आसमान की अनंत ऊंचाइयों में जब युद्ध की रणनीति तैयार होती है, तो वहां छिपने के लिए जमीन जैसा कोई सहारा नहीं होता। वहां केवल एक ही नियम प्रभावी है – जिसकी नजर पहले पड़ेगी, वही विजयी होगा। चीन अपने J-20 स्टील्थ फाइटर और पाकिस्तान अपने अमेरिकी F-16 के भरोसे इस भ्रम में थे कि वे भारतीय रडार को चकमा देकर घुसपैठ कर लेंगे। ड्रैगन को अपनी रडार-रोधी तकनीक पर अटूट विश्वास था, लेकिन अब भारतीय वायुसेना और हमारे वैज्ञानिकों ने इस हवाई घमंड को तोड़ने का पुख्ता इंतजाम कर लिया है। भारत ने रक्षा क्षेत्र में एक ऐसा क्रांतिकारी कदम उठाया है, जिसके बाद दुश्मन के लड़ाकू विमान हमारी सीमाओं की ओर देखने से पहले भी डरेंगे। उन्हें आभास होगा कि आसमान में भारत की ‘तीसरी आंख’ उस वक्त भी उन्हें ट्रैक कर रही होगी, जब उन्होंने अपने एयरबेस पर इंजन चालू किया होगा।
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने एक ऐतिहासिक टेंडर जारी किया है, जिसने वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यह केवल एक सामान्य तकनीकी सुधार नहीं है, बल्कि हवाई सुरक्षा के क्षेत्र में एक ऐसी लंबी छलांग है जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन को बदल देगी। भारत अपने आगामी एयरबॉर्न सर्विलांस विमान के नोज सेक्शन (नाक) पर एक अत्यंत आधुनिक रडार सिस्टम लगाने जा रहा है, जो दुश्मन के गुप्त मिशनों को हवा में ही नाकाम करने की क्षमता रखता है। आइए समझते हैं कि हमारे निगरानी तंत्र में ऐसा क्या बड़ा बदलाव हो रहा है, जिससे बीजिंग और रावलपिंडी में हलचल तेज हो गई है।
हवाई अभियानों में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका ‘एयरबॉर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल’ (AEW&C) विमानों की होती है, जिन्हें ‘अवाक्स’ भी कहा जाता है। ये आसमान में उड़ते हुए शक्तिशाली कमांड सेंटर की तरह होते हैं। जमीनी रडार की एक सीमा होती है; पृथ्वी की गोलाई और ऊंचे पहाड़ों के कारण वे कम ऊंचाई पर उड़ने वाले या सुदूर विमानों को समय रहते नहीं पकड़ पाते। इसी चुनौती को हल करने के लिए शक्तिशाली रडार को विमानों के ऊपर फिट किया जाता है। हालांकि, मौजूदा सर्विलांस विमानों में एक बड़ी तकनीकी कमी रही है, जिसे विमानन की भाषा में ‘फ्रंटल ब्लाइंड स्पॉट’ कहा जाता है।
इस ‘ब्लाइंड स्पॉट’ को एक सरल उदाहरण से समझें। कल्पना कीजिए कि आप 300 किमी की गति से कार चला रहे हैं, लेकिन आपकी कार के सामने वाले शीशे पर काला पर्दा पड़ा है। आप केवल अपनी खिड़कियों के दाएं और बाएं देख सकते हैं। ऐसी स्थिति में सामने से आने वाले खतरे का पता लगाना असंभव होगा। सामने देखने के लिए आपको कार को बार-बार मोड़ना पड़ेगा, जो बेहद जोखिम भरा हो सकता है।
यही समस्या पुराने टोही विमानों के साथ भी थी। इन विमानों के ऊपर लगा रडार बीम या छतरी के आकार का होता है। यह दाएं और बाएं तो 400 किमी तक देख सकता है, लेकिन विमान के ठीक सामने और पीछे क्या हलचल है, वहां यह ‘अंधा’ हो जाता है। इसी 60 से 90 डिग्री के अंधेरे क्षेत्र का फायदा उठाकर दुश्मन के फाइटर जेट सामने से हमला करने की कोशिश करते थे।
भारत के ‘नेत्रा मार्क-2’ प्रोजेक्ट ने इस कमजोरी का समाधान खोज लिया है। DRDO अब इस नए विमान की नाक (Nose Section) पर एक विशेष ‘एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे’ (AESA) रडार लगाने जा रहा है। जैसे ही यह रडार नेत्रा मार्क-2 में फिट होगा, सामने का वह अंधा इलाका पूरी तरह से स्पष्ट हो जाएगा। अब दुश्मन का कोई भी पायलट सामने से या नीचे से छिपकर वार नहीं कर पाएगा। भारतीय सीमा में प्रवेश करने की कोशिश करते ही नेत्रा का यह रडार उसे तुरंत स्कैन कर लेगा।
