बांग्लादेश में खसरे का महाविनाश
488! यह सिर्फ एक संख्या नहीं है। यह 488 बुझ चुके दीपक हैं, 488 उजड़ चुके घर हैं, और उन 488 मासूमों की अंतिम चीखें हैं जो पड़ोसी देश में मचे ‘महाकाल’ की गवाही दे रही हैं। बांग्लादेश आज खसरे की एक ऐसी भीषण ‘सुनामी’ में डूब रहा है, जिसका मंजर देखकर किसी भी सहृदय इंसान की रूह कांप जाए। लेकिन यह तबाही, यह मातम और मासूमों की जान जाना… क्या यह मात्र एक ‘बीमारी’ का प्रकोप है? बिल्कुल नहीं! यह सिस्टम द्वारा किया गया कत्लेआम है, एक सरकार की आपराधिक लापरवाही है, और उन चेतावनियों को नजरअंदाज करने का परिणाम है जो लगातार आगाह कर रही थीं कि ‘मौत दस्तक दे रही है’।
मासूमों का ‘नरसंहार’: खौफनाक आंकड़े
यह सिर्फ खतरे की घंटी नहीं, बल्कि ‘महाप्रलय’ का संकेत है! बांग्लादेश के कुल 64 जिलों में से 58 जिले खसरे की चपेट में आ चुके हैं। यानी लगभग पूरा देश ही इस ‘जहरीली’ बीमारी की गिरफ्त में है। पिछले महज तीन महीनों में, 15 मार्च से अब तक, खसरे ने 488 जिंदगियां निगल ली हैं। सबसे हृदयविदारक बात यह है कि जान गंवाने वालों में अधिकांश छोटे बच्चे हैं।
हर गुजरता दिन और हर घंटा एक नया मातम लेकर आ रहा है। गुरुवार की सुबह तक बीते 24 घंटों में ही सात और बच्चों की मौत हो गई। यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। अस्पतालों में बेड की कमी है, दवाइयां उपलब्ध नहीं हैं, और बेबस माता-पिता अपने बच्चों को अपनी आंखों के सामने दम तोड़ते देखने के लिए विवश हैं। चटगांव जैसे क्षेत्र तो मौत की ‘मंडी’ बन चुके हैं, जहां सर्वाधिक संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं।
तबाही का अंदाजा इन आंकड़ों से लगाइए: अस्पतालों में 46,407 से अधिक संदिग्ध मरीज भर्ती हैं। संदिग्ध संक्रमितों की कुल संख्या 59,279 तक पहुंच गई है। यह कोई सामान्य आउटब्रेक नहीं है, बल्कि एक पूर्ण ‘हेल्थ इमरजेंसी’ है, जिसे एक विफल सिस्टम ने आमंत्रित किया है।
UNICEF की चेतावनियां और सरकार की गद्दारी
अब सबसे चुभता हुआ सवाल: इस तबाही का असली गुनहगार कौन है? जवाब स्पष्ट है और इसकी गूंज ढाका से न्यूयॉर्क तक सुनाई दे रही है। इस ‘कत्लेआम’ के लिए मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली वह ‘अंतरिम सरकार’ जिम्मेदार है, जिसने सत्ता के अहंकार में मासूमों की जान दांव पर लगा दी।
यूनिसेफ की प्रतिनिधि राना फ्लावर्स ने ढाका में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर एक ऐसा खुलासा किया है, जो किसी का भी खून खौला दे। उन्होंने साफ कहा कि एजेंसी ने स्वास्थ्य मंत्रालय को एक-दो नहीं, बल्कि 5 से 6 पत्र भेजे थे! इतना ही नहीं, अंतरिम सरकार के दौरान वैक्सीन संकट पर हुई 10 हाई-लेवल मीटिंग्स में भी गहरी चिंता जताई गई थी।
यूनिसेफ बार-बार चिल्लाकर कह रहा था: “2024 से ही हम सरकार को चेतावनी दे रहे थे कि वैक्सीन की कमी एक बड़े स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकती है।” 2024, 2025 और फिर 2026 तक के लिए चेतावनी दी गई, पत्र भेजे गए, बैठकें हुईं, लेकिन मोहम्मद यूनुस की सरकार टस से मस नहीं हुई। उन्होंने वैक्सीन के ऑर्डर ही नहीं दिए! उन्होंने मासूमों की जिंदगी से ऊपर अपनी ‘सियासी’ जिद को रखा। यह मात्र लापरवाही नहीं, बल्कि अक्षम्य अपराध है!
