हिंद महासागर में भारतीय नौसेना का नया मिसाइल ‘चक्रव्यूह’, ब्रह्मोस-NG और NASM-MR से उड़ी चीन की नींद!

हिंद महासागर की लहरों के बीच और भारतीय नौसेना के युद्धपोतों पर इन दिनों एक ऐसा सामरिक तूफान तैयार किया जा रहा है, जिसने बीजिंग से लेकर इस्लामाबाद तक के रक्षा गलियारों में खलबली मचा दी है। भारत अपने सबसे मारक हथियार ‘ब्रह्मोस’ के बाद अब ‘ग्लाइडफायर’ और ‘NASM-MR’ के रूप में एक ऐसा अभेद्य जाल बुन रहा है, जिसे भेदना किसी भी दुश्मन के लिए असंभव होगा। आखिर रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की गुप्त प्रयोगशालाओं में मिसाइलों का वह कौन सा ‘टॉप-सीक्रेट’ आर्किटेक्चर विकसित किया जा रहा है, जिसकी भनक वैश्विक खुफिया एजेंसियों को भी नहीं लगी? एक तरफ 3000 किलो की अजेय ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल है, तो दूसरी ओर हल्की और सटीक वार करने वाली छोटी मिसाइलों की एक नई फौज। जानिए क्यों भारतीय नौसेना अपना पूरा शस्त्रागार बदल रही है और इसका चीन के ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

आज हम इसी ‘डिस्ट्रिब्यूटेड लेथैलिटी’ ब्लूप्रिंट का विश्लेषण करेंगे। समंदर में आधुनिक युद्ध कौशल को लेकर आपका नजरिया आज पूरी तरह बदलने वाला है।

वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों के बीच हाल ही में यह चर्चा तेज हुई है कि भारत की एक नई रहस्यमयी मिसाइल, जिसे ‘ग्लाइडफायर’ प्रोजेक्ट कहा जा रहा है, जल्द ही ब्रह्मोस के साथ मोर्चा संभालेगी। भारतीय नौसेना एक ऐसा ‘मल्टी-टियर स्ट्राइक आर्किटेक्चर’ तैयार कर रही है जो अभेद्य होगा। नौसेना की रणनीति स्पष्ट है- ब्रह्मोस का उपयोग उन बड़े लक्ष्यों को नष्ट करने के लिए किया जाएगा जो दुश्मन की ताकत का मुख्य केंद्र हैं, जबकि अन्य लक्ष्यों के लिए एक नई मिसाइल श्रेणी तैयार की जा रही है।

इस रणनीति को समझने के लिए इतिहास पर नजर डालना जरूरी है। पिछले दो दशकों से भारतीय नौसेना की धाक का मुख्य आधार ‘ब्रह्मोस’ क्रूज मिसाइल रही है। ध्वनि की गति से तीन गुना तेज (मैक 3) और 450 किलोमीटर से अधिक की रेंज वाली इस मिसाइल ने दुनिया भर के नौसेना कमांडरों को हैरत में डाल रखा है। यह एक ऐसा भारी हथियार है जिसे इंटरसेप्ट करना या रोकना लगभग असंभव है। 3000 किलो की यह मिसाइल किसी भी बड़े एयरक्राफ्ट कैरियर को नष्ट करने की क्षमता रखती है, लेकिन आधुनिक युद्ध की बदलती जरूरतों ने रणनीतिकारों के सामने नई चुनौतियां पेश की हैं।

ब्रह्मोस निसंदेह सर्वश्रेष्ठ है, लेकिन यह हर छोटे खतरे का समाधान नहीं है। आज का युद्ध केवल बड़े जहाजों तक सीमित नहीं है। आधुनिक नौसैनिक युद्ध में दुश्मन छोटे गश्ती जहाजों और ड्रोन बोट्स के जरिए ‘स्वार्म अटैक’ (झुंड में हमला) करने की कोशिश करता है। चीन की नौसेना (PLAN) इसी रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे में किसी छोटी नाव को डुबाने के लिए करोड़ों की ब्रह्मोस का इस्तेमाल करना आर्थिक रूप से सही नहीं है। ब्रह्मोस को लॉन्च करने के लिए भारी साजो-सामान की जरूरत होती है, जिसे हर छोटे पोत पर फिट नहीं किया जा सकता। यहीं से ‘ग्लाइडफायर’ और ‘NASM-MR’ जैसे गेम-चेंजिंग कॉन्सेप्ट का उदय हुआ।

भारतीय नौसेना अब अपनी एकल हथियार नीति से बाहर निकल रही है। ग्लाइडफायर ब्रह्मोस का विकल्प नहीं, बल्कि उसकी सहयोगी है। यह एक बजट-अनुकूल, मध्यम दूरी का सामरिक हथियार है जिसे रूटीन ऑपरेशंस के लिए डिजाइन किया गया है। ब्रह्मोस बड़े जहाजों का सफाया करेगी, जबकि ग्लाइडफायर उन छोटे लक्ष्यों को कुशलता से निपटाएगी जिन पर महंगी ब्रह्मोस खर्च करना समझदारी नहीं है।