इस क्रांतिकारी रडार प्रणाली को तकनीकी भाषा में ‘सेकेंडरी एसा एरे’ (SAA) कहा जा रहा है। गर्व की बात यह है कि इसके लिए भारत को किसी विदेशी राष्ट्र की सहायता की आवश्यकता नहीं है। इसे भारत के अपने ‘उत्तम एसा रडार’ (Uttam AESA Radar) की तकनीक से विकसित किया जा रहा है। उत्तम रडार वही प्रणाली है जिसने अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार में अपनी धाक जमाई है और जिसे तेजस मार्क-1A और तेजस मार्क-2 के लिए विशेष रूप से बनाया गया है।
यहां एक महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू है। एक लड़ाकू विमान और सर्विलांस विमान के रडार में अंतर होता है। फाइटर जेट को डॉगफाइट के लिए फुर्तीले रडार की जरूरत होती है, जो छोटे लक्ष्य को तुरंत लॉक कर सके। वहीं, नेत्रा मार्क-2 जैसे विमान का कार्य बिना रुके घंटों तक एक बड़े क्षेत्र की निगरानी करना और पूरे आसमान का डिजिटल मानचित्र तैयार करना है।
इसी कारण, भले ही इसका सॉफ्टवेयर और कोर ‘गैलियम नाइट्राइड’ (GaN) तकनीक उत्तम रडार से ली गई है, लेकिन इसके हार्डवेयर को निगरानी मिशनों के अनुरूप पुनर्गठित किया जा रहा है। आज ‘गैलियम नाइट्राइड’ को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ रडार तकनीक माना जाता है। इसकी विशेषता यह है कि यह कम बिजली खर्च करके अत्यंत शक्तिशाली रेडियो तरंगें पैदा करती है, जो चीन के J-20 जैसे ‘रडार एब्जॉर्बेंट’ पेंट वाले स्टील्थ विमानों को भी खोज निकालने में सक्षम है।
इस मिशन के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने ‘एयरबस A321’ (Airbus A321) विमान का चयन किया है। यह एक विशालकाय और आधुनिक प्लेटफॉर्म है। तेजस जैसे छोटे विमानों के विपरीत, एयरबस में उपकरणों और कूलिंग सिस्टम के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध है।
किसी भी शक्तिशाली रडार के संचालन के लिए भारी बिजली और प्रभावी कूलिंग सिस्टम की आवश्यकता होती है। रडार जितनी अधिक शक्ति का होगा, वह उतनी ही अधिक गर्मी पैदा करेगा। यदि यह गर्मी तुरंत कम न की जाए, तो रडार के सर्किट जल सकते हैं। एयरबस A321 के शक्तिशाली इंजन पर्याप्त बिजली प्रदान करते हैं और इसमें बड़े लिक्विड कूलिंग सिस्टम फिट करने के लिए भरपूर जगह है, जो इसे इस मिशन हेतु आदर्श बनाती है।
नोज-माउंटेड एसा रडार की मारक क्षमता प्रभावशाली है। इसमें लगभग 700 से 800 ‘ट्रांसमिट/रिसीव मॉड्यूल’ (TRMs) लगाए जा रहे हैं। पुराने रडार में एक ही ट्रांसमीटर होता था, जिसके खराब होते ही पूरा सिस्टम फेल हो जाता था।
लेकिन आधुनिक एसा रडार में सैकड़ों स्वतंत्र एंटीना (TRMs) होते हैं। यदि युद्ध के दौरान कुछ मॉड्यूल खराब भी हो जाएं, तब भी बाकी मॉड्यूल अपना काम पूरी क्षमता से करते रहते हैं। दुश्मन के लिए इस रडार को पूरी तरह जाम करना या निष्क्रिय करना लगभग असंभव है।
जब ये 800 मॉड्यूल एयरबस A321 की बिजली सप्लाई के साथ सक्रिय होंगे, तो यह रडार 175 से 200 किलोमीटर की दूरी से ही दुश्मन के लड़ाकू विमानों को ट्रैक करना शुरू कर देगा। इसका अर्थ है कि सीमा पार से टेकऑफ करते ही दुश्मन का विमान नेत्रा मार्क-2 की रडार स्क्रीन पर नजर आने लगेगा।
DRDO का यह स्वदेशी प्रयास केवल एक अपग्रेड नहीं, बल्कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ का गौरवपूर्ण प्रदर्शन है। जब यह तकनीक हमारे आसमान की पहरेदार बनेगी, तो विदेशी स्टील्थ तकनीक का अहंकार धराशायी हो जाएगा। भारतीय वायुसेना की यह बढ़ती शक्ति हर नागरिक को गर्व की अनुभूति कराएगी, क्योंकि अब आसमान का वास्तविक नियंत्रण भारत के हाथों में होगा।

