अगर आपको दुनिया पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना है, तो उस संसाधन पर नियंत्रण पाना आवश्यक है जिसके बिना आधुनिक तकनीक अधूरी है। इसी रणनीति का उपयोग करते हुए चीन ने दशकों से वैश्विक बाजार पर अपना दबदबा बनाए रखा है। रेयर अर्थ मेटल्स (दुर्लभ खनिज) का वह बेशकीमती खजाना, जिस पर चीन ने अपनी पकड़ इतनी मजबूत कर ली है कि अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देश भी उसके आगे लाचार महसूस करते हैं। हमारे स्मार्टफोन से लेकर फाइटर जेट्स, इलेक्ट्रिक वाहन और सैटेलाइट्स तक, सब कुछ इन्हीं खनिजों पर निर्भर हैं। लेकिन अब इस वैश्विक समीकरण में भारत की एक शक्तिशाली एंट्री हुई है। भारत ने अब केवल बचाव की नीति छोड़कर सीधा प्रहार करने का फैसला किया है, जिससे चीन के आर्थिक और तकनीकी वर्चस्व को कड़ी चुनौती मिलने वाली है।
भारत की यह ऐतिहासिक रणनीतिक खोज दुनिया के सबसे दुर्गम और ठंडे इलाकों में से एक में जाकर पूरी हुई है। यह एक ऐसा स्थान है जहां का तापमान मानव सहनशक्ति की सीमा से बाहर है। वर्तमान में भू-राजनीतिक गलियारों में दो मुख्य चर्चाएं हैं: पहला यह कि भारत किस तरह चीन के इस खतरनाक एकाधिकार को समाप्त करेगा? और दूसरा, वह कौन सा भरोसेमंद मित्र है जो अपनी धरती के इस बहुमूल्य खजाने की चाबी भारत को सौंपने जा रहा है? इन दोनों सवालों का केंद्र है—रूस का बर्फीला साइबेरिया।
रूस ने आधिकारिक तौर पर भारत को अपने साखा याकुटिया गणराज्य स्थित ‘टॉमटोर रेयर अर्थ मेटल्स डिपॉजिट’ तक पहुंच प्रदान करने का एक ऐतिहासिक प्रस्ताव दिया है। यह खबर सामान्य नहीं है, बल्कि इसने लंदन से लेकर न्यूयॉर्क तक के कमोडिटी मार्केट में हलचल पैदा कर दी है और बीजिंग की चिंता बढ़ा दी है। इस मिशन को धरातल पर उतारने के लिए भारत की ‘इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड’ (IREL) और रूस की दिग्गज ऊर्जा कंपनी ‘रोसनेफ्ट’ के बीच उच्च स्तरीय वार्ता जारी है। शुरुआत में इस खदान से खनिजों के सैंपल लेकर उनकी गुणवत्ता की जांच करने का खाका तैयार किया जा चुका है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह प्रोजेक्ट 21वीं सदी में भारत की सबसे बड़ी तकनीकी और रणनीतिक जीत साबित हो सकता है।
इस विषय की गंभीरता को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि ‘रेयर अर्थ मेटल्स’ आखिर क्या हैं। यह 17 विशेष खनिजों का एक समूह है जो पृथ्वी की सतह पर बहुत ही कम और बिखरे हुए रूप में पाए जाते हैं। इन्हें निकालना और शुद्ध करना एक अत्यंत जटिल और महंगी प्रक्रिया है। इन्हें आधुनिक युग का ‘नया तेल’ कहा जाता है। विंड टर्बाइन, मेडिकल लेजर, सैन्य रडार और स्पेस सैटेलाइट्स में इनका बड़े पैमाने पर उपयोग होता है। संक्षेप में कहें तो, इनके बिना भविष्य की तकनीक की कल्पना करना असंभव है। यही कारण है कि जिस भी देश का इन पर नियंत्रण होगा, वही वैश्विक अर्थव्यवस्था पर राज करेगा।
पिछले कई दशकों से इस अरबों डॉलर के बाजार पर चीन का एकतरफा राज रहा है। 1990 के दशक से ही चीन ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत इन खनिजों के खनन और प्रोसेसिंग तकनीक पर भारी निवेश किया। उस समय पश्चिमी देशों ने इस पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि चीन सस्ते दामों पर इनकी आपूर्ति कर रहा था। आज आलम यह है कि दुनिया की कुल आपूर्ति का लगभग 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा सीधे चीन से आता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि चीन इन खनिजों का उपयोग एक कूटनीतिक हथियार के रूप में करता है। साल 2010 में जापान के साथ विवाद होने पर चीन ने निर्यात रोक दिया था, जिससे जापान की पूरी इलेक्ट्रॉनिक इंडस्ट्री संकट में आ गई थी। अमेरिका और यूरोप भी समय-समय पर चीन की इस ब्लैकमेलिंग नीति का शिकार हुए हैं। इसके बाद से ही दुनिया चीन का विकल्प तलाश रही थी, और अब भारत उस विकल्प के रूप में उभर रहा है।
