सिंधु जल संधि पर भारत का कड़ा रुख: पानी के लिए तरसते पाकिस्तान को अब याद आई अपनी प्राचीन वैदिक जड़ें

जब कोई राष्ट्र अपनी वास्तविक जड़ों को विस्मृत कर विदेशी आक्रांताओं में अपना गौरव ढूंढने लगता है, तो उसकी परिणति वही होती है जो आज पाकिस्तान की हो रही है। इतिहास इस बात का प्रमाण है कि जो कौम उधार की पहचान पर जीवित रहती है, वह एक न एक दिन वैश्विक मंच पर बेनकाब अवश्य होती है। अप्रैल 2025 में भारत द्वारा लिए गए एक ऐतिहासिक और कठोर निर्णय ने इस्लामाबाद से लेकर रावलपिंडी के सैन्य मुख्यालयों तक हलचल पैदा कर दी है। भारत ने दशकों पुरानी सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) को निलंबित करने का साहसिक कदम उठाया है। पानी की एक-एक बूंद के लिए मोहताज पाकिस्तान को अब अचानक अपनी उस प्राचीन सभ्यता का बोध होने लगा है, जिसे उसने स्वयं ही कट्टरपंथ की अग्नि में स्वाहा कर दिया था। आज हम पाकिस्तान के उसी पाखंड का विश्लेषण करेंगे, जो उसकी पहचान के संकट को उजागर करता है।

पाकिस्तान का पहचान संकट और ऐतिहासिक झूठ

पाकिस्तान संभवतः विश्व का एकमात्र ऐसा देश है जो अपने जन्म के समय से ही पहचान के गंभीर संकट (Identity Crisis) से जूझ रहा है। 1947 में धर्म के आधार पर एक भौगोलिक इकाई तो निर्मित हो गई, किंतु समस्या यह थी कि वे अपना इतिहास कहां से लाएं? परिणामस्वरूप, पाकिस्तान के नीति-निर्धारकों ने अपने इतिहास को अरब, तुर्क और अफगान हमलावरों के साथ जोड़ना प्रारंभ कर दिया। वहां की शिक्षा व्यवस्था में यह सिखाया जाता है कि उनका इतिहास 712 ईस्वी में मुहम्मद बिन कासिम के सिंध आक्रमण से आरंभ होता है। यह अत्यंत विडंबनापूर्ण है कि जो भूमि प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता, गौरवशाली वैदिक संस्कृति और गांधार कला का उद्गम स्थल रही हो, वह अपनी मूल विरासत को त्यागकर विदेशी लुटेरों में अपना नायक ढूंढ रही है।

वहां की सरकारों ने निरंतर इस सत्य को दबाने का प्रयास किया कि इस क्षेत्र का इतिहास हजारों वर्ष पुराना और वैभवशाली है। सिंधु घाटी सभ्यता के पश्चात यही भूमि सप्त सिंधु क्षेत्र के रूप में वैदिक संस्कृति का केंद्र बनी। तक्षशिला जैसा विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालय इसी मिट्टी पर था, जहां आचार्य चाणक्य और महर्षि पाणिनी ने विश्व को ज्ञान का मार्ग दिखाया। परंतु पाकिस्तान ने इस स्वर्णिम इतिहास पर कट्टरपंथ का पर्दा डाल दिया। अब जब भारत ने सिंधु नदी के जल पर अपना कूटनीतिक और कानूनी नियंत्रण कड़ा किया है, तो पाकिस्तान ने नया प्रपंच रचना शुरू किया है कि वही सिंधु घाटी सभ्यता का वास्तविक उत्तराधिकारी है। जल संकट और कूटनीतिक पराजय ने उसे यह कहने पर विवश कर दिया है कि सिंधु नदी पर उसका सभ्यतागत अधिकार है।

आक्रांताओं के नाम पर शस्त्र: मानसिक गुलामी का प्रमाण

पाकिस्तान का यह दोहरा चरित्र अब विश्व के समक्ष स्पष्ट हो चुका है। यह एक ऐसा विरोधाभास है जो उनकी वैचारिक पराधीनता को सिद्ध करता है। एक ओर पाकिस्तान स्वयं को उपमहाद्वीप की प्राचीन सभ्यता का वारिस बताता है, तो दूसरी ओर अपनी मिसाइलों और टैंकों के नाम उन विदेशी हमलावरों के नाम पर रखता है जिन्होंने इसी भूमि को लूटा, मंदिरों को ध्वस्त किया और रक्तपात मचाया।

