आर्मेनिया में भारत का महा-मास्टरस्ट्रोक: तुर्की और पाकिस्तान के ‘इस्लामिक नाटो’ की बढ़ी मुसीबतें

भारत ने आर्मेनिया के दुर्गम पहाड़ों में ऐसा कौन सा ‘ब्रह्मोस जाल’ बिछाया है, जिसने रातों-रात तुर्की और अजरबैजान के हुक्मरानों की नींद उड़ा दी है? कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान और तुर्की जो नापाक साजिशें रच रहे थे, भारत ने उनके ही घर यानी काकेशस क्षेत्र में उसकी काट कैसे तैयार कर दी? दशकों तक रूसी हथियारों के दम पर रहने वाला आर्मेनिया, अचानक ‘मेड इन इंडिया’ हथियारों का सबसे बड़ा रणनीतिक केंद्र कैसे बन गया? 2020 के युद्ध में बेकार साबित हुए आर्मेनिया के सुखोई विमानों में भारत ने अस्त्र मिसाइल का कौन सा ब्रह्मास्त्र फिट करने का वादा किया है, जिससे तुर्की के एफ-16 विमानों में खौफ है? और क्या भारतीय सेना माइनस डिग्री तापमान में आर्मेनिया को ऐसी गुप्त ट्रेनिंग दे रही है जो एर्दोगन के जांगेजुर कॉरिडोर के सपने को चकनाचूर कर देगी?

वैश्विक भू-राजनीति की अंदरूनी कहानी

आज हम आपको ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स की वह इनसाइड स्टोरी बताएंगे, जिसने ‘इस्लामिक नाटो’ और उसके नेताओं की स्थिति नाजुक कर दी है। इस पूरे खेल में आर्मेनिया भारत का सबसे बड़ा तुरुप का इक्का बनकर उभरा है। दक्षिण काकेशस क्षेत्र फिलहाल वैश्विक राजनीति का केंद्र बन गया है। पहले भारत को एक ‘सॉफ्ट स्टेट’ माना जाता था जो केवल अपनी सीमाओं में सिमटा रहता था, लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। आर्मेनिया अब भारत के लिए सिर्फ एक सहयोगी नहीं, बल्कि यूरेशिया में भारत की रक्षात्मक रणनीति का एक प्रमुख आधार स्तंभ है। 2020 के नागोर्नो-काराबाख संघर्ष के बाद भारत ने मूकदर्शक की नीति छोड़कर एक आक्रामक वैश्विक शक्ति की भूमिका अपना ली है। आर्मेनिया के साथ भारत का रक्षा समझौता केवल व्यापार नहीं, बल्कि तुर्की, अजरबैजान और पाकिस्तान के उस त्रिकोणीय गठबंधन को करारा जवाब है, जिसे ‘इस्लामिक नाटो’ कहा जा रहा है।

इस्लामिक नाटो और त्रिपक्षीय गठबंधन का सच

इस त्रिपक्षीय गठजोड़ को समझना आवश्यक है। अजरबैजान, तुर्की और पाकिस्तान ने ‘थ्री ब्रदर्स’ के नाम से एक सैन्य गठबंधन बनाया है। इसके तीन मुख्य आधार हैं: एर्दोगन की विस्तारवादी नीतियां, अजरबैजान का तेल संसाधन और पाकिस्तान की सैन्य सहायता। पाकिस्तान दुनिया का वह एकमात्र देश है जो आर्मेनिया के अस्तित्व को ही नहीं मानता। 2020 के युद्ध में तुर्की और पाकिस्तान ने मिलकर अजरबैजान की मदद की थी, जिसके बदले में ये देश अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर मुद्दे पर भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं। भारत ने इसी की काट के लिए आर्मेनिया को मजबूत करना शुरू किया। कूटनीति का नियम है कि दुश्मन को उसके ही पिछवाड़े में घेरो। अगर तुर्की पाकिस्तान के जरिए भारत को घेरना चाहता है, तो भारत ने आर्मेनिया के जरिए तुर्की के पड़ोस में अपनी पकड़ मजबूत कर ली है।

