मध्य पूर्व की राजनीति में हमेशा से ही शह-मात का एक रहस्यमयी खेल चलता रहा है, लेकिन हालिया खुलासे ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। एक तरफ दुनिया के सामने शांति का ढोंग करना और दूसरी तरफ अपनी सेना को मुनाफे के लिए किराए पर देना—यही पाकिस्तान की नई रणनीति नजर आ रही है। गंभीर आर्थिक संकट और वेंटिलेटर पर टिकी अर्थव्यवस्था के बीच, इस्लामाबाद की इस सैन्य साजिश ने वैश्विक सुरक्षा विशेषज्ञों को चौंका दिया है। टॉप सीक्रेट रिपोर्ट्स से पता चला है कि खुद को ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ बताने वाला पाकिस्तान असल में सऊदी अरब के रेगिस्तानों में अपनी भारी फौज और आधुनिक हथियारों का जखीरा तैनात कर चुका है।
ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान अब तक तटस्थता का नाटक कर रहा था। वहां के नेता और विदेश मंत्रालय वैश्विक मंचों पर यह दावा कर रहे थे कि वे क्षेत्र में शांति बहाली के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन पर्दे के पीछे की सच्चाई यह है कि इस्लामाबाद ने तेहरान को अंधेरे में रखकर सऊदी अरब के साथ एक गुप्त रक्षा समझौता किया है। इस समझौते के तहत पाकिस्तान ने अपनी सैन्य संप्रभुता को एक तरह से रियाद के हाथों गिरवी रख दिया है।
खुफिया आंकड़ों के मुताबिक, पाकिस्तान ने गुपचुप तरीके से करीब 8,000 से अधिक जांबाज कमांडो और सैनिकों को सऊदी अरब भेज दिया है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान की वायुसेना का एक पूरा स्क्वाड्रन, जिसमें चीन निर्मित जेएफ-17 (JF-17) थंडर फाइटर जेट्स शामिल हैं, अप्रैल की शुरुआत से ही सऊदी एयरबेस पर तैनात है। निगरानी और हमलों के लिए ड्रोन के दो अलग स्क्वाड्रन भी सक्रिय कर दिए गए हैं, जो सऊदी अरब की सीमा पर तैनात हैं।
इस तैनाती का सबसे घातक हिस्सा चीन का ‘HQ-9’ एयर डिफेंस सिस्टम है, जिसे पाकिस्तान ने सऊदी अरब में इंस्टॉल किया है। यह सिस्टम लंबी दूरी की मिसाइलों को हवा में ही नष्ट करने में सक्षम है। सवाल यह है कि कंगाली की कगार पर खड़ा देश इतनी बड़ी तैनाती का खर्च कैसे उठा रहा है? हकीकत यह है कि इस पूरी सैन्य मशीनरी की फंडिंग सीधे तौर पर सऊदी अरब कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसे ‘मर्सिनरी आर्मी’ या किराए की फौज कहा जाता है, जहां एक देश के सैनिक दूसरे देश के लिए पैसों के बदले लड़ते हैं।
इस सौदे की सबसे खतरनाक शर्त है—’परमाणु सुरक्षा छतरी’ (Nuclear Umbrella)। लीक हुए दस्तावेजों और पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के संकेतों से पता चलता है कि पाकिस्तान ने सऊदी अरब को वचन दिया है कि यदि ईरान या कोई अन्य देश उस पर बड़ा हमला करता है, तो पाकिस्तान अपने परमाणु हथियारों का उपयोग सऊदी की रक्षा के लिए करेगा। एक दिवालिया देश द्वारा अपनी परमाणु शक्ति का इस तरह से सौदा करना वैश्विक सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह तैनाती केवल रक्षात्मक नहीं है। सऊदी अरब में मौजूद पाकिस्तानी फोर्स वहां की सेना को ट्रेनिंग देने के साथ-साथ ईरान के खिलाफ संभावित युद्ध के लिए मोर्चा तैयार कर रही है। पाकिस्तान अपनी सेना को एक ऐसे क्षेत्रीय संघर्ष में झोंक रहा है, जिससे उसके अपने नागरिकों का कोई लेना-देना नहीं है।
भविष्य की योजनाएं और भी बड़ी हैं। सरकारी सूत्रों के अनुसार, इस समझौते के तहत सऊदी अरब में कुल 80,000 पाकिस्तानी सैनिकों को तैनात करने का ब्लूप्रिंट तैयार किया गया है। यह पाकिस्तान की पूरी एक स्ट्राइक कोर के बराबर है। इसके अलावा, समुद्र में भी घेराबंदी करने के लिए पाकिस्तानी नौसेना के युद्धपोतों को तैनात करने की चर्चा है। यह पूरी तरह से एक बड़े सैन्य ऑपरेशन की तैयारी की तरह नजर आ रहा है।
पाकिस्तान के इस दोहरे चरित्र ने ईरान को स्तब्ध कर दिया है। ईरान, जो पाकिस्तान को एक भरोसेमंद पड़ोसी मान रहा था, अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। कूटनीति में इस तरह का विश्वासघात कम ही देखने को मिलता है, जहां आप एक तरफ शांति की बात करें और दूसरी तरफ पड़ोसी के दुश्मन के साथ मिलकर उसके खिलाफ हथियार तैनात कर दें।
भारत के लिए यह स्थिति सतर्क रहने वाली है। यह साबित करता है कि पाकिस्तान की सेना अब केवल एक पेशेवर बल नहीं, बल्कि एक व्यावसायिक इकाई बन चुकी है जो चंद डॉलर्स के लिए अपनी सेवाएं बेच सकती है। जब किसी देश की सैन्य लीडरशिप का ध्यान राष्ट्रीय सुरक्षा से हटकर व्यावसायिक लाभ पर चला जाए, तो वह पूरे क्षेत्र के लिए अस्थिरता का कारण बनता है।
निष्कर्षतः, पाकिस्तान ने एक बार फिर दिखा दिया है कि उसकी कथनी और करनी में कोई मेल नहीं है। मध्यस्थता का नकाब पहनकर पीठ में छुरा घोंपने की इस हरकत के बाद इस्लामाबाद की अंतरराष्ट्रीय साख पूरी तरह गिर चुकी है। सऊदी के पैसों पर टिकी यह किराए की फौज और उधार के विमान कब तक टिक पाएंगे, यह तो समय बताएगा, लेकिन पाकिस्तान की सैन्य कूटनीति की नीलामी आज पूरी दुनिया के सामने है।