पाकिस्तान के मिसाइल कार्यक्रम का अवलोकन करें तो स्पष्ट होता है कि जिया-उल-हक के समय से ही सेना के मानस में कट्टरपंथी पहचान भर दी गई है। उनकी प्रत्येक मिसाइल भारतीय उपमहाद्वीप पर हुए किसी न किसी विदेशी आक्रमण की स्मृति दिलाती है। हत्फ-2 मिसाइल का नाम ‘अब्दाली’ रखा गया है, जो उस अहमद शाह अब्दाली का प्रतिनिधित्व करता है जिसने 18वीं शताब्दी में भारत पर बर्बर हमले किए और अकूत संपदा लूटी।

इतना ही नहीं, हत्फ-3 का नाम ‘गजनवी’ है, जो उस तुर्क लुटेरे महमूद गजनवी की याद दिलाता है जिसने सोमनाथ मंदिर को अपवित्र कर खंडित किया था। जिस आक्रांता ने इस क्षेत्र की मूल संस्कृति को मिटाने का प्रयास किया, पाकिस्तान उसे अपना गौरव मानता है। इसी प्रकार हत्फ-5 का नाम ‘गौरी’ और हत्फ-7 का नाम ‘बाबर’ रखा गया है, जो मध्य एशियाई शासक थे।

चरम सीमा तो तब हुई जब पाकिस्तान ने अपनी क्रूज मिसाइल का नाम ‘तैमूर’ रखा। तैमूर लंग वही क्रूर शासक था जिसने 1398 में दिल्ली में भीषण नरसंहार किया था। ऐसे हत्यारों के नाम पर अपनी रक्षा प्रणाली का नामकरण करने वाला देश किस आधार पर सभ्यतागत विरासत का दावा कर सकता है? यह पूर्णतः एक मानसिक दिवालियेपन का उदाहरण है।

विदेशी प्रतीकों का मोह और अपनी जड़ों से विमुखता

पाकिस्तान के सैन्य तंत्र में अरबी शब्दावली और विदेशी इस्लामी इतिहास के प्रति एक असामान्य मोह दिखता है। उनके अधिकांश सैन्य प्रोजेक्ट विदेशी पहचान से जुड़े हैं। नौसेना के युद्धपोत ‘जुल्फिकार’ से लेकर टैंक ‘अल-खालिद’ और ‘अल-जरार’ तक, सभी नाम अरब कमांडरों के सम्मान में रखे गए हैं।

अपनी इसी संकीर्ण सोच के कारण पाकिस्तान ने उन महान हिंदू, बौद्ध और सिख परंपराओं के अवशेषों को मिटा दिया जो कभी वहां की आत्मा थीं। महाराजा रणजीत सिंह का साम्राज्य लाहौर से संचालित होता था, परंतु आज के पाकिस्तान में उनके लिए कोई सम्मानजनक स्थान नहीं है। उन्होंने अपने उन पूर्वजों को अस्वीकार कर दिया जिनका धर्म परिवर्तन कर उन्हें लूटा गया था, और उन्हीं लुटेरों को अपना आदर्श बना लिया।

भारत का निर्णय और पाकिस्तान के लिए चेतावनी

आज जब दिल्ली ने कूटनीतिक रूप से अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया है और पाकिस्तान पर जल संकट मंडरा रहा है, तब वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘सिंधु सभ्यता के रक्षक’ होने का नाटक कर रहा है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या पाकिस्तान में अपनी इन मिसाइलों का नाम बदलकर चाणक्य या पोरस के नाम पर रखने का साहस है? क्या वहां की सेना यह स्वीकार करेगी कि उनका इतिहास इस्लाम के आगमन से बहुत पहले का है?

भारत का दृष्टिकोण अब पूर्णतः स्पष्ट है: ‘आतंकवाद और पानी एक साथ नहीं बह सकते।’ भारत ने सिंधु जल संधि पर अपना कड़ा रुख अपनाकर पाकिस्तान को उसके ही विरोधाभासों के जाल में फंसा दिया है। पाकिस्तान को अब यह चुनाव करना होगा कि वह स्वयं को लुटेरों का वंशज मानता है या फिर उस महान सिंधु-वैदिक संस्कृति का हिस्सा, जिसे वह वर्षों तक नकारता रहा। भारत के इस मास्टरस्ट्रोक ने पाकिस्तान की ‘उधार की विरासत’ की नींव हिला दी है, और अब उसे अपने ही कर्मों का फल भुगतना होगा।

Share This Article
Leave a Comment