भारत के लिए चीन पर यह निर्भरता एक गंभीर सुरक्षा चुनौती रही है। वर्तमान में भारत इलेक्ट्रिक वाहन (EV), सोलर पावर और स्वदेशी रक्षा उपकरणों के निर्माण पर जोर दे रहा है। आत्मनिर्भर भारत और सेमीकंडक्टर हब बनने के सपने को पूरा करने के लिए इन खनिजों की निरंतर आपूर्ति अनिवार्य है। वर्तमान में भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा चीन से आयात करता है। यदि भविष्य में कोई सीमा विवाद गहराता है और चीन आपूर्ति बाधित करता है, तो भारत के कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स रुक सकते हैं। इसीलिए भारत अब अपनी खुद की सुरक्षित सप्लाई चेन बनाने पर काम कर रहा है।
इस कठिन परिस्थिति में रूस का प्रस्ताव भारत के लिए एक मास्टरस्ट्रोक है। टॉमटोर डिपॉजिट दुनिया के सबसे बड़े रेयर अर्थ स्रोतों में से एक है। साइबेरिया के इस इलाके में तापमान शून्य से 60 डिग्री नीचे चला जाता है, जिससे वहां अकेले खनन करना रूस के लिए भी कठिन रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, 2025 तक इस प्रोजेक्ट का नियंत्रण ‘रोसनेफ्ट’ के पास होगा। रूस को एक ऐसे विश्वसनीय पार्टनर की तलाश थी जो तकनीक और निवेश के साथ लंबे समय तक साथ दे सके, और भारत से बेहतर मित्र रूस के लिए कोई और नहीं हो सकता।
दोनों देशों के बीच बनी योजना के अनुसार, शुरुआती प्रोसेसिंग रूस में होगी और फिर गहन वैज्ञानिक जांच के लिए सैंपल भारत भेजे जाएंगे। आईआरईएल (IREL) के विशेषज्ञ इनका बारीकी से अध्ययन करेंगे कि इनसे कौन सी धातुएं कितनी मात्रा में निकाली जा सकती हैं। पूरी संतुष्टि के बाद ही अरबों डॉलर के निवेश और रणनीतिक सहयोग पर अंतिम मुहर लगेगी। यह दर्शाता है कि भारत अब ठोस तथ्यों के आधार पर ही अपने कदम आगे बढ़ा रहा है।
रूस द्वारा भारत को यह चाबी सौंपने के पीछे गहरे आर्थिक और भू-राजनीतिक कारण हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस को अपनी अर्थव्यवस्था के लिए नए बाजारों की आवश्यकता है। भारत जैसा बड़ा और स्थिर बाजार रूस के लिए सबसे सुरक्षित विकल्प है। इस साझेदारी से रूस अपनी बंद पड़ी खनिज परियोजनाओं को पुनर्जीवित कर सकेगा और एशिया में अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करेगा।
यदि यह प्रोजेक्ट सफल होता है, तो इसके वैश्विक प्रभाव दूरगामी होंगे। यह केवल दो देशों का व्यापार नहीं, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन में एक बड़ा बदलाव होगा। चीन की ब्लैकमेलिंग से परेशान देशों के लिए भारत एक नया और सुरक्षित सप्लायर बनकर उभरेगा। इससे न केवल भारत की जरूरतें पूरी होंगी, बल्कि वह दुनिया को निर्यात करने की स्थिति में भी आ जाएगा, जिससे चीन का एकाधिकार समाप्त होगा।
भविष्य के लिहाज से यह समझौता भारत को खनन और प्रोसेसिंग की उन्नत तकनीक में महारत दिलाएगा। अभी तक प्रोसेसिंग तकनीक पर केवल चीन का वर्चस्व था, लेकिन रूस के साथ काम करके भारत खुद की विशाल प्रोसेसिंग इकाइयां विकसित कर पाएगा। आने वाले समय में भारत और रूस अफ्रीका या लैटिन अमेरिका में भी संयुक्त उत्खनन कर सकते हैं।
एक अनुमान के अनुसार, अगले दशक में इन खनिजों की मांग 400 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी। भारत ने इस अवसर और खतरे को पहले ही पहचान लिया है। हालांकि भारत ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अमेरिका के देशों से भी बात कर रहा है, लेकिन रूस का टॉमटोर प्रोजेक्ट गेम-चेंजर साबित होगा। यह स्पष्ट है कि नया भारत अब केवल दर्शक नहीं है, बल्कि वैश्विक व्यवस्था को बदलने की क्षमता रखता है। चीन का घमंड टूटने का समय आ गया है, और इसकी शुरुआत साइबेरिया की बर्फ के नीचे से हो चुकी है।