यूनुस प्रशासन की ‘काली करतूतों’ का पर्दाफाश
क्या यह सरकार इतनी अंधी थी या यह कोई सोची-समझी साजिश थी? यूनिसेफ के डिप्टी एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर टेड चाइबन ने भी पिछले साल अगस्त में ढाका दौरे के समय विदेश मंत्रालय के साथ बैठक में इस संकट पर आगाह किया था। हर संस्था ने उन्हें टोका, हर विशेषज्ञ ने चेताया, लेकिन परिणाम शून्य रहा।
मोहम्मद यूनुस, जिन्हें वैश्विक मंचों पर ‘मसीहा’ के रूप में पेश किया जाता है, अपने ही देश के बच्चों को वैक्सीन का एक टीका तक नहीं दिला सके। यह उनकी सबसे बड़ी विफलता और ‘काली करतूत’ है जिसका खामियाजा आज बांग्लादेश का हर घर भुगत रहा है। जब वैक्सीन का स्टॉक खत्म हो गया, तब खसरा ‘यमराज’ बनकर बच्चों पर टूट पड़ा।
ढाका हाई कोर्ट में इंसाफ की गुहार: अब होगा हिसाब!
मासूमों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। इस ‘नरसंहार’ का हिसाब शुरू हो चुका है। वर्तमान बीएनपी-समर्थित सरकार ने इस भारी लापरवाही की जांच के आदेश दे दिए हैं। सबसे बड़ी खबर यह है कि ढाका हाई कोर्ट में एक याचिका दायर कर मोहम्मद यूनुस और 24 अन्य लोगों के देश छोड़ने पर पाबंदी लगाने की मांग की गई है, ताकि जांच पूरी होने तक वे बच न सकें।
यूनिसेफ ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वह जांच में हर संभव साक्ष्य और सहयोग प्रदान करेगा। वे कोर्ट को बताएंगे कि कैसे बार-बार आगाह करने के बावजूद यूनुस सरकार ने जानबूझकर सब कुछ नजरअंदाज किया।
राष्ट्रवादी हुंकार: पड़ोसी में संकट, भारत पूरी तरह तैयार!
जब पड़ोस में आग लगी हो, तो भारत मूकदर्शक नहीं बना रह सकता। बांग्लादेश की यह त्रासदी हमारे लिए भी एक बड़ी चेतावनी है। यह हमें याद दिलाती है कि एक मजबूत, राष्ट्रवादी और जनता के प्रति जवाबदेह सरकार का होना कितना अनिवार्य है। यदि सरकार कमजोर हो या विदेशी एजेंडे पर चले, तो उसका अंजाम वही होता है जो आज बांग्लादेश भुगत रहा है।
हमें अपनी सुदृढ़ स्वास्थ्य व्यवस्था और विश्व के सबसे बड़े टीकाकरण अभियान पर गर्व है। हमारे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में, भारत ने न केवल अपने बच्चों को सुरक्षित किया, बल्कि ‘वैक्सीन मैत्री’ के माध्यम से दुनिया की मदद की। बांग्लादेश का यह संकट हमें सिखाता है कि हमें अपने स्वास्थ्य ढांचे को और अधिक अभेद्य बनाना होगा, ताकि कोई भी बाहरी बीमारी हमारे बच्चों तक न पहुंच सके।
बांग्लादेश में जो हो रहा है, वह एक कड़ा सबक है। यह सबक है कि कैसे एक अक्षम सरकार देश को ‘कब्रिस्तान’ बना सकती है। यह सबक है कि चेतावनियों को नजरअंदाज करना कितना आत्मघाती हो सकता है। लेकिन अंततः न्याय की जीत होती है और गद्दारों को उनके कर्मों का फल मिलता है।
हम बांग्लादेश के उन मासूमों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हैं, जो इस भ्रष्ट सिस्टम की भेंट चढ़ गए। हमें उम्मीद है कि बांग्लादेश जल्द ही इस संकट से उबरेगा और उन लोगों को दंडित करेगा जिन्होंने इस त्रासदी की पटकथा लिखी। भारत सतर्क है और अपने पड़ोस में शांति एवं सुरक्षा की कामना करता है।
अब हिसाब होगा! हर एक मासूम की जान का बदला सिस्टम में सुधार कर और दोषियों को सजा देकर लिया जाएगा!