जांगेजुर कॉरिडोर पर भारत का पलटवार

जांगेजुर कॉरिडोर एक ऐसा मार्ग है जो अजरबैजान को सीधे तुर्की से जोड़ेगा। यदि यह बन गया, तो तुर्की का मध्य एशिया में प्रभाव बहुत बढ़ जाएगा। भारत इस कॉरिडोर को किसी भी कीमत पर रोकना चाहता है क्योंकि यह पाकिस्तान और तुर्की के गठबंधन को और अधिक घातक बना देगा। आर्मेनिया को पिनाका रॉकेट सिस्टम और आकाश एयर डिफेंस देकर भारत ने उसकी सुरक्षा को इतना मजबूत कर दिया है कि अजरबैजान अब सैन्य बल के प्रयोग से पहले कई बार सोचेगा।

मल्टी-लेयर्ड एयर डिफेंस और युद्धाभ्यास की ताकत

भारत सिर्फ हथियार नहीं बेच रहा, बल्कि एक अभेद्य सुरक्षा कवच तैयार कर रहा है। आर्मेनिया ने हाल ही में भारत के आकाश और ईरान के माजिद एयर डिफेंस सिस्टम के साथ व्यापक युद्धाभ्यास किया है। येरेवन की रिपोर्ट्स बताती हैं कि आर्मेनिया अपनी सैन्य शक्ति को आधुनिक बना रहा है। भारत का आकाश एयर डिफेंस सिस्टम, जिसे वहां ‘लुसान’ नाम दिया गया है, 30 किलोमीटर तक के हवाई खतरों को नष्ट करने में सक्षम है। यह सिस्टम मध्यम और कम ऊंचाई पर आने वाले दुश्मन के ड्रोन और विमानों के लिए काल है। इसके साथ ही ईरान का माजिद सिस्टम छोटी दूरी की सुरक्षा प्रदान करता है। आर्मेनिया अब एक ऐसा मल्टी-लेयर्ड रक्षा ढांचा बना रहा है जो अजरबैजान के ड्रोन हमलों को पूरी तरह नाकाम कर देगा।

भारतीय तोपखाने और रॉकेटों का दबदबा

हवा के साथ-साथ जमीन पर भी भारतीय हथियारों ने दहशत पैदा कर दी है। आर्मेनिया ने भारत से एटाग्स (ATAGS) तोपें और पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर खरीदे हैं। एटाग्स तोप 48 से 80 किलोमीटर तक सटीक निशाना साध सकती है और पहाड़ों में यह अत्यंत घातक है। वहीं पिनाका रॉकेट सिस्टम मात्र 44 सेकंड में 12 रॉकेट दागकर दुश्मन के बेस को तबाह कर सकता है। इसके साथ ही ‘स्वाति’ वेपन लोकेटिंग रडार दुश्मन की फायरिंग पोजीशन का तुरंत पता लगा लेता है। जब आर्मेनिया ने अपनी परेड में इन हथियारों का प्रदर्शन किया, तो इसका सीधा संदेश तुर्की और पाकिस्तान तक पहुंच गया कि अब आर्मेनिया अकेला नहीं है।

अस्त्र और ब्रह्मोस: गेमचेंजर रक्षा सौदे

असली हलचल तो अस्त्र और ब्रह्मोस मिसाइल को लेकर है। अब तक भारत आर्मेनिया को रक्षात्मक हथियार दे रहा था, लेकिन अब उसे आक्रामक शक्ति बनाने की तैयारी है। आर्मेनिया के सुखोई विमान 2020 के युद्ध में इसलिए नहीं उड़ पाए क्योंकि उनके पास सही मिसाइलें नहीं थीं। भारत अब इन विमानों को अपनी स्वदेशी ‘अस्त्र’ मिसाइल से लैस करने जा रहा है, जिसकी मारक क्षमता 110 किलोमीटर है। यह मिसाइल अजरबैजान के एफ-16 और पाकिस्तान के जेएफ-17 विमानों को हवा में ही ढेर कर देगी।

