पिछले पचास वर्षों से एक विशिष्ट राजनीतिक ढर्रे पर चल रहे पश्चिम बंगाल में, जहाँ तुष्टिकरण की राजनीति ने बहुसंख्यक समाज को किनारे कर दिया था, वहाँ केवल सात दिनों के भीतर एक ऐसा प्रशासनिक तूफान आया है जिसने पूरे सिस्टम की जड़ें हिला दी हैं। मुख्यमंत्री पद संभालते ही शुभेंदु अधिकारी ने उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध ‘योगी मॉडल’ को बंगाल की धरती पर उतार दिया है। यह एक ऐसा राजनीतिक और प्रशासनिक भूकंप है, जिसकी गूंज न केवल कोलकाता के नबन्ना और राइटर्स बिल्डिंग में सुनाई दे रही है, बल्कि इसकी धमक दिल्ली से लेकर ढाका तक महसूस की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ भी हैरान हैं कि जो राज्य दशकों से अव्यवस्था के दलदल में था, वहाँ महज एक हफ्ते में ‘राष्ट्र प्रथम’ की नीति के तहत इतने कड़े निर्णय कैसे ले लिए गए।
बंगाल की जनता जिस बड़े सांस्कृतिक बदलाव की प्रतीक्षा कर रही थी, नई सरकार ने उसकी नींव रख दी है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने पहला ऐतिहासिक फैसला लेते हुए राज्य के सभी विद्यालयों में ‘वंदे मातरम’ का सामूहिक गायन अनिवार्य कर दिया है। यह केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि बंगाल की उस महान सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने का संकल्प है जिसने कभी भारत के स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया था। यह उन शक्तियों को कड़ा जवाब है जो बंगाल की भूमि का उपयोग राष्ट्रविरोधी एजेंडे के लिए करती रही हैं।
प्रशासन ने दूसरा बड़ा प्रहार ध्वनि प्रदूषण और सार्वजनिक स्थलों के दुरुपयोग पर किया है। बिना किसी भेदभाव के, पूरे राज्य में धार्मिक स्थलों से अवैध और बिना अनुमति के लगे लाउडस्पीकरों को हटाने का अभियान युद्धस्तर पर शुरू हो गया है। कानून का शासन स्थापित करते हुए सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि तुष्टिकरण का युग अब समाप्त हो चुका है। सामान्य नागरिकों को शोर-शराबे से मुक्ति दिलाने के लिए इसे एक अत्यंत साहसिक कदम माना जा रहा है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए गोवंश संरक्षण हेतु एक कठोर कानून लागू किया गया है। पूरे राज्य में गौ-हत्या और गोवंश के अवैध परिवहन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। पशु तस्करी के सिंडिकेट, जो राज्य की सामाजिक व्यवस्था को हानि पहुँचा रहे थे, उनके खिलाफ ताबड़तोड़ कार्रवाई जारी है। सीमावर्ती क्षेत्रों में पुलिस को निर्देश दिए गए हैं कि तस्करी के नेटवर्क को जड़ से समाप्त किया जाए। इन फैसलों ने स्पष्ट कर दिया है कि नई सरकार किसी भी दबाव में नहीं आने वाली।
कानून-व्यवस्था के साथ-साथ सरकार ने ‘अंत्योदय’ की भावना से मात्र पांच रुपये में ‘माच भात’ (मछली-चावल) की थाली उपलब्ध कराने की योजना शुरू की है। यह उन लोगों के लिए करारा जवाब है जो खुद को गरीबों का हितैषी बताते थे, लेकिन जनता को बुनियादी जरूरतों के लिए तरसाते थे। पांच रुपये में पौष्टिक भोजन मिलने से निर्धन वर्ग में सरकार के प्रति अटूट विश्वास पैदा हुआ है। राष्ट्रवाद और जनकल्याण का यह समन्वय ही नई व्यवस्था की शक्ति है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर, बांग्लादेश सीमा से होने वाली अवैध घुसपैठ को रोकने के लिए मुख्यमंत्री ने सबसे बड़ा प्रहार किया है। सीमावर्ती जिलों में कटीली बाड़ (फेंसिंग) लगाने के कार्य को अभूतपूर्व गति दी गई है। सालों से भूमि अधिग्रहण के नाम पर लटकी फाइलों को निपटाने के लिए आदेश जारी कर दिए गए हैं कि अगले छह महीनों के भीतर जमीन हस्तांतरण की प्रक्रिया पूर्ण की जाए।
