जब पूरी दुनिया युद्ध की विभीषिका और महाशक्तियों के आपसी टकराव में फंसी हुई है, जब अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के साथ ग्लोबल ट्रेड वॉर की आशंका बढ़ गई है और ईरान के साथ सैन्य तनाव से वैश्विक सप्लाई चेन चरमरा रही है, ठीक उसी समय भारत ने बेहद शांत रहकर अपने भविष्य को अगले सौ वर्षों के लिए सुरक्षित करने का अभूतपूर्व काम किया है। इसे राष्ट्रहित की वह दूरगामी कूटनीति कहा जाता है, जो बिना किसी शोर-शराबे के दुश्मन की रणनीति को विफल कर देती है। एक तरफ वैश्विक मीडिया मिडिल ईस्ट के मिसाइल हमलों और समुद्री कोहराम को कवर करने में व्यस्त था, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पर्दे के पीछे से भारत के इतिहास के सबसे गुप्त और महत्वपूर्ण मिशन को अंजाम दे दिया। इस ‘ग्रेट मिनरल ऑफेंसिव’ मिशन के तहत भारत ने दुनिया के 35 शक्तिशाली और संसाधन संपन्न देशों को एक साथ लाकर ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ का एक ऐसा वैश्विक ग्रिड तैयार किया है, जिसने चीन के खतरनाक आर्थिक साम्राज्य की जड़ों को हिला दिया है। आज डीकैन लाइन पर हम भारत के इस महा-अभियान के उस सच को उजागर करेंगे, जो भारत को आने वाले दशकों के लिए एक अजेय महाशक्ति बनाने की क्षमता रखता है।
आखिर ये क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ एलिमेंट्स क्या हैं और क्यों इनके लिए दुनिया भर में होड़ मची है? इसे सरल भाषा में समझें तो आज के हाई-टेक दौर में स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) बैटरी, फाइटर जेट रडार, सेमीकंडक्टर चिप्स और अंतरिक्ष अनुसंधान के उपकरणों को बनाने के लिए कुछ विशेष दुर्लभ खनिजों की जरूरत होती है। लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, ग्रेफाइट और कॉपर जैसे खनिज आज किसी भी देश की आर्थिक संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए मुख्य ईंधन बन चुके हैं। कड़वी हकीकत यह थी कि इन दुर्लभ तत्वों की रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग मार्केट पर चीन का करीब 80 से 90 प्रतिशत तक कब्जा था, जिसका इस्तेमाल वह दुनिया को ब्लैकमेल करने के लिए करता था। भारत ने अब चीन के इसी एकाधिकार को सीधी चुनौती दे दी है।
पर्दे के पीछे मोदी का महा-अभियान: 24 महीने और 35 देशों का साथ
जून 2024 में तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कर दिया था कि भविष्य के युद्ध केवल सीमाओं पर ही नहीं, बल्कि तकनीक और संसाधनों के आधार पर लड़े जाएंगे। इसी सोच के साथ उन्होंने अपने विदेशी दौरों को कूटनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले 24 महीनों में भारत ने दुनिया के 35 देशों को एक साझा ग्रिड से जोड़ने में सफलता प्राप्त की है। इस अभियान के तहत अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे 24 देशों के साथ ठोस सहयोग समझौतों पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त, चिली, जाम्बिया, कजाकिस्तान और इंडोनेशिया जैसे 11 अन्य महत्वपूर्ण देशों के साथ बातचीत अपने अंतिम चरण में है।
यह भारत का वह रणनीतिक चक्रव्यूह है जिसने यूरोप, अफ्रीका और मध्य एशिया से लेकर समुद्री पड़ोसी इंडोनेशिया तक भारत का प्रभाव स्थापित कर दिया है। भारत अब केवल कच्चा माल खरीदने वाला देश नहीं रहा, बल्कि वह माइनिंग, प्रोसेसिंग और तकनीक हस्तांतरण के क्षेत्र में एक लचीली सप्लाई चेन खड़ी कर रहा है। हाल ही में इंडोनेशिया के साथ स्टील, निकेल और रेयर अर्थ मैग्नेट्स के निर्माण को लेकर हुए ऐतिहासिक समझौते चीन के ग्लोबल मार्केट शेयर को करारा जवाब हैं।
नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन: आत्मनिर्भरता का 7 साल का रोडमैप
भारत केवल वैश्विक स्तर पर ही सक्रिय नहीं है, बल्कि घरेलू स्तर पर भी आत्मनिर्भरता का किला बना रहा है। सरकार ने साल 2024-25 से 2030-31 तक के लिए ‘नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन’ (NCMM) की नींव रखी है। यह केवल एक माइनिंग प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य की ओर बढ़ाया गया ठोस कदम है। इस मिशन के तहत देश के भीतर मौजूद लिथियम और अन्य दुर्लभ खनिजों को निकालने के लिए सैकड़ों ब्लॉक की नीलामी की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
इसके साथ ही, भारत में क्रिटिकल मिनरल्स प्रोसेसिंग पार्क्स और सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस स्थापित किए जा रहे हैं। सरकार ने ई-वेस्ट और पुरानी बैटरियों की रिसाइक्लिंग के जरिए कीमती खनिज दोबारा प्राप्त करने के लिए भारी प्रोत्साहन योजनाओं को लागू किया है। भारत का लक्ष्य अपनी इंडस्ट्री को इतना सक्षम बनाना है कि भविष्य में किसी विदेशी शक्ति के सामने निर्भर न रहना पड़े। जब वैश्विक स्तर पर ऊर्जा और रसद की लागत बढ़ रही है, तब भारत का यह मिशन देश की रक्षा और ऊर्जा जरूरतों के लिए एक सुरक्षा कवच का काम कर रहा है।
चीन के वर्चस्व का अंत और भारत का नया वैश्विक कद
अब तक क्रिटिकल मिनरल्स के निर्यात में चीन का दबदबा था, लेकिन भारत के इस 35 देशों के महा-ग्रिड और ‘ग्रेट मिनरल ऑफेंसिव’ के बाद समीकरण बदल रहे हैं। भारत ने अमेरिका के साथ खनिज ढांचे पर हस्ताक्षर किए हैं, नीदरलैंड के साथ सेमीकंडक्टर तकनीक पर समझौता किया है और ‘खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड’ (KABIL) के माध्यम से अर्जेंटीना और जाम्बिया में लिथियम और कॉपर के ब्लॉक हासिल करना शुरू कर दिया है।
यह उभरते भारत का वह आक्रामक रूप है जिसका लोहा आज पूरी दुनिया मान रही है। भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना जानता है। महाशक्तियां आपस में उलझी रह सकती हैं, लेकिन भारत ने 35 देशों के सहयोग से अपनी तरक्की को बुलेट ट्रेन की रफ्तार दे दी है। आत्मनिर्भरता का यह मिशन न केवल विकास को गति दे रहा है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी सुरक्षित कर रहा है।

