भारत-चीन का महा-समझौता: बीजिंग में तय हुईं 3 ‘रेड लाइन्स’, पाकिस्तान के मंसूबों पर फिरा पानी!

वैश्विक कूटनीति के इस दौर में जब कोई देश बैसाखियों के दम पर दूसरों को नीचा दिखाने की कोशिश करता है, तो उसका परिणाम वैसा ही होता है जैसा वर्तमान में पाकिस्तान का हो रहा है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ बड़ी उम्मीदों और मांगों की लंबी लिस्ट लेकर बीजिंग पहुंचे थे। उनका मुख्य एजेंडा भारत के खिलाफ चीन को उकसाकर नया प्रोपेगैंडा फैलाना था। हालांकि, शाहबाज के बीजिंग से वापस लौटते ही जो कूटनीतिक उलटफेर हुआ, उसकी कल्पना इस्लामाबाद या रावलपिंडी ने कभी नहीं की थी। शाहबाज की रवानगी के तुरंत बाद बीजिंग में भारत की ऐसी दमदार एंट्री हुई, जिसने वैश्विक कूटनीति की दिशा ही बदल दी।

पाकिस्तान जिस चीन को भारत के खिलाफ भड़काने की साजिश रच रहा था, उसे यह अंदाजा नहीं था कि वही चीन भारत के साथ समझौते की मेज पर बैठने जा रहा है। चीन ने पाकिस्तानी उम्मीदों को दरकिनार करते हुए भारत के साथ एक अत्यंत संवेदनशील और उच्च स्तरीय बैठक की। दशकों के तनाव को किनारे रखकर दोनों देशों ने सीमा विवाद सुलझाने का एक ऐतिहासिक रोडमैप तैयार किया है, जिसने वैश्विक थिंक टैंक को हैरान कर दिया है। सवाल यह है कि बीजिंग के बंद कमरों में भारत और चीन के अधिकारियों ने ऐसी कौन सी तीन ‘रेड लाइन्स’ तय की हैं? क्या चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अब समझ चुके हैं कि नए भारत के साथ टकराव उनकी बड़ी भूल हो सकती है? और क्या यह कदम पश्चिमी देशों के वैश्विक दबदबे को चुनौती देने का कोई बड़ा गुप्त प्लान है?

जब इस्लामाबाद के हुक्मरान बीजिंग से किसी बड़े आर्थिक पैकेज या भारत विरोधी बयान की प्रतीक्षा कर रहे थे, ठीक उसी समय चीन ने उन्हें एक जबरदस्त कूटनीतिक झटका दिया। चीन के रणनीतिकार अब इस हकीकत को जान चुके हैं कि भारत एक उभरती हुई वैश्विक महाशक्ति है, जिसे नजरअंदाज करना चीन की अपनी अर्थव्यवस्था के लिए भी घातक हो सकता है। यह महज एक सामान्य बैठक नहीं थी, बल्कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को बदलने वाला एक बड़ा कदम था। एक तरफ पाकिस्तान जहर उगल रहा था, तो दूसरी तरफ भारत और चीन के उच्चाधिकारी सीमा पर शांति स्थापित करने का नया इतिहास लिख रहे थे।

इस बैठक की गंभीरता को इस बात से समझा जा सकता है कि इसमें केवल विदेश मंत्रालय के राजनयिक ही नहीं, बल्कि दोनों देशों की सेना, गृह मंत्रालय और इमिग्रेशन विभागों के सबसे रसूखदार अफसर शामिल हुए। इसे ‘वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन’ (WMCC) का 35वां दौर कहा गया। चीन की ओर से विदेश मंत्रालय की महानिदेशक होउ यानकी और भारत की ओर से संयुक्त सचिव सुजीत घोष ने कमान संभाली।

मेज पर रखी खुफिया फाइलों और सैटेलाइट नक्शों के बीच दोनों देशों के सैन्य और कूटनीतिक दिग्गजों का जमावड़ा यह संदेश दे रहा था कि अब बातें कागजों तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि जमीन पर ठोस कार्रवाई होगी। ये अधिकारी एक ऐसे फॉर्मूले को अंतिम रूप दे रहे थे जिससे सीमा पर स्थायी शांति बहाल हो सके। आखिर वो कौन सी वजहें थीं जिन्होंने बीजिंग को अपना अड़ियल रुख छोड़ने पर मजबूर किया?