महज छह दिनों में जटिल तकनीकी मसलों को सुलझाना सरकार की इच्छाशक्ति को दर्शाता है। सीमा सुरक्षा बल (BSF) को पूर्ण सहयोग दिया जा रहा है ताकि घुसपैठ के रास्ते बंद हो सकें। इसके साथ ही राज्य के सभी मदरसों की गतिविधियों की गहन जांच शुरू कर दी गई है। जांच एजेंसियों को स्पष्ट निर्देश हैं कि राष्ट्रविरोधी गतिविधियों या युवाओं को गुमराह करने वाले किसी भी संस्थान पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
अपराधियों और माफियाओं के खिलाफ विशेष अभियान शुरू होने से सिंडिकेट राज खत्म होने की कगार पर है। जो बाहुबली पहले सत्ता के संरक्षण में घूमते थे, वे अब अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे हैं। पुलिस की निष्पक्ष कार्रवाई से अपराधियों में ऐसा खौफ है कि वे स्वयं आत्मसमर्पण कर रहे हैं। इसके साथ ही, अवैध घुसपैठियों को चिन्हित कर बाहर निकालने की मुकम्मल तैयारी कर ली गई है।
बदलती जनसांख्यिकी (Demography) को देखते हुए एक अत्याधुनिक डिजिटल डेटाबेस तैयार किया जा रहा है। स्थानीय प्रशासन और केंद्रीय एजेंसियां मिलकर संदिग्ध नागरिकों के दस्तावेजों की बारीकी से जांच कर रही हैं। घुसपैठियों के वोट बैंक पर राजनीति करने वालों का आधार खिसक चुका है। शुभेंदु सरकार का रुख स्पष्ट है कि बंगाल को अब किसी भी देशविरोधी साजिश का अड्डा नहीं बनने दिया जाएगा।
इस प्रशासनिक परिवर्तन से विपक्षी खेमे में खलबली है। अस्सी साल बाद बंगाल में कानून का राज स्थापित होते देख ममता बनर्जी इस कदर बौखला गईं कि वे स्वयं वकील की पोशाक पहनकर हाई कोर्ट पहुँच गईं। सरकार बने अभी छह दिन ही हुए थे कि उन्होंने कानूनी आरोपों की झड़ी लगा दी, जिससे उनकी राजनीतिक हताशा साफ झलक रही है।
जनता सब कुछ देख रही है। जब ममता बनर्जी हाई कोर्ट से बाहर निकल रही थीं, तब वकीलों और आम जनता ने उनके खिलाफ नारेबाजी की। यह जनता का दबा हुआ आक्रोश है जो अब बाहर आ रहा है। लोग पुरानी सरकार के भ्रष्टाचार और तानाशाही से पूरी तरह ऊब चुके हैं।
ऐसा ही विरोध महुआ मोइत्रा को भी झेलना पड़ा। जनता का यह बदलता मिजाज संकेत है कि अब मनमानी नहीं चलेगी। कानूनी मोर्चे पर भी तृणमूल कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ रही हैं, क्योंकि बार काउंसिल ने ममता बनर्जी के पुराने रिकॉर्ड तलब कर लिए हैं। भ्रष्टाचार, कटमनी और टोलाबाजी का हिसाब अब कानून को देना ही होगा।
अभिषेक बनर्जी के लिए भी आने वाला समय चुनौतीपूर्ण है। राज्य के संसाधनों की लूट और नौकरियों की बिक्री की जांच निर्णायक दौर में है। घुसपैठियों को संरक्षण देकर बंगाल के स्वरूप को बदलने का जो खेल खेला गया, उसका पर्दाफाश हो चुका है।
पूर्ववर्ती सरकार ने हमेशा संवैधानिक मर्यादाओं को चुनौती दी। अभिषेक बनर्जी को मुख्यमंत्री बनाने और खुद प्रधानमंत्री बनने का सपना अब चकनाचूर हो चुका है। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी दलों ने भी ममता बनर्जी से किनारा कर लिया है, जिससे उनकी दिल्ली जाने की राह और कठिन हो गई है।
बंगाल में वामपंथ और तृणमूल के कुशासन का अंत हो चुका है। बिना राष्ट्रपति शासन लगाए, लोकतांत्रिक तरीके से जनता ने इस भ्रष्ट व्यवस्था को उखाड़ फेंका है। प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की चाणक्य नीति ने बंगाल में एक ऐसी मजबूत सरकार दी है, जिसने महज एक हफ्ते में कानून का इकबाल बुलंद कर दिया है।