सबसे बड़ी खबर ब्रह्मोस मिसाइल की संभावित तैनाती है। 290 से 400 किलोमीटर की रेंज वाली यह सुपरसोनिक मिसाइल अजरबैजान की राजधानी बाकू और उसके तेल संसाधनों को सीधे निशाने पर ले सकती है। ब्रह्मोस को दुनिया का कोई भी मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम नहीं रोक सकता। इसकी तैनाती का मतलब होगा कि अजरबैजान की पूरी अर्थव्यवस्था आर्मेनिया की एक स्ट्राइक की जद में होगी। यह आर्मेनिया को एक जबरदस्त मनोवैज्ञानिक बढ़त देगा।

रूस से दूरी और भारत पर भरोसा

ऐतिहासिक रूप से आर्मेनिया रूस पर निर्भर था, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की प्राथमिकताएं बदल गईं। जब अजरबैजान ने घुसपैठ की, तो रूस ने मदद नहीं की। इसी धोखे के बाद आर्मेनिया ने भारत की ओर हाथ बढ़ाया। भारत ने न केवल दो अरब डॉलर के हथियार दिए, बल्कि उनकी समय पर डिलीवरी भी सुनिश्चित की। भारतीय हथियार पश्चिमी देशों की तुलना में सस्ते और रूसी हथियारों से अधिक आधुनिक हैं, जिसने आर्मेनिया के भरोसे को और मजबूत किया है।

इस रणनीतिक साझेदारी की मजबूती तब दिखी जब ईरान संकट के दौरान आर्मेनिया ने भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए सुरक्षित रास्ता दिया। प्रधानमंत्री मोदी और आर्मेनियाई प्रधानमंत्री निकोल पशिनियन के बीच बढ़ते संवाद इस बात का प्रमाण हैं कि यह रिश्ता अब रक्षा से आगे बढ़कर तकनीक और व्यापार तक फैल चुका है।

नई वैश्विक रणनीति और भारत का बढ़ता कद

भारत और आर्मेनिया के संबंध सदियों पुराने हैं, लेकिन आज वे हथियारों और खुफिया सहयोग से नई ऊंचाइयां छू रहे हैं। भारत अब आर्मेनिया को रियल-टाइम इंटेलिजेंस और साइबर सुरक्षा में भी मदद कर रहा है। पाकिस्तान की साइबर सेना के हमलों को नाकाम करने के लिए भारतीय विशेषज्ञ आर्मेनिया की मदद कर रहे हैं। साथ ही, इसरो के माध्यम से आर्मेनिया को महत्वपूर्ण सैटेलाइट डेटा भी उपलब्ध कराया जा रहा है। भारतीय सेना के विशेषज्ञ आर्मेनियाई सैनिकों को पर्वतीय युद्ध की विशेष ट्रेनिंग दे रहे हैं।

आर्थिक मोर्चे पर भी भारत ‘इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर’ में अजरबैजान को बाईपास कर आर्मेनिया के जरिए यूरोप तक पहुंचने का रास्ता बना रहा है। यह तुर्की के प्रभाव को कम करने का मास्टरस्ट्रोक है। दुनिया देख रही है कि कैसे भारत ने कश्मीर में तुर्की के दखल का जवाब उसके ही आंगन में दे दिया है। ‘मेड इन इंडिया’ हथियारों का आर्मेनिया में सफल प्रदर्शन वैश्विक बाजार में भारत की साख को बढ़ा रहा है। सबसे खास बात यह है कि भारत ने यह सब रूस को नाराज किए बिना किया है।

मोदी सरकार की यह नीति 21वीं सदी के ‘ग्रेट गेम’ में भारत की सबसे बड़ी जीत है। ब्रह्मोस और अस्त्र का सौदा आर्मेनिया को एक अजेय किला बना देगा। भारत ने साबित कर दिया है कि वह अपने हितों की रक्षा के लिए सीमाओं के पार जाकर नया ‘वॉर रूम’ बना सकता है। इस्लामिक नाटो का सपना अब काकेशस की बर्फ में दफन होने वाला है, और इस पूरे खेल की डोर अब नई दिल्ली के हाथ में है।

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