अब सवाल यह है कि NASM-MR क्या है? NASM-MR यानी ‘नेवल एंटी-शिप मिसाइल मीडियम रेंज’, भारत की भविष्य की नौसैनिक मारक क्षमता का सबसे अहम हिस्सा है। यह अमेरिकी ‘हार्पून’ मिसाइल को टक्कर देने वाली श्रेणी की मिसाइल है, जो लाइट टॉरपीडो और भारी ब्रह्मोस के बीच के अंतर को पाटती है।

इसकी खूबियां दुश्मन को डराने के लिए काफी हैं। 350 किलोमीटर की ऑपरेशनल रेंज, मैक 0.9 की रफ्तार और 150 किलोग्राम का घातक वारहेड इसे विशेष बनाता है। डीआरडीओ ने इसे इस तरह विकसित किया है कि इसे जहाजों, पनडुब्बियों और लड़ाकू विमानों जैसे तेजस या मिग-29K से भी दागा जा सकेगा। इससे नौसेना रडार की नजर में आए बिना ही दुश्मन के बेड़े को नष्ट कर सकेगी।

इसके अतिरिक्त, नौसेना ने NASM-SR (शॉर्ट रेंज) का भी सफल परीक्षण किया है। 55 किलोमीटर रेंज वाली यह मिसाइल हेलीकॉप्टरों से दागी जा सकती है, जो नजदीकी सुरक्षा के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करेगी।

भारतीय नौसेना एक ‘थ्री-लेयर स्ट्राइक आर्किटेक्चर’ विकसित कर रही है, जिसने हिंद महासागर में चीन के प्रभुत्व के सपनों को ध्वस्त कर दिया है।

प्रथम स्तर (Heavyweight Tier) में ब्रह्मोस का वर्चस्व रहेगा। जल्द ही इसमें ‘ब्रह्मोस-एनजी’ (नेक्स्ट जनरेशन) शामिल होगी, जो वजन में आधी होगी और इसे तेजस जैसे हल्के लड़ाकू विमानों से भी दागा जा सकेगा। इसकी स्टील्थ क्षमता इसे रडार के लिए अदृश्य बना देगी।

द्वितीय स्तर (Mid-weight Tier) में NASM-MR और ग्लाइडफायर मिसाइलें होंगी। ये अपनी संख्या और सटीकता से दुश्मन को विचलित कर देंगी, जिससे कमांडरों को लक्ष्य के अनुसार हथियार चुनने का लचीला विकल्प मिलेगा।

तृतीय स्तर (Specialized Strike) में रुद्रम सीरीज की एंटी-रेडिएशन मिसाइलें और LRLACM (लॉन्ग रेंज लैंड अटैक क्रूज मिसाइल) शामिल हैं। 1500 किलोमीटर की रेंज वाली यह मिसाइल पहाड़ों और घाटियों के बीच से अपना रास्ता खुद बनाती है। साथ ही, भविष्य में मैक 10 की रफ्तार वाली LRAShM हाइपरसोनिक मिसाइल भी बेड़े का हिस्सा बनेगी।

जब ये हथियार एक नेटवर्क से जुड़ते हैं, तो ‘डिस्ट्रिब्यूटेड लेथैलिटी’ का सिद्धांत प्रभावी होता है। इसका अर्थ है कि मारक क्षमता केवल कुछ बड़े जहाजों तक सीमित न होकर, हर छोटे गश्ती जहाज, हेलीकॉप्टर और पनडुब्बी में फैली होगी।

एक कल्पित युद्ध की स्थिति में, यदि चीनी बेड़ा हिंद महासागर में प्रवेश करता है, तो उन्हें हर दिशा से हमले का सामना करना पड़ेगा। वे भ्रमित हो जाएंगे कि वे सुपरसोनिक ब्रह्मोस को रोकें या पानी की सतह के करीब से आ रही दर्जनों NASM-MR मिसाइलों को।

इस रणनीति की रीढ़ ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान है। स्वदेशी मिसाइलों की मांग से L&T, गोदरेज और BDL जैसी कंपनियों का एक मजबूत डिफेंस इकोसिस्टम बन रहा है। स्वदेशी इंजन (ATGG) का विकास इस बात का प्रमाण है कि लंबे युद्ध की स्थिति में भारत को विदेशी सहायता पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

भारत की इस आक्रामक और चतुर रणनीति से दुनिया के रक्षा विशेषज्ञ प्रभावित हैं। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी समुद्री सीमाओं की सुरक्षा के लिए पूरी तरह सक्षम है। चीन और पाकिस्तान के लिए यह नई मिसाइल रणनीति एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है, जो समंदर में शक्ति संतुलन को भारत के पक्ष में झुका देती है।

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