेश द्वार था, जहां से भूमध्य सागर पार करके माल ग्रीस और फिर पूरे यूरोप में सप्लाई किया जाता।

यह रूट न केवल समय बचाता बल्कि माल धुलाई की लागत भी कम करता। भारत के लिए यह एक मास्टरस्ट्रोक था, और इसी भविष्य को देखते हुए अडानी ग्रुप ने इजरायल के हाइफा पोर्ट का भारी निवेश कर अधिग्रहण किया था। भारत का विजन स्पष्ट था कि आगामी दशकों में वैश्विक व्यापार का केंद्र हाइफा पोर्ट ही होगा। उस समय सऊदी अरब और इजरायल के रिश्ते भी सुधार की दिशा में थे और अमेरिका इसमें अहम भूमिका निभा रहा था।

लेकिन इजरायल और गाजा के बीच छिड़े संघर्ष ने पूरे क्षेत्र की गतिशीलता बदल दी है। अरब देशों में जनता के गुस्से को वहां की सरकारें नजरअंदाज नहीं कर सकतीं। ‘द यरूशलम पोस्ट’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब अब इजरायल से दूरी बनाने पर विचार कर रहा है। गाजा और लेबनान के हालात को देखते हुए रियाद अब ऐसे किसी मेगा प्रोजेक्ट को आगे नहीं बढ़ाना चाहता जिसमें इजरायल की भूमिका केंद्रीय हो।

यहीं से MBS का नया प्लान शुरू होता है। सऊदी अरब अब IMEC प्रोजेक्ट से इजरायल को बाहर कर इसे सीरिया से गुजारने की योजना बना रहा है। इस योजना के तहत रेलवे लाइन जॉर्डन से सीधे सीरिया में प्रवेश करेगी और वहां से भूमध्य सागर तक एक नया लैंड ब्रिज बनाया जाएगा। यह सुनने में सऊदी की कूटनीतिक जीत लग सकती है, लेकिन धरातल पर यह काफी जटिल है।

अगर यह प्लान लागू होता है, तो यह इजरायल के लिए एक बड़ा रणनीतिक झटका होगा। इजरायल ने खुद को यूरोप और एशिया के बीच एक सुरक्षित पुल के रूप में प्रस्तुत किया था, लेकिन सीरिया की एंट्री उसके अरमानों पर पानी फेर सकती है।

भारत के लिए इसकी चिंता सबसे अधिक है। भारत ने इस प्रोजेक्ट में न केवल पैसा बल्कि अपना वैश्विक रसूख भी निवेश किया है। अडानी ग्रुप द्वारा हाइफा पोर्ट में किया गया करोड़ों-अरबों का निवेश सीधे खतरे में पड़ जाएगा यदि मार्ग को सीरिया की तरफ मोड़ दिया गया। यह केवल एक व्यापारिक नुकसान नहीं, बल्कि भारत के उस विजन पर प्रहार होगा जो उसने भूमध्य सागर में अपनी पैठ जमाने के लिए बनाया था।

दूसरी बड़ी समस्या सीरिया की अस्थिरता है। सीरिया दशकों से गृहयुद्ध झेल रहा है और वहां बुनियादी ढांचा पूरी तरह नष्ट हो चुका है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि सीरिया में उभर रहा नया नेतृत्व, जैसे अहमद अल-शरा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संदिग्ध रहा है। हालांकि वह अपनी छवि सुधारने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन भारत जैसी जिम्मेदार शक्ति के लिए ऐसे शासन पर भरोसा करना कतई आसान नहीं होगा।

भारत की विदेश नीति हमेशा ‘जीरो टॉलरेंस अगेंस्ट टेररिज्म’ की रही है। ऐसे में सीरिया के रास्ते अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित करना एक बहुत बड़ा जोखिम होगा। भारत किसी ऐसे देश पर अपने ग्लोबल ट्रेड के लिए निर्भर नहीं रह सकता जहां रातों-रात व्यवस्थाएं बदल जाती हों।

हालांकि, आज का भारत केवल दूसरों के फैसलों का इंतजार नहीं करता। नई दिल्ली में इसको लेकर उच्च स्तरीय रणनीतियों पर काम शुरू हो चुका होगा। पीएम मोदी की सऊदी और यूएई के नेताओं के साथ व्यक्तिगत कूटनीति बहुत मजबूत है। भारत सऊदी अरब को यह समझाने का प्रयास करेगा कि सीरिया का विकल्प पूरे प्रोजेक्ट की स्थिरता के लिए बड़ा रिस्क है।

भारत के पास इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) जैसे अन्य विकल्प भी हैं, लेकिन सऊदी का यह नया रुख वैश्विक भू-राजनीति में नेशनल इंटरेस्ट की प्राथमिकता को दर्शाता है। MBS जानते हैं कि भारत जैसी विशाल अर्थव्यवस्था को नाराज कर कोई भी ग्लोबल प्रोजेक्ट सफल नहीं हो सकता।

आने वाले महीने इस प्रोजेक्ट के भविष्य के लिए निर्णायक होंगे। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सऊदी अरब वाकई इजरायल को बाईपास कर सीरिया के साथ जाने का जोखिम उठाएगा और भारत इस कूटनीतिक चक्रव्यूह का क्या काट निकालता है।

 

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