बीजिंग के विस्तारवादी मंसूबे पालने वाले हुक्मरान गौर से सुन लें, यह 1962 का भारत नहीं है, बल्कि 2024 का ‘सशक्त भारत’ है। एक ऐसा भारत, जो अब रक्षात्मक मुद्रा को छोड़कर आक्रामक कूटनीति पर भरोसा करता है। वह भारत, जो ईंट का जवाब पत्थर से देने का साहस रखता है। पिछले कई सालों से चीन ने भारत को घेरने के लिए पाकिस्तान में आतंकवाद और अस्थिरता को बढ़ावा दिया और उसे हथियारों से लैस किया। चीन का मानना था कि वह पाकिस्तान के दम पर भारत को उलझाए रखेगा और खुद एशिया का ‘एकछत्र सुल्तान’ बन जाएगा। लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले नए भारत ने चीन की इस ‘स्ट्रैटेजी’ को ध्वस्त कर दिया है। भारत ने अब सीधे दक्षिण चीन सागर (South China Sea) में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है। यह कोई सामान्य दखल नहीं है; हम वहां चीन के प्रतिद्वंद्वियों को ड्रैगन के सबसे बड़े खौफ—अजेय ब्रह्मोस मिसाइल—से लैस कर रहे हैं। यह चीन के लिए ऐसा कड़ा प्रहार है, जिसकी गूंज बीजिंग के सत्ता गलियारों में साफ सुनी जा सकती है।
ब्रह्मोस का खौफ: जब पाकिस्तान में धराशायी हो गई थी चीनी तकनीक
आखिर चीन ब्रह्मोस मिसाइल के नाम से ही इतना क्यों घबराता है? इसकी एक ठोस वजह है। ब्रह्मोस कोई साधारण मिसाइल नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे तीव्र और घातक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है। इसकी गति, अचूक निशाना और मारक क्षमता बेजोड़ है। इसका जीवंत प्रमाण पूरी दुनिया ने तब देखा, जब एक तकनीकी त्रुटि के कारण ब्रह्मोस गलती से पाकिस्तान की सीमा में दाखिल हो गई थी। उस समय पाकिस्तान का पूरा डिफेंस सिस्टम, जो चीन के महंगे एयर डिफेंस सिस्टम पर टिका था, पूरी तरह नाकाम साबित हुआ। पाकिस्तानी रडार को पता तक नहीं चला कि कब मिसाइल आई और अपना काम कर गई। इस घटना ने चीनी हथियारों की विश्वसनीयता की पोल खोल दी। यही वजह है कि आज वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देश भारत की इस मिसाइल के लिए कतार में खड़े हैं। उन्हें पता है कि अगर दक्षिण चीन सागर में चीन की गुंडागर्दी रोकनी है, तो ब्रह्मोस जैसा ‘ब्रह्मास्त्र’ अनिवार्य है।
हनोई में ‘महाबली’ की गूंज: बीजिंग के उड़े होश
वियतनाम के साथ यह रक्षा समझौता भारत की कूटनीति में एक बड़ा मोड़ साबित होगा। वियतनाम के राष्ट्रपति टो लाम की हालिया भारत यात्रा के दौरान ब्रह्मोस मिसाइल की बिक्री पर विस्तृत चर्चा हुई। यह केवल बातचीत नहीं थी, बल्कि दोनों देशों ने पुष्टि की है कि सौदा अब निर्णायक स्तर पर है। रिपोर्टों के अनुसार, यह पूरा प्रोजेक्ट लगभग 629 से 700 मिलियन अमेरिकी डॉलर के बीच का हो सकता है। इसमें न केवल मिसाइलों की आपूर्ति होगी, बल्कि वियतनामी सैनिकों का प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक सपोर्ट भी शामिल होगा। फिलीपींस के बाद वियतनाम ब्रह्मोस का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बनने जा रहा है, जो चीन के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है।
दक्षिण चीन सागर में चीन की घेराबंदी: भारत का अभेद्य ‘चक्रव्यूह’
दक्षिण चीन सागर के मानचित्र को देखें तो चीन इस पूरे समुद्री क्षेत्र पर अपना अवैध मालिकाना हक जताता है। वह वियतनाम और फिलीपींस जैसे छोटे देशों को धमकाता रहता है। लेकिन भारत ने वियतनाम को ब्रह्मोस देकर वहां का शक्ति संतुलन ही बदल दिया है। ब्रह्मोस की 290 किमी की रेंज और सुपरसोनिक रफ्तार इसे एक विनाशकारी हथियार बनाती है, जो चीन के महंगे जंगी जहाजों और एयरक्राफ्ट कैरियर्स को पल भर में नष्ट कर सकती है। यदि वियतनाम इन मिसाइलों को रणनीतिक ठिकानों पर तैनात करता है, तो टोंकिन की खाड़ी में वह एक सुरक्षा कवच तैयार कर लेगा, जिससे चीन का हैनान नौसैनिक अड्डा सीधे निशाने पर होगा।
वियतनाम की रणनीति और भारत का सुरक्षा कवच
वियतनाम अपनी ‘A2/AD’ (एंटी-एक्सेस/एरिया-डिनायल) रणनीति के तहत अपनी रक्षा प्रणाली को मजबूत कर रहा है। इसका मकसद दुश्मन को अपने क्षेत्र में घुसने से रोकना है। ब्रह्मोस इस रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बनेगी। रूसी किलो-क्लास पनडुब्बियां और Su-30 फाइटर जेट्स के साथ ब्रह्मोस का संयोजन चीन के क्षेत्रीय दावों के लिए काल साबित होगा। भारत न केवल हथियार दे रहा है, बल्कि वियतनाम के साथ लंबी अवधि की रक्षा साझेदारी निभा रहा है।
चीन को भारत का सीधा संदेश: ‘जैसे को तैसा’
ब्रह्मोस की बिक्री केवल एक व्यापारिक सौदा नहीं, बल्कि चीन के लिए एक कड़ा सामरिक संदेश है। चीन जिस तरह भारत के पड़ोसियों को उकसाकर हमें घेरने की कोशिश कर रहा था, अब भारत ने उसी की भाषा में जवाब दिया है। अगर चीन हिंद महासागर में दखल देगा, तो भारत भी दक्षिण चीन सागर में चीन के हितों को चुनौती देगा। यह एक नए युग की शुरुआत है, जहाँ चीन को अब फूंक-फूंक कर कदम रखने होंगे, क्योंकि अब उसके सामने छोटे देश अकेले नहीं, बल्कि उनके पीछे एक शक्तिशाली भारत खड़ा है। जय हिन्द!

