न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय एक बार फिर दुनिया की सबसे बड़ी कूटनीतिक जंग का केंद्र बनने जा रहा है। एक तरफ भारत है, जो दुनिया की तेजी से उभरती महाशक्ति और ‘ग्लोबल साउथ’ की सशक्त आवाज है, तो दूसरी तरफ उन गुटों की घेराबंदी है जो भारत के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय कदमों को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर 10 जुलाई को न्यूयॉर्क पहुंच रहे हैं, और इसी के साथ उस महा-अभियान का आगाज होगा जो भविष्य की वैश्विक कूटनीति की दिशा तय करेगा। भारत साल 2028-29 के कार्यकाल के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की अस्थायी सीट के लिए अपना दावा मजबूती से पेश करने जा रहा है। हालांकि, यह लड़ाई सिर्फ एक सीट की नहीं, बल्कि भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव की है, जिसे चुनौती देने के लिए पूरा इस्लामिक ब्लॉक (OIC) एकजुट हो गया है।
कूटनीति के चक्रव्यूह में भारत बनाम ताजिकिस्तान
इस बार यूएनएससी की रेस काफी रोचक और चुनौतीपूर्ण है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र से ताजिकिस्तान ने भारत के सामने अपनी दावेदारी रखी है। ताजिकिस्तान को छोटा देश समझकर नजरअंदाज करना भूल होगी, क्योंकि इसके पीछे वे बड़ी ताकतें हैं जो वैश्विक मंच पर भारत के दबदबे से असहज हैं। इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) ने आधिकारिक तौर पर ताजिकिस्तान का समर्थन किया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि ताजिकिस्तान के साथ अब दुनिया के 57 मुस्लिम देशों का समर्थन है। यह एक ऐसी कूटनीतिक लामबंदी है जिसका सामना करने के लिए भारत को अपनी सबसे धारदार रणनीति अपनानी होगी। 57 देशों का यह समूह महासभा में वोटिंग के दौरान पासा पलटने की क्षमता रखता है, जिससे यह मुकाबला भारत की कूटनीतिक परीक्षा बन गया है।
महाशक्तियों का समर्थन और जयशंकर की रणनीति
ताजिकिस्तान के पास भले ही 57 देशों का समूह हो, लेकिन दिल्ली की कूटनीति ने भी दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों को अपने पाले में कर लिया है। भारत की दावेदारी को अमेरिका का स्पष्ट समर्थन प्राप्त है। इसके अलावा ऑस्ट्रिया, श्रीलंका और फिजी जैसे देशों ने भी भारत के पक्ष में आवाज उठाई है। विदेश मंत्री एस जयशंकर इस चुनौती को गंभीरता से ले रहे हैं, इसीलिए वे पिछले कई महीनों से दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों का सघन दौरा कर रहे हैं। न्यूयॉर्क पहुंचने से पहले जयशंकर बहरीन, कुवैत और ओमान जैसे खाड़ी देशों के नेतृत्व से बातचीत कर रहे हैं। इससे पहले वे कतर और कैरिबियन देशों का दौरा कर चुके हैं। जयशंकर की यह रणनीति सीधे तौर पर OIC ब्लॉक के भीतर सेंध लगाने और भारत के पुराने सहयोगियों को साथ बनाए रखने की कोशिश है।
ग्लोबल साउथ का मसीहा और वैश्विक अस्थिरता
यह कूटनीतिक जंग ऐसे समय में हो रही है जब पूरी दुनिया संकटों से घिरी है। ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने मध्य पूर्व को अस्थिर कर दिया है, जिसका प्रभाव ‘ग्लोबल साउथ’ के विकासशील देशों पर पड़ रहा है। कच्चे तेल की कीमतें, फर्टिलाइजर संकट और ध्वस्त होती सप्लाई चेन के बीच भारत ही वह देश है जो इन विकासशील देशों की आवाज उठा रहा है। भारत लगातार सुरक्षा परिषद में सुधारों की मांग कर रहा है ताकि इसे आज की वास्तविकताओं के अनुरूप बनाया जा सके। हालांकि, मई में इबोला संकट के कारण ‘इंडिया-अफ्रीका फोरम समिट’ का टलना भारत के लिए एक छोटी बाधा रही, लेकिन भारत अपनी रणनीतिक बातचीत को जारी रखे हुए है।
एससीओ समिट और किर्गिस्तान की जीत से सबक
आगामी दिनों में किर्गिस्तान में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का शिखर सम्मेलन होने वाला है, जहां भारत और ताजिकिस्तान दोनों ही सदस्य के रूप में मौजूद रहेंगे। वहां चलने वाली परदे के पीछे की कूटनीति इस मुकाबले को नया मोड़ दे सकती है। इस रेस को समझने के लिए जून 2026 के यूएनएससी चुनावों को देखना होगा, जहां किर्गिस्तान ने फिलीपींस को भारी अंतर (142 बनाम 49 वोट) से हराया था। यह जीत दर्शाती है कि यूक्रेन संकट और युद्ध के बीच छोटे देश भी मजबूत क्षेत्रीय गठबंधनों के जरिए बड़े उलटफेर कर सकते हैं। भारत इन जमीनी हकीकतों को ध्यान में रखकर न्यूयॉर्क में अपना कैंपेन लॉन्च कर रहा है, जिससे दुनिया को संदेश दिया जा सके कि सुरक्षा परिषद में भारत का होना शोषित और विकासशील देशों के हक की जीत होगी।

