पाकिस्तान का नक्शा अब निर्णायक रूप से बदलने की कगार पर है। इस्लामाबाद के सत्ताधीशों की रातों की नींद उड़ चुकी है और रावलपिंडी के जनरलों को यह समझ नहीं आ रहा कि वे मुल्क को बचाएं या अपनी सत्ता। आज की सबसे बड़ी खबर यह है कि पाकिस्तान एक साथ दो मोर्चों पर जल रहा है, और यह विद्रोह अब थमने वाला नहीं है। एक ओर पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में जनता सड़कों पर है, तो दूसरी ओर बलूचिस्तान ने खुले तौर पर अपनी आज़ादी का बिगुल फूंक दिया है। बलूचिस्तान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अब पाकिस्तान का हिस्सा बने रहने को तैयार नहीं है।
यह केवल विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि एक पूरे सिस्टम के ध्वस्त होने की कहानी है। जहाँ PoK के लोग आटा, दाल और बिजली जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं बलूचिस्तान ने पाकिस्तानी हुकूमत को उखाड़ फेंकने का संकल्प ले लिया है। इस लेख में हम इस जिओपॉलिटिकल संकट की असलियत को समझेंगे और जानेंगे कि कैसे बलूचिस्तान के विद्रोह ने पाकिस्तान के साथ-साथ चीन को भी चिंता में डाल दिया है।
जुलाई का महीना पाकिस्तान के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं रहा। बलूचिस्तान में हिंसा इस कदर बढ़ी है कि पाकिस्तानी फौज रक्षात्मक मुद्रा में आ गई है। 17 जुलाई को मस्तुंग में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के काफिले पर एक बड़ा हमला हुआ, जिसकी जिम्मेदारी बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने ली है। इस भीषण टकराव में पाकिस्तानी सेना को भारी जनहानि हुई है, जिसमें दर्जनों जवानों के मारे जाने की खबरें हैं।
हालात इस कदर अनियंत्रित हैं कि केवल जुलाई के दूसरे हफ्ते में ही विभिन्न अभियानों में पाकिस्तान के 40 से अधिक सुरक्षाकर्मी मारे गए। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि बलूचिस्तान पर पाकिस्तान का नियंत्रण लगभग समाप्त हो रहा है। वहां के स्थानीय गुट अब आर-पार की लड़ाई लड़ रहे हैं और किसी भी समझौते के मूड में नहीं हैं। उग्रवादी गतिविधियों में आया यह उछाल पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
दूसरी तरफ, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) की स्थिति भी सरकार के लिए शर्मिंदगी का सबब बनी हुई है। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में जारी जन आंदोलनों ने पाकिस्तान की चरमराई अर्थव्यवस्था और खराब शासन व्यवस्था की पोल खोल दी है।
PoK में लोग भुखमरी के कगार पर हैं। गेहूं और आटे की कीमतें आसमान छू रही हैं, और बिजली के बिल जनता की पहुंच से बाहर हो चुके हैं। राजनीतिक अधिकारों के अभाव में वहां की अवाम अब यह समझ चुकी है कि इस्लामाबाद केवल उनका शोषण कर रहा है। PoK में बार-बार होने वाले शटडाउन और हिंसक प्रदर्शन पाकिस्तान के इस दमनकारी तंत्र से आज़ादी की पुकार हैं।
रणनीतिक रूप से देखा जाए तो बलूचिस्तान का मुद्दा PoK से कहीं अधिक गंभीर है। पाकिस्तान के लिए PoK मुख्यतः भारत के खिलाफ सैन्य राजनीति और लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) पर नियंत्रण का एक जरिया है। इसका उपयोग वह जल संसाधनों और मिलिट्री बफर जोन के रूप में करता है।
लेकिन बलूचिस्तान का मामला पाकिस्तान के अस्तित्व से जुड़ा है। यह पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है जो उसे अरब सागर तक पहुंच प्रदान करता है। यदि बलूचिस्तान अलग होता है, तो पाकिस्तान वैश्विक व्यापार मार्गों से पूरी तरह कट जाएगा। ईरान और अफगानिस्तान की सीमाओं से लगा यह प्रांत सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसमें ग्वादर और ओरमारा जैसे प्रमुख तटीय क्षेत्र शामिल हैं।
खनिजों के मामले में बलूचिस्तान सोने की खान है। यहाँ तांबा, सोना और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार मौजूद हैं। हालांकि, पाकिस्तान ने हमेशा यहाँ के संसाधनों का दोहन किया और स्थानीय लोगों को गरीबी में धकेला। इसलिए, बलूचिस्तान की आज़ादी का मतलब पाकिस्तान के व्यापारिक मार्गों और ऊर्जा सुरक्षा का हमेशा के लिए समाप्त हो जाना है।
इस संघर्ष में चीन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC), जो बीजिंग का ड्रीम प्रोजेक्ट है, पूरी तरह बलूचिस्तान पर निर्भर है। ग्वादर पोर्ट इस परियोजना का केंद्र बिंदु है, जिसके लिए चीन ने अरबों डॉलर का निवेश किया है ताकि उसे अरब सागर तक सीधा रास्ता मिल सके।
बलूचिस्तान में उठती आज़ादी की लहर ने चीन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। CPEC की अधिकांश संपत्तियां और बुनियादी ढांचा इसी अशांत क्षेत्र में हैं। बलूचिस्तान में अस्थिरता का सीधा अर्थ है चीनी परियोजनाओं और वहां काम कर रहे चीनी नागरिकों की सुरक्षा पर बड़ा खतरा।
यदि पाकिस्तान बलूचिस्तान पर अपना नियंत्रण खोता है, तो चीन को भारी सुरक्षा लागत चुकानी होगी और उसका ग्वादर के जरिए व्यापार करने का सपना अधूरा रह सकता है। बलूचिस्तान की मांग अब केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं, बल्कि चीन के वैश्विक कॉरिडोर प्लान के लिए एक अस्तित्वगत खतरा बन गई है।
पाकिस्तान आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। कश्मीर उसके लिए राष्ट्रीय पहचान का मुद्दा हो सकता है, लेकिन वह पाकिस्तान को कोई बड़ा आर्थिक या समुद्री लाभ नहीं देता।
इसके विपरीत, बलूचिस्तान पाकिस्तान की जीवनरेखा है। यहीं पर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था, निर्यात और चीन की रणनीतिक योजनाएं आपस में मिलती हैं। यदि बलूचिस्तान की यह चिंगारी नहीं बुझी, तो यह न केवल पाकिस्तान के भूगोल को बदल देगी, बल्कि चीन के खरबों डॉलर के निवेश को भी राख कर देगी।
पाकिस्तानी सत्ता फिलहाल लाचार दिखाई दे रही है। एक ओर PoK की विद्रोही जनता है और दूसरी ओर अपनी आज़ादी के लिए संघर्षरत बलूच लड़ाके। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पाकिस्तान इस चक्रव्यूह से निकल पाएगा, या दुनिया के नक्शे पर बहुत जल्द एक नया स्वतंत्र देश ‘बलूचिस्तान’ उभरेगा।