दरअसल, चीन इस समय नाजुक आर्थिक दौर से गुजर रहा है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अलग-थलग पड़ने से बचने के लिए उसे एशिया में एक मजबूत पार्टनर की जरूरत है। चीन अच्छी तरह जान चुका है कि भारत की आर्थिक और सैन्य शक्ति को अब रोका नहीं जा सकता। भारत ने सीमा पर जिस गति से बुनियादी ढांचा विकसित किया है, उसने चीनी सेना की रणनीतिक बढ़त को खत्म कर दिया है।

चीन को यह भी अहसास हो गया है कि पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का मुकाबला करने के लिए भारत से दुश्मनी महंगी पड़ सकती है। दोनों देशों का आपसी व्यापार नए रिकॉर्ड छू रहा है और सीमा पर तनाव दोनों की प्रगति में बाधक था। यही कारण है कि चीन ने पाकिस्तान के एजेंडे को ठंडे बस्ते में डालकर भारत के साथ रिश्तों को प्राथमिकता दी। अब जानते हैं उन तीन प्रमुख ‘रेड लाइन्स’ के बारे में जो इस बैठक में तय हुईं।

इस मैराथन बैठक में पहली और सबसे महत्वपूर्ण ‘रेड लाइन’ है – सीमाओं का स्पष्ट निर्धारण। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) हमेशा से एक अस्पष्ट सीमा रही है, जिसका फायदा उठाकर चीनी सैनिक घुसपैठ की कोशिश करते थे।

लेकिन अब भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि यह दोहरा रवैया नहीं चलेगा। यह तय किया गया है कि सीमा के हर पॉइंट और पेट्रोलिंग पॉइंट की सटीक भौगोलिक स्थिति स्पष्ट की जाएगी, ताकि भविष्य में कोई भी देश अनजाने में सीमा पार करने का बहाना न बना सके। इस फैसले ने विवाद की जड़ पर ही प्रहार किया है।

दूसरी बड़ी ‘रेड लाइन’ सेना की तैनाती और बॉर्डर मैनेजमेंट से जुड़ी है। बर्फीली चोटियों पर छोटी सी गलतफहमी भी युद्ध का कारण बन सकती है। इसे रोकने के लिए एक सख्त सैन्य प्रोटोकॉल और नए जमीनी नियम लागू करने का फैसला किया गया है।

अब सीमा पर किसी भी हिंसक झड़प को रोकने के लिए एक एडवांस रियल-टाइम कम्युनिकेशन सिस्टम विकसित किया जा रहा है। इसका मतलब है कि किसी भी संदेहास्पद हलचल होने पर स्थानीय कमांडर तुरंत हॉटलाइन पर संपर्क कर सकेंगे। यह नया सिस्टम गलवान जैसी घटनाओं को भविष्य में रोकने के लिए एक बड़ा गेमचेंजर साबित होगा।

तीसरी और अंतिम ‘रेड लाइन’ है – दीर्घकालिक शांति और आपसी सहयोग। दोनों देशों ने सहमति जताई है कि सीमावर्ती इलाकों में वर्तमान शांति और स्थिरता को हर हाल में बरकरार रखा जाएगा। यह कोई खोखला वादा नहीं, बल्कि शीर्ष नेतृत्व का दृढ़ संकल्प है।

यह तय किया गया है कि राजनयिक और सैन्य स्तर पर बातचीत के द्वार 24 घंटे खुले रहेंगे, चाहे हालात कितने भी तनावपूर्ण क्यों न हों। भारत और चीन दोनों ही समझ चुके हैं कि विवादों का हल बंदूकों से नहीं बल्कि मेज पर बैठकर ही निकल सकता है। इन तीन रेड लाइन्स के जरिए दोनों देशों ने एक नए युग की शुरुआत का संकेत दिया है।

इस कूटनीतिक चाल ने पाकिस्तान के ‘चाइना कार्ड’ को पूरी तरह बेकार कर दिया है। पाकिस्तान को लगता था कि भारत-चीन तनाव का वह फायदा उठाता रहेगा, लेकिन इस बैठक ने उसके अरमानों पर पानी फेर दिया। पाकिस्तान अब इस डर में है कि यदि भारत-चीन संबंध सुधर गए, तो वह दुनिया में बिल्कुल अकेला पड़ जाएगा।

वहीं, अमेरिका और पश्चिमी देशों में भी इस बैठक से हलचल है। वे हमेशा से भारत-चीन विवाद को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते आए हैं। यदि एशिया की ये दो ताकतें एक हो गईं, तो यह पश्चिमी वर्चस्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी और एक नए ‘वर्ल्ड ऑर्डर’ की शुरुआत होगी।

इस बैठक की एक और बड़ी सफलता यह रही कि दोनों देशों ने शांति का भविष्य का रोडमैप तैयार कर लिया है। विशेष प्रतिनिधियों (SR) की 25वीं दौर की वार्ता के लिए सहमति बन गई है, जो सीमा विवाद के स्थायी समाधान का सबसे शक्तिशाली मंच है। यह दिखाता है कि दोनों देश अब इस मुद्दे को और अधिक खींचना नहीं चाहते।

अंततः, इस कूटनीतिक घटनाक्रम ने भारतीय विदेश नीति का लोहा मनवाया है। बिना किसी बाहरी दबाव के अपनी शर्तों पर बात करना आज के नए भारत की पहचान है। चीन को भी समझ आ गया है कि भारत को दरकिनार कर वह अपनी वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकता। यह समझदारी पूरे विश्व की राजनीति के लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित होगी।

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