ड्रैगन की नई साजिश और भारत का चक्रव्यूह: क्या ‘चिकन नेक’ पर मंडरा रहा है सबसे बड़ा खतरा?

एशिया के राजनीतिक मानचित्र पर इस समय एक अत्यंत खतरनाक लकीर खींची जा रही है। यह महज कोई भौगोलिक रेखा नहीं, बल्कि एक गहरे भू-राजनीतिक षड्यंत्र का हिस्सा है। कल्पना कीजिए कि एक शांति से बहने वाली नदी अचानक दो राष्ट्रों के बीच कूटनीतिक युद्ध का केंद्र कैसे बन सकती है। क्या होगा जब आपका एक पुराना मित्र, जिसकी आपने हर संकट में मदद की हो, वही शत्रु देश के साथ मिलकर आपके घर की दहलीज पर जासूसी के रडार तैनात करने लगे?

एक तरफ चीन का विस्तारवादी लालच है जो सीमाओं को लांघना चाहता है, वहीं दूसरी ओर हमारे पड़ोसी देश की एक ऐसी चाल है जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी बन गई है। दक्षिण एशिया की राजनीति में इस समय भारी हलचल है। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान एक ऐसी फाइल पर हस्ताक्षर करने वाले हैं, जिसका सीधा संपर्क बीजिंग में शी जिनपिंग के डेस्क से है। यह केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि नदियों के पानी को हथियार बनाकर भारत की घेराबंदी करने की एक सोची-समझी साजिश है।

क्या हमारा पड़ोसी अपने ही भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है? क्या वह यह भूल गया है कि चीन का इतिहास हमेशा विश्वासघात का रहा है? सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत इस चुनौती को चुपचाप स्वीकार कर लेगा? उत्तर है—कदापि नहीं। भारत ने भी अपनी कूटनीतिक और सैन्य बिसात इस तरह बिछाई है कि चीन और उसके नए सहयोगियों के लिए इस चक्रव्यूह से निकल पाना अब नामुमकिन होगा।

अब इस विवाद की गहराई को समझते हैं। आखिर रातों-रात ऐसा क्या हुआ कि बांग्लादेश चीन की गोद में जा बैठा? ऊपरी तौर पर यह नदी जल का विवाद दिखता है, लेकिन इसके पीछे बुना गया जाल अत्यंत घातक है। हाल ही में गाजीपुर में एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने घोषणा की कि उनकी सरकार लंबे समय से लंबित पद्मा और तीस्ता बैराज प्रोजेक्ट पर काम शुरू करेगी। इस आक्रामक बयान ने दिल्ली के सत्ता गलियारों में चिंता बढ़ा दी है।

सुनने में यह विकास का कार्य लगता है, लेकिन सस्पेंस तब शुरू होता है जब यह पता चलता है कि इस विशाल प्रोजेक्ट के लिए बांग्लादेश भारत के बजाय चीन से मदद मांग रहा है। मई 2026 में बांग्लादेश के विदेश मंत्री ने गोपनीय तरीके से बीजिंग की यात्रा की और वांग यी से मुलाकात कर एक अरब डॉलर की फंडिंग की मांग की। अब जून के अंत में स्वयं तारिक रहमान चीन जाने वाले हैं, जहां इस अरबों डॉलर की डील पर अंतिम मुहर लग सकती है। इस समझौते के साथ ही चीन आधिकारिक तौर पर भारतीय सीमा के मुहाने पर अपनी पैठ जमा लेगा।

भारत के लिए चिंता की बात यह है कि तीस्ता बैराज का प्रस्तावित स्थान रणनीतिक रूप से संवेदनशील ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ यानी ‘चिकन नेक’ के बिल्कुल करीब है। यह मात्र 20 किलोमीटर चौड़ा एक संकरा रास्ता है जो पूरे उत्तर-पूर्व भारत (North-East) को शेष देश से जोड़ता है। हमारी सेना की आवाजाही और रसद की सप्लाई इसी मार्ग से होती है।

चीन इसी रास्ते की निगरानी करना चाहता है। बैराज निर्माण के बहाने चीनी कंपनियां और हजारों इंजीनियर वहां पहुंचेंगे। वे पानी की मॉनिटरिंग के नाम पर वहां हाई-टेक सर्विलांस सिस्टम और रडार लगा सकते हैं, जिनका रुख भारतीय सीमा की ओर होगा। यह भारत की सुरक्षा के लिए एक बड़ा ‘रेड फ्लैग’ है।

हालांकि, यह 2026 का नया भारत है। भारत ने इस खतरे को पहचान कर अपना मास्टरस्ट्रोक चल दिया है। चिकन नेक की सुरक्षा को अभेद्य बनाने के लिए घातक हथियारों और डिफेंस सिस्टम की तैनाती शुरू कर दी गई है। सबसे बड़ी बात यह है कि पश्चिम बंगाल सरकार ने राजनीतिक मतभेदों को भुलाकर इस कॉरिडोर की सुरक्षा का पूरा नियंत्रण केंद्र सरकार और भारतीय सेना को सौंप दिया है।

अब वहां एंटी-एयरक्राफ्ट गन और मिसाइल डिफेंस सिस्टम के साथ स्पेशल फोर्सेज तैनात हैं। भारत ने बीजिंग और ढाका को स्पष्ट संकेत दे दिया है कि भारतीय सीमा की ओर उठने वाली किसी भी बुरी नजर का करारा जवाब दिया जाएगा। भारत की इस सख्त घेराबंदी से चीन के मंसूबे विफल होते दिख रहे हैं।

तारिक रहमान ने अपने भाषण में जल संकट का मुद्दा उठाकर जनता को भड़काने की कोशिश की और फरक्का बैराज पर आरोप लगाए। उनका दावा है कि फरक्का के कारण गंगा का जल प्रवाह कम हुआ है, जो कि एक गलत नैरेटिव है। भारत ने हमेशा अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन किया है और फरक्का बैराज का निर्माण कोलकाता पोर्ट को बचाने के लिए किया गया था।

भारत के पास एक ऐसा ‘ब्रह्मास्त्र’ है जो बांग्लादेश की रणनीति को ध्वस्त कर सकता है। 1996 की गंगा जल संधि दिसंबर 2026 में समाप्त हो रही है। यदि बांग्लादेश भारत की सुरक्षा को नजरअंदाज कर चीन के साथ जाता है, तो भारत के पास इस संधि को रिन्यू न करने का अधिकार है। यदि पानी का प्रवाह नियंत्रित किया गया, तो बांग्लादेश की कृषि व्यवस्था चरमरा जाएगी और तब चीन उन्हें पानी पिलाने नहीं आएगा।

यह पूरी स्थिति बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद पैदा हुई है, जहां नई सरकार चीन समर्थक नीतियों पर चल रही है। चीन इसे अपने ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) का हिस्सा बना रहा है, जो असल में एक ‘कर्ज का जाल’ है। श्रीलंका और पाकिस्तान इसके उदाहरण हैं जो चीन के कर्ज के नीचे दब चुके हैं।

यदि चीन इस प्रोजेक्ट को फंड करता है, तो वह बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था और जमीन पर कब्जा कर लेगा। तारिक रहमान ने भारत को चुनौती देकर एक बड़ी कूटनीतिक भूल की है। इतिहास गवाह है कि जब भारत अपना कड़ा रुख अपनाता है, तो बड़े-बड़े विरोधियों को पीछे हटना ही पड़ता है।

Share This Article
Leave a Comment