रूस का एवनगार्ड हाइपरसोनिक मिसाइल: हवा में जिग-जैग चलता है यह ‘उड़ता भूत’, अमेरिका भी है बेबस

आज हम एक ऐसे महाविनाशक हथियार की चर्चा कर रहे हैं जिसने दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश की नींद उड़ा दी है। कल्पना कीजिए आसमान से गिरता एक ऐसा रहस्यमयी ‘उड़ता भूत’, जो किसी साधारण बैलिस्टिक मिसाइल की तरह सीधे रास्ते पर नहीं चलता, बल्कि एक फुर्तीले और खतरनाक सांप की तरह हवा में जिग-जैग लहराते हुए अपने लक्ष्य की ओर झपटता है। इसकी गति इतनी अविश्वसनीय है और रास्ता बदलने की कला इतनी सटीक है कि पश्चिमी देशों के सबसे आधुनिक रडार सिस्टम भी इसे देखकर चकरा जाते हैं।

अमेरिका, जो अपने अरबों डॉलर के थाड (THAAD) यानी ‘टर्मिनल हाई ऑल्टिट्यूड एरिया डिफेंस सिस्टम’ का पूरी दुनिया में लोहा मनवाता है, वह भी इस रूसी हथियार के आगे विवश दिखाई देता है। इस आधुनिक हथियार को ट्रैक करना, इसकी सटीक लोकेशन पता लगाना और इसे बीच हवा में मार गिराना मौजूदा तकनीक के लिए लगभग असंभव है। ग्लोबल पावर डायनामिक्स को चुनौती देने वाले इस बेजोड़ हथियार का नाम है ‘एवनगार्ड’ (Avangard)। यह रूस का वह हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल है, जिसका फिलहाल दुनिया में किसी के पास कोई जवाब नहीं है।

साल 2018 में जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अपने देश के छह सबसे घातक रणनीतिक हथियारों की घोषणा की थी, तब एवनगार्ड को रूस की तकनीकी ताकत का सबसे बड़ा प्रमाण बताया गया था। इसके बाद दिसंबर 2019 में इसे आधिकारिक रूप से रूसी सेना में तैनात कर दिया गया। यह केवल एक मिसाइल नहीं है, बल्कि एक ऐसा वेपन सिस्टम है जो परमाणु हमले की असीमित क्षमता रखता है और इसकी प्रचंड गति इसे रूस के परमाणु बेड़े का सबसे धारदार हिस्सा बनाती है।

अब सवाल यह उठता है कि आखिर एवनगार्ड काम कैसे करता है और क्यों यह अमेरिका के लिए सिरदर्द बना हुआ है? इसे समझने के लिए हमें इसके लॉन्च की प्रक्रिया को सरल भाषा में समझना होगा। एवनगार्ड कोई ऐसी छोटी मिसाइल नहीं है जिसे जमीन से सीधे दागा जा सके। इसे शुरुआत में रूस की विशालकाय इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों, जैसे कि आरएस-18बी या फिर आधुनिक आरएस-28 ‘सरमत’ के ऊपर पेलोड के रूप में फिट किया जाता है, और फिर अंतरिक्ष की ओर प्रक्षेपित किया जाता है।

जब यह मिसाइल अंतरिक्ष में एक खास ऊंचाई पर पहुंचती है, तब इसका असली जादू शुरू होता है। वहां पहुंचने के बाद एवनगार्ड ग्लाइड व्हीकल अपने मुख्य रॉकेट से अलग हो जाता है और वापस पृथ्वी के वायुमंडल की ऊपरी परतों में प्रवेश करता है। यहीं से इसकी वह डरावनी उड़ान शुरू होती है जो भौतिक विज्ञान के पारंपरिक नियमों को चुनौती देती है और दुश्मन के रडार को अंधा कर देती है।

साधारण बैलिस्टिक मिसाइलें एक निर्धारित रास्ते पर चलती हैं। वे अंतरिक्ष में जाकर एक कर्व (पैराबोलिक) रास्ता बनाते हुए सीधे लक्ष्य पर गिरती हैं। क्योंकि उनका रास्ता पहले से तय होता है, इसलिए अमेरिकी रडार उन्हें दूर से ही पहचान लेते हैं और इंटरसेप्टर मिसाइलों के जरिए हवा में ही नष्ट कर देते हैं। लेकिन एवनगार्ड का तरीका बिल्कुल जुदा है।

वायुमंडल में दोबारा प्रवेश करने के बाद एवनगार्ड ग्लाइड करना शुरू करता है। यह वायुमंडल की घनी परतों के ऊपर, लगभग 40 से 100 किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ता है। यह वह ऊंचाई है जहां न तो सैटेलाइट इसे देख पाते हैं और न ही जमीन पर लगे रडार इसे पकड़ पाते हैं। सबसे विशेष बात यह है कि यह ‘मैक 27’ की रफ्तार से चलता है, जो ध्वनि की गति से 27 गुना तेज है। इस भयानक स्पीड के बावजूद यह लगातार दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे जिग-जैग मोशन में मूव करता रहता है।

जब कोई वस्तु ध्वनि से 27 गुना तेज चलती है, तो हवा के घर्षण के कारण उसका तापमान 2000 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इस तीव्र गर्मी के कारण एवनगार्ड के चारों ओर ‘प्लाज्मा’ का एक घना बादल बन जाता है। यह प्लाज्मा क्लाउड एक ‘अदृश्य चादर’ (Stealth) की तरह काम करता है, जो रडार की रेडियो तरंगों को सोख लेता है। नतीजतन, रडार स्क्रीन पर यह दिखाई ही नहीं देता। जब तक रडार इसे ट्रैक करने की कोशिश करता है, तब तक यह लक्ष्य को नेस्तनाबूद कर चुका होता है।

अगर इसकी रेंज और मारक क्षमता की बात करें, तो एवनगार्ड एक इंटरकॉन्टिनेंटल हथियार है। इसे भारी आईसीबीएम पर माउंट किया जाता है, जिस कारण इसकी रेंज 6000 से लेकर 18000 किलोमीटर से भी अधिक है। इसका अर्थ यह है कि रूस अपने ठिकाने से बैठे-बैठे वाशिंगटन, न्यूयॉर्क या दुनिया के किसी भी कोने में पिनपॉइंट सटीकता के साथ हमला कर सकता है। कोई भी दूरी इसकी पहुंच से बाहर नहीं है।

एवनगार्ड की विनाशकारी क्षमता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह अपने साथ 2 मेगाटन (2000 किलोटन) तक का परमाणु हथियार ले जा सकता है। तुलना के लिए, हिरोशिमा पर गिराए गए बम की ताकत केवल 15 किलोटन थी जिसने पूरे शहर को राख कर दिया था। अब कल्पना कीजिए कि 2000 किलोटन का परमाणु धमाका किसी शहर में कितनी बड़ी तबाही लाएगा—इमारतें और इंसान पल भर में भाप बनकर उड़ जाएंगे।

हैरानी की बात यह है कि इसकी सबसे बड़ी ताकत सिर्फ परमाणु बम नहीं, बल्कि इसकी ‘काइनेटिक एनर्जी’ (गतिज ऊर्जा) है। मैक 27 की रफ्तार से जब यह भारी-भरकम वाहन बिना किसी बारूद के भी किसी टारगेट से टकराएगा, तो उसका असर किसी बड़े उल्कापिंड के गिरने जैसा होगा। यह बिना परमाणु विस्फोट के भी गहरे बंकरों और सैन्य बेस को मलबे के ढेर में बदल सकता है।

सामरिक दृष्टि से देखें तो एवनगार्ड रूस को एकतरफा बढ़त प्रदान करता है। युद्ध की भाषा में ‘फर्स्ट स्ट्राइक’ और ‘सेकंड स्ट्राइक’ (पलटवार) दोनों ही स्थितियों में यह हथियार रूस को अजय बनाता है। यह किसी भी मिसाइल डिफेंस सिस्टम की पहुंच से बाहर है।

अमेरिका ने दशकों की मेहनत और खरबों डॉलर खर्च करके जो ग्लोबल मिसाइल डिफेंस नेटवर्क बनाया था, वह पुरानी बैलिस्टिक तकनीक को रोकने के लिए था। अमेरिका को भरोसा था कि पैट्रियट और थाड सिस्टम से वह सुरक्षित है, लेकिन एवनगार्ड ने इस पूरे डिफेंस नेटवर्क को एक झटके में तकनीक के स्तर पर ‘कबाड़’ जैसा साबित कर दिया है।

एवनगार्ड ठीक उसी ब्लाइंड स्पॉट (40-100 किमी की ऊंचाई) पर वार करता है जहां रडार नेटवर्क काम नहीं करता। जमीन की कम दूरी वाली मिसाइलें वहां तक नहीं पहुंच सकतीं और लंबी दूरी के इंटरसेप्टर इसकी जिग-जैग चाल के आगे फेल हो जाते हैं। जब तक दुश्मन का कंप्यूटर इसकी लोकेशन कैलकुलेट करता है, एवनगार्ड अपनी जगह और ऊंचाई बदल चुका होता है।

संक्षेप में कहें तो एवनगार्ड ने हथियारों की दौड़ में रक्षा तकनीक को कई दशक पीछे धकेल दिया है। आज दुनिया का कोई भी सुरक्षा तंत्र हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल्स को रोकने के लिए सक्षम नहीं है। यह केवल एक हथियार नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक दबाव भी है जो युद्ध से पहले ही दुश्मन के मनोबल को तोड़ देता है।

तकनीक की इस दौड़ में रूस की एवनगार्ड वाली छलांग ने अमेरिका को फिर से नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है। जब तक पश्चिमी देश इस ‘हाइपरसोनिक सांप’ का कोई तोड़ ढूंढेंगे, तब तक रूस संभवतः और भी उन्नत तकनीक विकसित कर चुका होगा। एवनगार्ड यह साबित करता है कि आधुनिक युद्ध में केवल रफ्तार और गोपनीयता (Stealth) ही सबसे बड़े गेम चेंजर हैं।

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